भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 413

३६६ हर्षचरितम् गरीयानगडकतण्डुलभारको न निर्वहति दम्यः । दासक, माषीणादमुतो द्राग्दात्रेण मुखघासपूलकं लुनीहि । को जानाति यवसगतं गतानाम् । धव, वारय बलीवर्दाम् । वाहीकरक्षितं क्षेत्रमिदम् । लम्बिता शकटी । शाकरं धुरंधरं धुरि धवलं नियुङ्क्ष्व । यक्षपालित, प्रमदाः पिनक्षि । अक्षिणी किं ते स्फुटिते । हत हस्तिपक नेदीयसि करिकरदण्डे समदः संमर्दकर्दमे स्खलसि । भ्रातर्भावविधुरबन्धो, उद्धर पङ्कादनड्वाहम् । इत एहि माणवक, घनेभगटासंघट्टसंकटे नास्ति निस्तरणसरणिः ।' इत्येवमा- दिप्रवर्तमाननानेकसंलापं क्वचित्स्वेच्छामृदितोद्दामसस्यघासविघससुखसं- गुड इति प्रसिद्धः । दम्यो दान्तः । माषाणां भवनं क्षेत्रम् । 'धान्यानां भवने क्षेत्रे खञ्' । किञ्चिन्मात्रं बुभुक्षानिवृत्तये । घासो मुखघासः । यवसं घासः । उक्तं च 'शष्पं बालतृणं घासो यवसम्' इति । धवः पुरुषः । वाहीकः काष्ठकः, परिपालक इत्यन्ये, गोरक्षक इति चान्ये । लम्बिता मार्गमाक्रान्तुं न शक्नोति । शाकरं शूरम् । तरुणं वा । धवलं महोक्षम् । नेदीयसि करदण्डेऽन्यहस्तसंबन्धिनि सति । करी समदोऽर्थात्संपन्नः । स्वेच्छयानायासेन । मृदितानि क्षुण्णानि । उद्दामानि प्रभूतानि सस्यानि । घासो यवसम् । तथा घासो विघसं, तथा विघसो भृत्याद्युपयुक्तशेष- चूस लेना, बिगड़े बैल को सम्हाल, कबतक बेर बीनता रहेगा ? चल, दूर जाना है; द्रोणक, आज ही क्यों ऊब गए, अभी तो सेना की यात्रा लम्बी पड़ी है; स्थपुटुक, आगे और भी मार्ग है; स्थावरक, खांड़ की हांड़ी को फोड़ न देना; चावलों का बोरा भारी है बैल के मान का नहीं; अबे टहलुवे, सामने उड़द के खेतों में से बैलों के लिए एक पूली तो दरांत से जल्दी काट ले; कौन जाने, यात्रा में चारे का क्या प्रबन्ध होगा ? यार, बैलों को अलगाए रहो, इस खेत में रखवाले हैं; सग्गड़ गाड़ी में ओलार पड़ता है, तगड़ा धौला बैल उसमें जोतो; ऐ पगले, स्त्रियों को रौंद डालेगा ? तेरी आँखें क्या फूट गई हैं ? धत्तेरे हस्तिपक की, मेरे हाथी की सूँड़ पर चढ़ा हुआ खिलवाड़ कर रहा है; ओ, धक्कामक्की खाकर कीचड़ में गिर रहा है । ऐ भाई, दुखियों के साथी कीचड़ में फँसे बैल को निकाल लो; छोकरे, इधर भाग आ, हाथियों के भीड़-भड़क्के में अगर गया तो फिर जीता बच निकलने का उपाय नहीं।' कहीं पर कटवा कर ढेर की ढेर काई गई हरी घासों को मीड़ कर मनचाहा आहार प्राप्त कर वे लोग सुख से फूल रहे थे और आपस में हँसी-मजाक करते हुए खिलखिला कर हँस रहे थे । ये लोग नौकर-चाकर थे, जैसे मेठ (हाथियों की झाड़-पोंछ करने वाला ), बंठ (कुंवारे जवान पट्ठे जो डंडा लिए हाथी से भिड़ आते थे ), वल्लर (उमड्ड ), कञ्चन ( गदहे की तरह काम लेने योग्य कह्लू नौकर ), केलिक ( घोड़ों