भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 416

सप्तम उच्छ्वासः ३६६ तैरपि स्खलद्भिरपि पतद्भिरपि नरेन्द्रनिहितदृष्टिभिरसतोऽपि पूर्वभोगपति- दोषानुद्भावयद्भिरधिक्रान्तायुक्तकशतानि च शंसद्भिश्चिरंतनचाटापराधां- श्वाभिदधानैरुद्धूयमानधूलिपटलम्, क्वचिदेकान्तप्रवृत्ताश्ववारचक्रचर्च्य- माणागामिगौडमृग्यमाणसस्यसंरक्षणम्, अपरैरादिष्टपरिपालकपुरुषफ- रितुष्टैः 'धर्मः प्रत्यक्षो देवः' इति स्तुतीरातन्वद्भिः, अपरैर्लूयमाननिष्पन्न- सस्यप्रकटितविषादैः क्षेत्रशुचा सकुदुम्बकैरैव निर्गतैः प्ररूढप्राणच्छेदैः परितापत्याजितभयैः 'क्व राजा, कुतो राजा । कीदृशो वा राजा ?' इति प्रारब्धनरनाथनिन्दम्, शशकैश्च कैश्चित्पदे पदे प्रजविप्रचण्डदण्डपाणिपे- टकानुबद्धैर्गिरिगुडकैरिव हन्यमानैरितस्ततः संचरद्भिः, अपरैर्युगपत्पराप- तितमहाजनग्रस्तैस्तिलशो विलुप्यमानैरनेकजन्तुजङ्घान्तरालनिस्रणकुश- लिभिः कुटिलिकाव्यंसितसादिबहुश्वभिः पतल्लोष्टलगुडकोणकुठारकीलकु-

आयुक्तका व्यापृतकाः । चाटा धूर्ताः । अपरैराग्रहारिकजाल्मैरुपलक्षितमपरैः । प्रारब्ध- नरनाथनिन्दमिति योजना । निष्पन्नानि पक्वानि । सकुदुम्बैः सदारैः । शशकैः कृत- कलकलमित्यन्वयः । अनुबद्धा अनुसृताः । गिरिगुडकैर्लोष्टैः । कुटिलिकया वक्र- गमनेन । व्यंसिता वञ्चिताः सादिनामश्ववाराणां बहवः श्वानो यैः । कोणो वादन-

आ रहे थे। कुछ लोग दही, गुड़, शक्कर और पुष्पों की करंडियां पेटियों में बन्द करके जल्दी से ला रहे थे। कुछ लोग क्रोधित कठोर दंडधरों के डराने-धमकाने से दूर भागते हुए गिरते-पड़ते भी राजा पर ही दृष्टि गड़ाए थे। वे पहले के भोगपतियों की झूठी निन्दा कर रहे थे और पहले के कर्मचारियों की सराहना कर रहे थे और धूर्तों के अपराधों को कह-सुन रहे थे। इनकी दौड़-धूप से चारों ओर धूल भर रही थी। दूसरे कुछ लोग सरकारी कर्मचारियों से सन्तुष्ट होकर 'सम्राट् साक्षात् धर्म के अवतार हैं' इस प्रकार स्तुति कर रहे थे। दूसरे कुछ लोग जिनकी तैयार फसल सेना के लिए काट ली गई थी, विषाद प्रकट करते हुए उसके शोक में अपने गृहस्थी के साथ बाहर निकल कर प्राणों को हथेली पर रक्खे निडर होकर कह रहे थे—'कहां है राजा ! किसका राजा ? कैसा राजा ?' इस प्रकार राजा को बाहर निकल कर बोली मार रहे थे। झाड़ियों में छिपे हुए झुण्ड के झुण्ड खरगोश सेना की कल-कल ध्वनि से इधर-उधर उचकने लगे, बस डंडा लिए हुए तेजी से लोग उनपर टूट पड़े और जैसे खेत के ढेले तोड़े जाते हैं ऐसे उन्हें मारने लगे। कुछ खरगोश एकाएक टूट पड़े लोगों के बीच में पड़ जाने से बोटी-बोटी नुच गए। कुछ खरहे पशुओं की टांगों के बीच से घुस कर भाग निकले और अपनी टेढ़ी-मेढ़ी २४ ह० च०