हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 414, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तम उच्छ्वासः ३६७ पन्नान्नपुष्टैः केलिकलैः कित्किलायमानैर्मेण्ठबण्ठवठरलम्बनलेशिकलुण्ठ- कचेटशाटचण्डालमण्डलैरान्डीरैः स्तूयमानम्, क्वचिदसहायेः क्लेशाज्जि- तकुपामकुटुम्बिसंपादितसीदत्सौरभेयशम्बलसंवाहनायासावेगागतसंयोगैः स्वयंगृहीतगृहोपस्करैः 'इयमेका कथंचिद्दण्डयात्रा यातु । यातु पाताल- तलं तृष्णाभूतेरभवनिः । भवतु शिवम् । सेवां करोतु । स्वस्ति सर्वदुःख- कूटाय कटकाय' इति दुर्विधवृद्धकुलपुत्रकैर्निन्द्यमानम्, क्वचिदतीतीक्ष्णस- लिलस्रोतःपातिनौगतैरिव ग्रथितैरिव पङ्क्तिभूतैर्जनैरतिद्रुतम्, द्रवद्भिः कृष्ण- कठिनस्कन्धगुरुलगुडैर्गृहीतसौवर्णपादपीठीकरङ्ककलशपतद्ग्रहावग्राहैः प्र- त्यासन्नपार्थिवोपकरणग्रहणगर्वदुवारैः सर्वमेव बहिः कार्यद्भिर्भूपतिभृतक- मन्नम्, परस्परलुण्ठनं वा, तैः सुखेन संपन्नं यदन्नं तेन सुपुष्टैः । केलिकलाः प्रहसनाः, बहुभाषिणो वा । मेण्ठा हस्तिजागरिकाः । वण्ठाः अकृतविवाहास्तरुणाः, ये दण्ड- मादाय हस्तिनां दर्पमाकर्षयन्ति, पत्तय इत्यन्ये । वठरा मूर्खाः । लम्बाना गर्दभ- दासाः । लेशिका जनपरिचारकाः । लुण्ठकाश्चौराः । चेटा दासाः । शाटा धूर्ताः । चण्डाला अश्वपालाः । आण्डीराः प्रगल्भाः । यद्वा राण्डीराः रण्डापुत्राः । संपादितो दत्तः । सीदन्नसमर्थो यः सौरभेयस्तेन शम्बलसंवाहनाय य आयासो योगस्तेन । गतसंयोगैरुत्पन्नचित्तक्षोभैरिति समासः । अभवनिरिति 'आक्रोशे नञ्यनिः'। दुर्विधा दरिद्राः । वृद्धाः स्थविराः । कुलपुत्राः कुलक्रमागाताः सेवकास्तैर्निन्द्यमानमिति स्कन्धावारविशेषणम् । क्वचिच्च भूपङ्गाधिकारिकर्महानसोपकरणवाहिभिश्च समुत्सार्य- माणपुरोवर्तिजनमिति स्कन्धावारविशेषणम् । अतिशीष्णं वेगवत् । ग्रन्थिविद्यते येषां तैः । करकस्ताम्बूलाधारः । पतद्ग्रहो निष्ठीवनपात्रम् । अवग्राहः स्नानद्रोणी । के घसियरे ), लुंठक ( लूट-पाट करने वाले ), चेट ( छोटे नौकर-चाकर ), शाट ( धूर्त या शठ ), चंडाल ( अश्वपाल ), आण्डीर ( प्रगल्भ )—ये सब यात्रा की प्रशंसा करते थे । कहीं पर बेचारे असहाय वृद्ध कुलपुत्र जो किसी तरह गाँवों से मिले हुए मरियल बैलों पर सामान लादकर और स्वयं अपने ऊपर सामान लादकर घिसट रहे थे बुरी तरह घबड़ा कर कोसने लगे—'बस यह यात्रा किसी तरह पूरी हो जाय, तृष्णा पाताल चली जाय, धन का सत्यानाश हो, भगवान् बचाय इस नौकरी से । सब दुःखों की जड़ इस कटक को हाथ जोड़ता हूँ।' कहीं तेजी से बहते हुए जल के प्रवाह में नावों की भांति पंक्तिबद्ध होकर एक में-एक गुथे हुए ऐसे लोग चल रहे थे । राजाओं के अन्न-पान को ढोने वाले कर्मचारी बाहर निकाल रहे थे, वे अपने काले कठोर कंधों पर भारी लट्ठ रखे हुए थे, सोने का पाद- पीठ, पानदान, पानी का कलसा, पीकदान, नहाने की द्रोणी आदि राजाओं की निजी