हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 417, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंहालखनित्रदात्रयष्टिवृष्टिभिरपि निःसरद्भिरायुषो बलात्कृतकलकलम् , अन्यत्र संघशो घासिकैर्बुसधूलिधूसरितघासजालजालकितजघनैश्च पुराण- पर्याणैकदेशदोलायमानदात्रैश्च शीर्णोर्णाशकलशिथिलमलिनमलकुथैश्च प्रभुप्रसादीकृतपाटितपटच्चरचलबोलकधारिभिश्च धावमानैरुद्धूयमानधूलि- पटलम्, क्वचिदेकान्तप्रवृत्ताश्ववारचक्रचर्च्यमाणागामिगौडविग्रहम्, क्व- चित्पङ्किलप्रदेशपूरणादेशाकुलसकललोकलूयमानतृणपूलकम्, क्वचित्तल- वर्तिवेत्रिवेत्रवित्रास्यमानशाखिशिखरगतविकोशद्विर्वाग्दग्धाब्राह्मणम्, क्वचि- त्कुलुण्ठकपाशविवेष्ट्यमानग्रामीणप्रामाकृष्टकौलेयकम्, क्वचिदन्योन्यविभ- वस्पर्धोद्धुरराजपुत्रवाह्यमानवाजिसंघट्टमण्डितम्, अनेकवृत्तान्ततया कौतु- कजननम्, प्रलयजलधिमिव जगद्ग्रासग्रहणाय प्रवृत्तम्, पातालमिव भाण्डम् । अन्यत्र घासिकैः उद्धूयमानधूलीपट्लमिति संबन्धः । संघशो बहुशः । घासे नियुक्ता घासिकाः । घासजालं घाससंघातः । एकदेशः पश्चिमा दिक् । 'मलकुथैः' इति पाठः । मलकुथा मलपट्टी । छुविरित्यर्थः । अंसोपरिवासं इत्यन्ये । पटच्चरं जीर्णवस्त्रम् । कुलुण्ठकाः शुनां बन्धनलगुडाः । उद्धुरा उद्दामप्रसराः । जगतो चाल से दौड़ कर घुड़सवारों के कुत्तों को झांसा देने लगे । यद्यपि उनपर चारों ओर से ढेले, डंडे, टेढ़ी छड़ी, कुठार, कील, कुदाल, फडुभा, दरांती, लाठी की बरसा होती रहती थी, तथापि आयु के बल से बच निकलते थे । एक ओर घसियारे धूल-धक्कड़ करते दौड़ रहे थे, उनकी जांघों पर भूसों की धूल से मिली हुई घास भर आई थी, घोड़े पर कसी हुई पुरानी काठी के पीछे की ओर उनके दरांत लटक रहे थे । रद्दी ऊन के टुकड़ों से जमाए हुए गुदगुदे और मैले नमदे उनके घोड़ों की पीठ पर पड़े हुए थे, प्रभु के प्रसाद के रूप में फटे हुए कपड़े का फीता उनके सिर से बंधा हिल रहा था । एक तरफ सवारों की टुकड़ी आने वाले गौड़युद्ध के विषय में चर्चा कर रही थी । कहीं पांक वाली जमीन पर पुआल की आँटियाँ बिछाने में लोग जुट जाते थे । कहीं नीचे खड़े दण्डधर सैनिकों के डंडे के डर से उजड्ड ब्राह्मण झट पेड़ों पर चढ़कर गाली-गलौज कर रहे थे । कहीं गांव के लोग कुत्तों को घसीट कर ला रहे थे और कुलुण्ठक ( कुत्ते पालने वाले ) उन्हें अपने फांसों में बांध रहे थे । कहीं परस्पर ऐश्वर्य की स्पर्धा से राजपुत्र घुड़दौड़ मचा रहे थे । नाना प्रकार के वृत्तान्तों से भरे चलते हुए कटक को देखकर कौतुक उत्पन्न होता था । मानों वह कटक प्रलयकाल में समुद्र के समान संसार को गड़प लेने के लिए चल पड़ा था । महाभोगी ( धनिकों, सर्पों ) की रक्षा के लिए पाताल का रूप मानों धारण कर रहा था । परमेश्वर ( सम्राट् , शंकर ) के निवास के लिए कैलास बन गया था । प्रजापतियों के