भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 415

भारिकैर्महानसोपकरणवाहिभिश्च बद्धवराहवध्रैर्वार्ध्रीणसैलम्बमानहरिणच- टुकचटकजूटजटिलैः शिशुशशकशाकपत्रवेत्राग्रसंग्रहसंग्राहिभिः शुक्लकपँ- टप्रावृतमुखैकदेशदत्तार्द्रमुद्रायुप्तगोरसभाण्डैस्तलकतापकतापिकाहस्तकता- म्रचरुककटाहसंकटपिटकभारिकैः समुत्सार्यमाणपुरोवर्तिजनम्, क्वचित् ‘क्लेशोऽस्माकम् । फलकालेऽन्य एव विटाः समुपस्थास्यन्ते' इति मुखरैः पदे पदे पततां दुर्बलबलीवर्दानां नियुक्तैः स्खलने खलचेटकैः खेद्यमा- नासंविभक्तकुलपुत्रलोकम्, क्वचिन्नरपतिदर्शनकुतूहलादुभयतः प्रजविप्र- धावितग्रामेयकजनपदम्, मार्गग्रामनिर्गतेराग्रहारिकजाल्मैश्च पुरःसरज- रन्महत्तरोत्तम्भिताम्भःकुम्भैरुपायनीकृतदधिगुडखण्डकुसुमकरण्डकैर्घटि- तपेटकैः सरभसं समुत्सर्पद्भिः प्रकुपितप्रचण्डदण्डिवित्रासनविद्रुतैर्दू रग- बहिःकारयद्भिर्निरस्यद्भिः । महानसा सूपकारशाला । वराहवध्रं सूकरचर्म । सूकर- पाठेति प्रसिद्धम् । वार्ध्रीणसा यज्ञियाश्छागविशेषाः । हरिणानां च चटुकाः पूर्व- भागाः । जूटः संघः । वेत्राग्राणि वंशाङ्कुराः । तलकोऽग्निशकटिका । तापकोऽपूपादि- करणस्थानम् । तापिका काकपालिका । यत्र तैलादिना भक्ष्याः पच्यन्ते । हस्तकः शूलम् । पिटका भाण्डानि । विटा धूर्ताः । समुपस्थास्यन्ति ढौकयिष्यन्ति । पततां स्खलताम् । स्खलने प्रेरणे । नियुक्तैः स्थापितैः । असंविभक्ता अकृतविभागाः । ग्रामे भवा ग्रामेयकाः । 'ग्रामाद्यत्खञौ' । आग्रहारिकजाल्मैर्मृग्यमाणसस्यसंरक्षण- मिति संगतिः । जाल्मा मूर्खाः । उत्तम्भिता ऊर्ध्वीकृताः । अम्भःकुम्भा जलपूर्ण- कलशाः । खण्ड इक्षुविकारः । समुत्सर्पद्भिर्ढौकमानैः । वित्रासनं भयोत्पादनम् । सामग्री को हँकड़ी में इठलाते हुए ले चल रहे थे। रसोई के सामान ढोने वाले भारिक भी आगे पड़ने वाले लोगों को हटाते हुए चलते थे, वे सूअर के चमड़े की बदियों में बकरे लटकाए चल रहे थे, कुछ हिरनों के अग्रभाग और चिड़ियों के ठट्ट के ठट्ट लटकाए चल रहे थे। कुछ लोग खरगोश के छोटे बच्चे, साग-पात, बांस के नरम अंकुर रसोई के लिए लेकर चले जा रहे थे; कुछ दूध-दही के इंडे लिए थे; सफेद कपड़े से जिनके मुंह ढंक कर और एक तरफ गीली मिट्टी पर मोहर लगा दी गई थी। सामान ढोने वाले अंगीठी, तवा, तई, सलखें, रांधने के लिए तांबे के बने बर्तन, कड़ाही आदि बर्तनों से भरे टोकरे लेकर चल रहे थे। कमजोर बैलों को हांकने के लिए देहाती नौकर कुलपुत्रों पर ताना कसते हुए कह रहे थे-'मेहनत तो हम करेंगे, लेकिन फल लेने के लिए भंटुए टपक पड़ेंगे।' कहीं सम्राट के देखने की उत्कण्ठा से गांव के लोग दोनों ओर वेग से दौड़े आ रहे थे। मार्ग के गांव से निकले हुए अनपढ़ आग्रहारिक लोग (खेती-बारी की देखभाल करने वाले) आगे-आगे मंगल के लिए गांव के तीन बड़े-बड़े वृद्धों के हाथों में जलकुम्भ उठाए