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हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

क्षिपतिः । अस्मिन्नात्मेन्द्रनवरतविमललावण्यसौभाग्यसुधानिर्झरिणि मुख- शशिनि चिराच्चक्षुषी लालयतु प्राग्ज्योतिषेश्वरश्रीः । नाभिनन्दति चेद्देवः प्रणयमाज्ञापयतु किं कथनीयं मया स्वामिन' इति । विरतवचसि तस्मिन्भूपालः पूर्वोपलब्धैरेव गुरुभिर्गुणैरारोपितबहुमानः कुमारे सुदूरमाभोगातपत्रव्यतिकरेण तु परां कोटिमारोपिते प्रेम्णि लज्जमान इव सादरं जगाद- 'हंसवेग ! कथमिव तादृशि महात्मनि महाभिजने पुण्यराशौ गुणिनां प्राग्रहरे परोक्षसुहृदि स्निह्यति मद्विधस्या- न्यथा स्वप्नेऽपि प्रवर्तेत मनः । सकलजगदुत्तापनपटवोऽपि शिशिरायन्ते त्रिभुवननयानन्दकरे कमलाकरे करास्तिग्मतेजसः । सुबहुगुणगण- क्रीताश्च के वयं सख्यस्य । सज्जनमाधुर्याणामभृतदास्यो दश दिशः । एकान्तावदातोत्तानस्वभावसंभृतसादृश्यस्य कुमुदस्य कृते केनाभिहितः शिशिररश्मिः । श्रेयांश्च संकल्पः कुमारस्य । स्वयं बाहुशाली मयि च समालम्बितशरासने सुहृदि हरादृते कमन्यं नमस्यति । संवर्धिता मे प्रीतिरमुना संकल्पेन । अवलेपिनि पशावपि केसरिणि बहुमानो हृदयस्य

थे । प्राग्ज्योतिषेश्वर की लक्ष्मी जब तक तृप्त न हो तब तक निरन्तर लावण्य और सौभाग्य के अमृत को झरने वाले आपके मुखचन्द्र में अपने नेत्रों को लगा दें । अगर देव कुमार के प्रणय का स्वागत नहीं करते तो आज्ञा दें । मैं जाकर स्वामी से क्या कहूँगा ? उसके इस प्रकार कहने पर कुमार के सृष्ट गुणों के पहले ही मिले परिचय से हर्ष के मन में आदरभाव उत्पन्न हो गया था और आभोग नामक छत्र को भेट में देने के सम्पर्क से वे कुमार के प्रति अत्यन्त प्रेमासक्त हो चुके थे । उन्होंने लज्जित होते हुए आदरपूर्वक कहा- 'हंसवेग, इस प्रकार महान आत्मा, महाकुलीन, पुण्यराशि, गुणियों में श्रेष्ठ, परोक्ष मित्र कुमार के स्नेह दर्शाने पर मेरे जैसे के मन में स्वप्न में भी अन्यथाभाव कैसे आ सकता है ? समस्त संसार को संतप्त कर देने में समर्थ सूर्य के तेज त्रिभुवन के नेत्र को आनन्दित करने वाले पद्मसमूह में आकर ठण्डे पड़ जाते हैं । कुमार के अनेक गुणों से जब हम बिक गये तो हमें मित्रता का अधिकार क्या ? दिशाएँ सज्जनों के मधुर स्वभाव के कारण ही वेतन के बिना ही उनकी दासी बन जाती हैं । अत्यन्त स्वच्छ स्वभाव कुमुदों को, जो स्वच्छहृदय सज्जनों का सादृश्य प्राप्त करते हैं, विकसित करने के लिए चन्द्रमा से किसने सिफारिश की है । कुमार का संकल्प श्रेष्ठ है । स्वयं वे बाहुबीर्यशाली हैं । धनुष धारण करके जब मैं मित्र के रूप हूँ तो शिव के अतिरिक्त किसी अन्य के सामने क्यों झुकेंगे । मेरे इस संकल्प से प्रीति और भी बढ़ गई । पशुजाति २५ ह० च०

३८६ हर्षचरितम् किं पुनः सुहृदि । तत्तथा यतेथाः यथा न चिरामयमस्मान्क्लेशयति कुमारदर्शनोत्कण्ठा' इति । हंसवेगस्तु विज्ञापयांबभूव—'देव ! किमपरमिदानीं क्लेशयत्यभि- जातमभिहितं देवेन । सेवाभीरवो हि सन्तः, तत्रापि विशेषेणायमहङ्कार- धनो वैष्णवो वंशः । आस्तां तावदस्मत्स्वामिवंशः । पश्यतु देवः पुरुषस्य हि सेवां प्रति दुर्जनन्येवातिवृद्धया दुर्गत्या वाभिमुखीक्रियमाणस्य, कुटुम्बिन्येवासंतुष्टया तृष्णया वा प्रेर्यमाणस्य, दुरपत्यैरिव यौवनजनितैर्ना- नाभिलाषिभिरसत्संकल्पैर्वाकुलीक्रियमाणस्य जरत्कुमारीमिव परमार्गण- योग्यामतिमहतीं वा अवस्थां पश्यतः, स्वगृहे दुर्बन्धुभिरिव दुःस्थितैः समग्रैर्ग्रहैर्वा ग्राह्यमाणस्याभियोगं, पुरातनैरतिदुस्त्यजैर्भृत्यैरिव मलिनैः कर्मभिर्वानुवर्त्यमानस्य, सकलशरीरसंतापकरं करीषाग्निमिव दुष्कृतिनः कृतचित्तस्य संप्रवेष्टुं राजकुलमुपहतसकलेन्द्रियशक्तेरिव मिथ्यैव हृदय- गतविषयग्रामग्रहणाभिलाषस्य, प्रथममेव तोरणतले वन्दनमालाकिस- में उत्पन्न अभिमान करने वाले सिंह के प्रति भी जब हृदय में आदर है तो मित्र के प्रति क्यों न हो ? तो तू जाकर यह प्रयत्न करना कि कुमार के दर्शन की उत्कण्ठा हमें चिरकाल तक न सताती रहे ।' हंसवेग ने निवेदन किया—'देव, दूसरा क्या कष्ट होगा ? देव ने बहुत ठीक कहा । सज्जन लोग अपनी सेवा से डरते हैं, अहंकार के धनी विष्णु ( वराह ) के वंश की तो बात ही और है । हमारे स्वामी के वंश की बात तो जाने दीजिए । देव ही देखें, दुष्ट जननी के समान अत्यन्त बढ़ी हुई ( अतिवृद्धा ) दुर्गति मनुष्य को नौकरी के लिए ढकेलती है । असन्तुष्ट तृष्णा पत्नी की भाँति उसे प्रेरित करती है । दुष्ट पुत्रों की भाँति यौवन- जनित नाना प्रकार की अभिलाषाओं से भरे हुए असत् संकल्प उसे आकुल कर डालते हैं । उस कन्या के समान, जो उम्र होने पर भी ब्याही नहीं गई ऐसी बुरी अवस्था को जिसमें दूसरों ( धनी लोगों या पति ) का अन्वेषण होता है, वह देखने लगता है । दुष्ट बान्धवों के समान सारे ग्रह उसके घर में डेरा डाल देते हैं और उसे सताने लगते हैं । पुराने हो जाने के कारण जिनसे पिण्ड छुड़ाना नहीं बनता, ऐसे भृत्यों के समान मलिन कर्म उसके पीछे पड़ जाते हैं । पाप का मारा वह सारे शरीर को संतप्त करने वाले भूसे की अग्नि के समान राजकुल में प्रवेश पाने के लिए निश्चय करता है। वह उस व्यक्ति के समान, जिसकी इन्द्रियों की सारी शक्ति ठप हो गई हो, विषयों के उपभोग की मन में झूठी साध करता है। पहले ही जब वह तोरणद्वार के

सप्तम उच्छ्वासः ३८७ लयस्येव शुष्यतो द्वारक्षिभिर्निरुद्धस्य, पीडितस्य प्रविशतो द्वारे हरिण- स्येवापरैर्हन्यमानस्य, करिकर्मचर्मपुटस्येव मुहुर्मुहुः प्रतिहारमण्डलकर- प्रहारैर्निंरस्यमानस्य, निधिपादपप्ररोहस्येव द्रविणाभिलाषादधोमुखीभ- वतः, दूरममार्गणस्याप्यतिविप्रकृष्टविवृतविसर्जितस्योद्वेगं व्रजतः, अकण्ट- कस्यापि चरणतललग्नस्याकृष्य क्षेपीयः क्षिप्यमाणस्य, अमकरकेतोर- प्यकालोपसर्पणाप्रकुपितेश्वरदृष्टिदग्धस्य, प्रलयमुपगच्छतः कपेरिव कोप- निर्भत्सितस्याप्यभिन्नमुखरागस्य, ब्रह्मघ्न इव प्रतिदिवसवन्दनोद्वृत्तशिरः- कपालस्य, स्पर्शरहितस्याशुभकर्माणि निर्वहतः, त्रिशङ्कोरिवोभयलोकभ्र- हस्तिनां युद्धशिक्षार्थं चर्ममयो हस्ती । प्रतिहारमण्डलेन दौवारिकसमूहेन । प्रतिसंहारेण वेष्टनेन मण्डलं यस्य करस्य तत्प्रहारैश्च । निधिपादपप्ररोहो निधान- गृहजन्मा वृक्षाङ्कुरः । स च सर्वो निधिप्रभावादधोमुखीभावः प्रणामः । अमार्ग- णस्यायाचकस्य च अतिविप्रकृष्टैः प्राकृतैः । पूर्वं विवृतः स्वतश्च लब्धदर्शन एव विसर्जितस्यात एवोद्वेगं मन्युं व्रजतः । मार्गणः शरश्चातिविप्रकृष्टं कर्णान्ते विवृतो विसर्जित उद्धतवेगं याति । अमकरकेतोरशृङ्गारिणोऽपि । अकालेऽप्रस्ताव उपसर्पणं यस्य सः । तथा । अप्रकुपितस्येश्वरस्य हर्षस्य दृष्ट्या दग्धः । ततो विशेषणसमासः । प्रलयः प्रकृष्टो लयो भित्त्यादिश्लिष्टत्वम्, नाशश्च । कपिसदृशः कपेलोंहितमुखत्वात् । प्रतिदिवसेत्यादि । ब्रह्मघ्नो हतब्राह्मणः कपालमहरहर्वन्दते । त्रिशङ्कुर्नाम चण्डाल- भावमास्थितोऽपि याजयित्वा विश्वामित्रेण स्वर्गमारोपितः कुपितेनेन्द्रेण हुंकार- पास पहुँचता है, द्वारपाल उसे रोक देते हैं और वह बन्दनवार के पत्ते की तरह वहीं सूखता रहता है। वहाँ के दुःख सहकर किसी तरह राजकुल की ड्योढ़ी के भीतर प्रवेश भी हो गया तो दूसरे लोग उस पर टूट कर हिरन की तरह कुटियाते हैं। चमड़े के बने हुए हाथी की तरह बार-बार प्रतिहारों के घूंसे खाकर धकिया दिया जाता है। धन कमाने की इच्छा से राजकुल में गया हुआ वह ऐसे मुँह लटकाए रहता है जैसे जमीन में गड़े खजाने के ऊपर लगाए गए पौधे की डाल नीचे झुकी हो। वह चाहे कुछ भी याचना न करे, फिर भी राजकुल में दूर तक प्रविष्ट हुआ वह जोर के साथ बाहर फेंक दिया जाता है, जैसे धनुष बाण को खींच कर जोर से फेंक देता है। यद्यपि वह काँटे की तरह गड़ कर किसी को दुःख नहीं देता तथापि पैर में लगा हुआ वह निकाल कर फेंक दिया जाता है। किसी प्रकार असमय में स्वामी के पास पहुँच भी गया तो उसकी कुपित दृष्टि उसे जला कर नष्ट कर देती है, जैसे अनाड़ी कामदेव देवताओं के फेर में पड़ कर शिव के द्वारा जल गया था। विनाश के मुख में पहुँचे हुए उसे डाँट-फटकार सुनने पर

३८८ हर्षचरितम् ष्टस्य नक्तंदिनमवाक्शिरसस्तिष्ठतः, वाजिन इव कवलवशेन सुखबाह्य- मात्मानं विदधानस्य, अनशनशायिन इव हृदयस्थापितजीवनाशस्य, शरीरं क्षपयतः शुन इव निजदारपराङ्मुखस्य, जघन्यकर्मलग्नमात्मानं ताडयतः, प्रेतस्येवानुचितभूमिदीयमानान्नपिण्डस्य, बलिभुज इव जिह्वा- लौल्योपयुक्तपुरुषवर्चसो वृथा विहितायुषो जीवतः, श्मशानपादपानिव पिशाचस्य दग्धभूत्या परुषीकृतान्राजवल्लभानुपसर्पतः, विपरीतजिह्वाज- नितमाधुर्यैरोष्ठमात्रप्रकटितरागै राजशुकालापैः शिशोरिव मुग्धविलोभ्य- तर्जितः । स च निपिप्सुरेव विश्वामित्रप्रभावादुभुवमनवाप्य तत्रैव पूर्वं लम्ब- मानोऽद्यापि स्थितः । कवलो ग्रासः । सुखेन बाह्यम् । बवयोरैक्यात् । सुखेभ्यो बहिर्भूतम्, कृच्छ्रेण व्याप्यं च । हृदये स्थापिता जीवने वृत्त्युपाय आशा येन, जीवस्य नाशो, जीवनाशश्च । जघन्यं निकृष्टम्, जघने भवं जघन्यं च सुतम् । अनु- चितायामशस्यायां भूमौ । चितायाः पश्चादनुचितम् । बलिभुजः काकस्य । लौल्यं चापलम्, अभिलाषश्च । उपयुक्तं व्ययीकृतम्, भुक्तं च । वर्चस्तेजः, विष्ठा च । वृथा विहितं कृतमायुर्यस्य, विध्यः पक्षिभ्यो हितमायुर्यस्य, वृथा निष्फलं जीवतः पिशाचस्य मूर्खस्य । भूतिः संपत्, भस्म च । राजानः शुका इव, राजशुकाश्च । भी वानर की तरह मुँहपर लाली बनाए रखनों पड़ती है। प्रतिदिन उसे सबके पैरों पर सिर रगड़ना पड़ता है, मानों उसे ब्रह्महत्या लगी हो। उसे कोई नहीं छूता, मानों अशौच पड़ गया हो। त्रिशंकु के समान दोनों लोकों से भ्रष्ट होकर दिन-रात वह नीचे मूड़ो लटकाए रहता है। घोड़े की तरह थोड़े से टुकड़ों के लिए वह अपने सब सुख छोड़ने के लिए तैयार हो जाता है। अनशन करके सोने वाले की तरह उसके हृदय में हमेशा मर जाने की इच्छा रहती है। कुत्ते के समान अपनी पत्नी से पराङ्मुख होकर वह अपने शरीर को कँपाता रहता है और नीच कर्म में प्रवृत्त अपने आपको स्वयं वह पीटता रहता है। प्रेत के समान भोजन करने के लिए जहाँ के तहाँ (अनुचित जगह में) बैठा दिया जाता है। वह कौवे की तरह जीभ के चटोरेपन में अंधड़ कर अपने बल को उपयोग में लाता है और व्यर्थ आयु गँवाते हुए जीता है। जैसे श्मशान के वृक्षों पर पिशाच मँडराता है उसी प्रकार वह नासपीटी बढ़ोत्तरी पाकर बदमिजाज हुए राजा के मुंहलगे लोगों के पास चक्कर लगाता रहता है। मीठी-मीठी बातें करने वाले और ओठ मात्र में ही राग दिखलाने वाले सुग्गे बच्चों की तरह उसे भुलावे में डाल देते हैं। मदारी के प्रभाव में पड़ कर बेताल जाते उसी प्रकार वे भी राजा के डर के मारे अपने मन से कुछ भी नहीं कर सकते। जैसे चित्रलिखित धनुष चढ़ी

सप्तम उच्छ्वासः ३८१ मानस्य, वेतालस्येव नरेन्द्रप्रभावाविष्टस्य न किंचिन्नाचरतः, चित्रधनुष इवालीकगुणाध्यारोपणैकक्रियानित्यनम्रस्य निर्वाणतेजसः, संमार्जनीसमुपा- र्जितरजसोऽवकरकूटस्येव निर्माल्यवाहिनः, कफविकारिण इव दिने दिने कटुकैरुद्वेज्यमानस्य, सौगतस्येवार्थशून्यविज्ञप्तिजनितवैराग्यस्य काषाया- श्यभिलषतः, निशास्वपि मातृबलिपिण्डस्येव दिक्षु विक्षिप्यमाणस्य, अशौचगतस्येव कुशयनजनितसमधिकतरदुःखवृत्तेः, तुलायन्त्रस्येव पश्चात्कृतगौरवस्य तोयार्थमपि नमतः, अतिकृपणस्य शिरसा केवलेना- संतुष्टस्य वचसापि पादौ स्पृशतः, निर्दयवेत्रिवेत्रताडनत्रस्तयेव त्रपया त्यक्तस्य, दैन्यसंकोचितहृदयहतावकाशयेवाहोपुरुषिकया परिवर्जितस्य, कु- राजशुकभेदाः । नरेन्द्रो राजा, मन्त्रविच्च । गुण उत्कर्षः, ज्या च गुणः । निर्वाणं प्रशान्तम्, निर्गतवान्तेजश्च। अवकरकूटो मार्जनीक्षिप्तो रजस्तृणादिसंघातः । उक्तं च—'संमार्जनी शोधनी स्यात्संकरोऽवकरस्तथा। क्षिप्ते' इति। अमाल्यवाहित्वेन निःश्रीकत्वमुच्यते । कटुकैः प्रतीहारैः, तीक्ष्णैश्च । अर्थशून्यया निष्फलया । विज्ञप्त्या प्रार्थनया कृतोद्वेगस्य । बौद्धानामपि बाह्यवस्तुशून्यानि विज्ञानानि । अशौचं मृतकादि । कुशयनं कुत्सितशय्या, भूमिश्च कुः । पश्चात्कृतं वर्जितम् , पृष्ठतश्च कृतम् । गौरवं महत्त्वम् , गुरुत्वं च । तोयशब्दो जलोपलक्षणार्थः । तोयं जलं च पादस्पर्शनं पथोऽपि । त्रपया लज्जया । 'आहोपुरुषिका दर्पाद्या स्यात्संभावना- त्मनि' । स्वमात्मा, धनं च । उक्तं च—'स्वो ज्ञातावात्मनि स्वं त्रिष्वात्मीये स्वोऽ- प्रत्यञ्चा से झुका हुआ भी बाण चलाने की शक्ति नहीं रखता उसी प्रकार झूठ-मूठ किसी के गुणों की प्रशंसा करते हुए अपनी नम्रता दर्शाता है और उसका तेज बुझा रहता है। झाडू से बटोर कर एकत्र किये गए कूड़े की तरह वह श्रीहीन होता है ( कभी माला नहीं धारण करता ) । कफ के रोगी की तरह उसे दिन पर दिन प्रतिहार और प्यादे घुड़कते रहते हैं। सेवा करने से टका-पैसा नहीं मिलता तो मन में वैराग्य उत्पन्न होकर बुद्ध के समान गेरुआ धारण कर लेने की इच्छा करने लगता है। मातृबलि के पिंडे की तरह रात के समय में भी बाहर फेंक दिया जाता है। अशौच में पड़े हुए की तरह वह मोटी-झोटी अपनी रहन-सहन से अनेक प्रकार के दुःख उठाता है। पीछे भार बढ़ने से तराजू जैसे झुक जाती है उसी प्रकार आत्मसम्मान को पीछे डाल कर पानी के लिए भी झुकता रहता है। अत्यन्त दीन हो जाने के कारण सिर से केवल पैर नहीं छूता, बल्कि असन्तुष्ट होकर बात-बात में पैर छूने के लिये तैयार रहता है। निष्ठुर प्रतीहारों की मार खाते-खाते वह बेहया हो जाता है। दीनता के कारण हृदय के बुझ जाने से उसकी आत्म-गौरव की भावना समाप्त हो जाती है। निन्दित कर्मों के

३६० हर्षचरितम् त्सितकर्माङ्गीकरणकुपितेयेवोन्नत्या वियुक्तस्य, धनश्रद्धया क्लेशानुपार्जयतः, स्ववृद्धिबुद्ध्यावमानं संवर्धयतो मूढस्य, सत्यपि विविधकुसुमाधिवाससुर- भिणि वने तृष्णयाञ्जलिमुपरचयतः, कुलपुत्रस्यापि कृतागस इव भीतभीतस्य समीपमुपसर्पतः, दर्शनीयस्याप्यालेख्यकुसुमस्येव निष्फलजन्मनः, विदुषोऽपि वैधैयस्येवापशब्दमुखस्य, शक्तिमतोऽपि श्वित्रिण इव संकोचितकरयुग- लस्य, समसमुत्कर्षेषु निरग्निरपच्यमानस्य, नीचसमीकरणेषु निरुच्छ्वासं म्रियमाणस्य, परिभवैस्तृणीकृतस्य, दुःखानिसेनानिर्वृतेर्ज्वलतः, भक्तस्या- प्यभक्तस्य, निरूष्मणः संतापयतो बन्धून्, विमानस्याप्यगतिकस्य, च्युत- गौरवस्याप्यधस्ताद्गच्छतः, निःसत्त्वस्यापि महामांसविक्रयं कुर्वतः, निर्म- दस्याप्यस्वतन्त्रवृत्तेः, अयोगिनोऽपि ध्यानवशीकृतात्मनः, शय्योत्थायं स्त्रियां धने' इति । अधिवासः सौगन्ध्यम्, भावना च । वनं काननम्, जलं च । तृष्णा धनस्पृहा मृगतृष्णा च । विदुषो जानानस्य, पण्डितस्य च। वैधैयस्य मूर्खस्य । अपगतशब्दं मुखं यस्य, लक्ष्यहीनश्च । शब्दोऽपशब्दः । श्वित्रं कुष्ठव्याधिभेदः । समास्तुल्यशीलाः । अनिर्वृतेरप्रतीतेः । अनिर्वृतेर्गमनत्यागाभावाच्च । भक्तस्य हितै- षिणः । अभक्तस्यालब्धसविभागस्य । विरोधः स्पष्टः सर्वत्र । ऊष्मा गत्रोऽपि । विमानस्य विगतमानस्य, व्योमयानस्य च । गतिरुपायोऽपि । गौरवमादरोऽपि । महामांसं स्वकायोऽपि । मदो गर्वः, क्लीबता च । अयोगिनो विपरीतदैववतः । दरि- ही हमेशा करते रहने से उसका अभ्युदय रुक जाता है। धन के कमाने से केवल क्लेशों का उपार्जन करता है। अपमानों को ही वह मूर्ख अपनी वृद्धि समझ लेता है। अनेक प्रकार के फूलों की गन्ध से भरे वन के होने पर भी जब देखो उसकी तृष्णाञ्जलि बनी रहती है। कुलपुत्रों के पास भी अपराधी की भाँति थर-थर काँपता रहता है। देखने योग्य होने पर भी चित्रलिखित पुष्प के समान उसका जन्म लेना व्यर्थ हो जाता है। ज्ञान से भरा होने पर भी उसके मुँह से अनजान की तरह बात नहीं निकलती। शक्ति होने पर भी उसके हाथ कोढ़ी की तरह नीचे रह जाते हैं। उसके बराबर के लोग जब तरक्की पा लेते हैं तो बिना आग के भीतर ही भीतर पकने जलने लगता है। और जब मातहत के लोग बराबरी में आ जाते हैं तो साँस के न निकलने पर भी मर जाता है। पद के घटने से तिनके की तरह प्रतिष्ठा खो बैठता है। दुःख की वायु का झोंका उसे रात-दिन दहकाता रहता है। राजभक्त होने पर भी हिस्से में उसे कुछ नहीं मिलता। उसकी गरमी सब कम पड़ जाती है, पर भाई-बन्धुओं को सताता है। उसका मान नहीं रहता। फिर भी अपने पद से नहीं डिगता। उसका गौरव नहीं रह जाता और वहीं नीचे ही गिरता जाता है। उसका सत्त्व चला जाता है, फिर भी अपने

सप्तम उच्छ्वासः ३६१ प्रणमतो दग्धमुण्डस्य, गोत्रविदूषकस्य नक्तंदिनं नृत्यतो मनस्विजनं हासयतः, कुलाङ्गारस्य वंशं दहतः, नृपशोस्तृणेऽपि लब्धे कन्धरानमन- मयतः, जठरपरिपूर्णमात्रप्रयोजनजन्मनो मांसपिण्डस्य गर्भरोगस्य मातुः, अपुण्यानां कर्मणामाचरणाद्भृतकस्य किं प्रायश्चित्तम्, का प्रति- पत्तिक्रिया, क्व गतस्य शान्तिः, कीदृशं जीवितम्, कः पुरुषाभिमानः, किंनामानो विलासाः, कीदृशी भोगश्रद्धा, प्रबलपङ्क इव सर्वमधस्तान्न- यति दारुणो दासशब्दः । धिक्तदुच्छ्वसितमुपयातु निधनं धनम्, अभ- वनिर्भूतेरस्तु तस्या नमो भगवद्भ्यस्तेभ्यः सुखेभ्यस्तस्यायमञ्जलिरैश्व- र्यस्य तिष्ठतु दूर एव सा श्रीः शिवं स परिच्छदः करोतु यदर्थमुत्त- द्रश्येत्यन्ये, अप्राप्तबलस्येत्यन्ये, चित्तवृत्तिनिरोधाभाववतश्च । दग्धमुण्डस्यातपहत- शिरसः, व्रतिभेदश्च दग्धमुण्डः । विदूषको नायकश्च, नर्मसुहृच्च । वंशो वेणुः । दारुणो दुःसहः, काष्ठस्य च । सर्वमस्त्विति योजना । मुखप्रियेत्यादावेवंविधः सेवकोऽपि यदि मर्त्यमध्ये गण्यते तद्राजिलोऽपि भोगी कथं न भवति । पुलाको व्युषः कलमः कथ न स्यादिति संबन्धः । तपस्वी वराकोऽपि । मुषि विपमानस्य(?) आपको बेचा करता है । वह मद से रहित होता है और अपनी वृत्ति का स्वयं मालिक नहीं होता । योगी नहीं होकर भी उसका अन्तरात्मा सदा सोच-विचार के वशीभूत रहता है । दग्धमुण्ड साधुओं की भाँति खाट से उठते ही सबको प्रणाम करने का उसका स्वभाव बन जाता है । घर के विदूषक की तरह रातदिन नाच-नाच कर दूसरों को हँसाता रहता है । कुलाङ्गार की भाँति वंश को जला डालता है । मनुष्य के रूप में पशु वह तिनके के लिए भी कन्धा झुका देता है । उसका जन्म केवल पेट का गड्ढा भरने के लिये होता है। सचमुच वह तो मांसपिण्ड के रूप में निकलता हुआ माता का गर्भ रोग है। अपुण्य कर्मों के हमेशा आचरण करने से वह मृतक कौन-सा प्रायश्चित करे ? कौन-सा उपाय करे ? कहाँ पर जाय, जिससे शान्ति मिले ? उसका जीवन कैसा ? अभिमान कैसा ? विलास कैसे ? सुख भोगने की इच्छा कैसी ? उसके नाम के साथ जुड़ा हुआ यह 'दास' शब्द कीचड़ की ढाब की भाँति सबको गड़प जाता है । उसके जीने को धिक्कार है । वह धन मिट जाय, उस वैभव का सत्यानाश हो, उन सुखों को दण्डवत् प्रणाम है, उस ऐश्वर्य को हथजोरी है, वह लक्ष्मी दूर रहे, उस टीम टाम से जान बचे, अपने को पृथिवी पर रगड़ना पड़े । राजसेवक ऐसा तपस्वी है जो क्रोधित होकर शाप नहीं दे सकता और प्रसन्न होकर

३६२ हर्षचरितम् माङ्गं गां गमिष्यत्यशापानुग्रहक्षमस्तपस्वी मुखप्रियरतः क्लीबो पूतिमां- समयः कृमिरगण्यमानो नरकः, पादरजोधूसरोत्तमाङ्गो जङ्गमः पादपीठः पुंस्कोकिलः काकुकणितेषु, शिखी सुखकरकेकासु, स्थूलकूर्मः क्रोडक- षेषु, श्वा नीचचाटुकरणेषु, कृकलासः शिरोविडम्बनासु, जाहक आत्म- संकोचनेषु, वेणुर्मूर्च्छनासु, वेश्याकायः करणबन्धक्लेशेषु, पलालं सत्त्व- शालिषु, प्रतिपादकः पादसंवाहनासु, कन्दुकः करतलताडनेषु, वीणा- दण्डः कोणाभिघातेषु, वराकः सेवकोऽपि मर्त्यमध्ये राजिलोऽपि वा भोगी, पुलाकोऽपि वा कलमो, वरं क्षणमपि कृता मानवता मानवता न मतो नमतस्त्रैलोक्याधिराज्योपभोगोऽपि मनस्विनः। तदेवमभिनन्दि- सुखदायिनः रतः रक्तः। मुख आरम्भे, वदने च। प्रियं रतं मोहनं यस्य। क्लीबोऽ- शक्तः, शरण्यश्च। पूति दुर्गन्धम्। अगण्यमानो न गणनाहैः। कुत्सितो नरो नरकः, अगण्यश्च मानो यस्य सोऽगण्यमानो नरको भौमनामा। अवीच्यादिर्वा। काकुकणितम्, मधुरवचनम्। भिन्नध्वनिर्वक्त्वकथनं निर्व्यापारत्वाच्छोकाद्वा। कृकलासोऽप्यनवरतं शिर उन्नमयन्नास्ते। जाहकः आखुतुल्यः प्राणिभेदः, कूर्म इत्यन्ये। मूर्च्छना मोहः, स्वराणां विशिष्टा स्थितिश्च। करणं शरीरम्, मन्त्रो वा। कामशास्त्रोदितकरणानि। कोणो लगुडश्च। यथा। शालिषु पलालमप्रयोजनं तद्व- दसौ। राजिलो डिण्डिभाख्यो निर्विषः सर्पः। पुलाकः फलदरिद्रः। शालिः श्यामाक- प्रायः। मानवताऽहंकारिणा, मानवस्य कर्म मानवता पौरुषम्। न मतः नेष्टः, नमतः प्रणामं कुर्वतः। अनुग्रह नहीं कर सकता। केवल मुख से मीठा बात करने वाला नपुंसक है। पीव और मांस से भरा कीड़ा है। जिसकी कोई गणना नहीं ऐसा कुत्सित नर (नरक) है। दूसरों के पैरों की धूल से भरे मस्तक वाला चलता-फिरता पादपीठ है, लप्पो-चप्पो करने वाला नरकोयल है, मीठी बोल उचारने वाला मोर है, धरती पर सीना घिसने वाला कछुआ है, चापलूसी का कुत्ता है, केवल सिर हिलाने वाला गिरगिट है, अपने आपको सिकोड़कर रखने वाला चूहा है, राग अलापने वाला वेणु है, दूसरे के लिए शरीर को तोड़-मरोड़ करने में वेश्या की भाँति है। सत्त्व वाले व्यक्तियों में घास-फूस की तरह है, दाबने में पैर का बोझ उठाने वाला पंगरू का पावा है, हाथ की मार सहने में कन्दुक है और कोणाभिघात (दूसरा अर्थ—छड़ी की मार) का अभ्यस्त वीणादण्ड है। बेचारे राजसेवक को अगर मनुष्यों में गिना जाय तो राजिल (पानी वाला ढोंड़ साँप) को भी सर्प मानना पड़ेगा, पयाल की भी धान में गिनती होनी चाहिए। मनस्वी के लिए क्षण भर भी मानवता के गौरव के साथ जीना अच्छा, किन्तु मनस्वी के लिए त्रैलोक्य के राज्य का उपभोग भी

सप्तम उच्छ्वासः ३६३ तास्मदीयप्रणयो देवोऽपि दिवसैः कतिपयैरेव परागतः प्राग्ज्योतिषेश्वर इति करोतु चेतसि' इत्युक्त्वा तूष्णीमभूत् । अचिराच्च नमस्कृत्य निर्जगाम । राजापि रजनीं तां कुमारदर्शनौत्सुक्यस्वीकृतहृदयः समनैषीत्। आत्मा- र्पणं हि महताममूलमन्त्रमयं वशीकरणम् । प्रभाते च प्रभूतं प्रतिप्राभृतं प्रधानप्रतिदूताधिष्ठितं दत्त्वा हंसवेगं प्राहिणोत् । आत्मनापि ततः प्रभृति प्रयाणकैरनवरतैरभ्यमित्रं प्रावर्तत । कदाचित्तु राज्यवर्धनभुजबलोपार्जित- मशेषं मालवराजसाधनमादायागतं समीप एवावासितं लेखहारकाद्भण्डि- मशृणोत् । श्रुत्वा चाभिनवीभूतभ्रातृशोकहुताशनस्तद्दर्शनकातरहृदयो बभूव मूर्च्छांन्धकारमिव विवेशातिष्ठच्च समुत्सृष्टसकलव्यापारः प्रतीहार- निवारणनिभृतनिःशब्दपरिजने निजमन्दिरे सराजकपरिवारस्तदागम- नमुदीक्षमाणो मुहूर्तम् । अथ भण्डिरेकेनैव वाजिना कतिपयकुलपुत्रपरिवृतो मलिनवासा माल्यान्योषधयः । साधनं हस्त्यादि । निभृतः सनयः । अथेत्यादि । राजद्वारं भण्डिराजगामेति संबन्धः । अच्छा नहीं, यदि उसके लिये सिर झुकाना पड़े । तो हमारे प्रणय को स्वीकार करने वाले देव भी यह समझें कि कुछ ही दिनों में प्राग्ज्योतिषेश्वर आ जाते हैं।' इतना कहकर हंसवेग चुप हो गया । थोड़ी देर बाद नमस्कार करके चलता बना । राजा ने भी उस रात को कुमार के दर्शन की उत्सुकता में व्यतीत किया । आत्म- समर्पण कर देना महापुरुषों का मूलमन्त्ररहित वशीकरण है । प्रातःकाल उन्होंने प्रधान दूत के साथ बदले में बहुत-सा उपहार देकर हंसवेग को विदा किया । स्वयं शत्रु पर चढ़ाई करने के लिए सेना का प्रयाण उस दिन से बराबर जारी रखा । एक दिन लेखहारक ने आकर यह सूचना दी कि राज्यवर्धन की सेना ने मालवराज की जिस सेना को जीत लिया था उस सबको साथ लेकर भण्डि आ रहा है और समीप ही पहुँच गया है । सुनते ही उनके हृदय में भ्रातृशोक की अग्नि फिर से उमड़ गई और भण्डी को देखने के लिये व्याकुल हो गये, मानों मूर्च्छा के अन्धकार में प्रवेश कर गये हों । सब कार्य को छोड़कर राजसमूह और अन्तःपुर के लोगों के साथ भण्डि के आगमन की प्रतीक्षा करते हुए क्षण भर अपने भवन में ठहरे । प्रतीहारों के रोक लगा देने से भवन के सब परिजन इशारे से काम करते थे । कुछ समय के बाद भण्डि अकेला ही घोड़े पर सवार कुछ कुलपुत्रों को साथ किए

अष्टम उच्छ्वास: राज्यश्री की खोज, दिवाकरमित्र व उपसंहार

३६४ हर्षचरितम् रिपुशरशल्यपूरितेन निखातबहुलोहकीलकपरिकररक्षितस्फुटनेनेव हृद- येन, हृदयलग्नैः स्वामिसत्कृतैरिव श्मश्रुभिः, शुचं समुपदर्शयन्दूरीकृत- व्यायामशिथिलभुजदण्डदोलायमानमङ्गलवलयैकशेषालंकृतिरनादरोपयु- क्तताम्बूलविरलरागेण शोकदहनदह्यमानस्य हृदयस्याङ्गारेणेव, दीर्घनिः- श्वासवेगनिर्गतेनाधरेण शुष्यता स्वामिविरहविधृतजीवितापराधवैलक्ष्या- दिव, बाष्पवारिपटलेन पटेनेव प्रावृतवदनः, विशन्निव दुर्बलीभूतैः स्वाङ्गै- मपत्रपयाङ्गैरेवमग्निव च व्यर्थीभूतभुजोषमाणमायतैर्निःश्वसितैः, पातकीव, अपराधीव, द्रोहीव, मुषित इव, छलित इव, यूथपतिपतनविषण्ण इव वेगदण्डवारणः, सूर्यास्तमयनिःश्रीक इव कमलाकरः, दुर्योधननिधनदु- र्मना इव द्रौणिः, अपहृतरत्न इव सागरो राजद्वारमाजगाम । अवतीर्य च तुरङ्गमादवनतमुखो विवेश राजमन्दिरम् । दूरादेव च विमुक्ताक्रन्दः पपात पादयोः । श्मश्रुरिति । शोकवशेन ततो विच्छित्त्वाद्वा । राजद्वार पर आया । उसके कपड़े मलिन थे, उसकी छाती में शत्रु के बाणों के घाव थे । लोहे के कड़े कीलों वाले परिकर के धारण कर लेने से वह बच निकला था । स्वामी के आदर से मानों उसकी दाढ़ी छाती तक बढ़ आई थी, जिससे उसके शोक का पता चल रहा था। बहुत दिनों से व्यायाम के छूट जाने के कारण उसके हाथ पतले पड़ गए थे और उसका मंगलवलय खिसक कर नीचे कलाई में आ गया था । बिना मन के चबाए हुए पान की लाली शोक की अग्नि से जले हुए हृदय के अंगारे की भांति लग रही थी । उसका अधर लम्बी सांस के निकलते रहने से सूख रहा था, मानों स्वामी के विरह के बाद भी जीवित रहने के अपराध से लज्जित था। आँसुओं की झड़ी ऐसे लगी थी मानों उसके मुँह पर शोकपट ढँका हो । लज्जा के मारे उसके अङ्ग अपने आप में सिमटते जा रहे थे । वह लम्बी सांसों से मानों व्यर्थ पड़ी भुज की गरमी को छोड़ रहा था। वह पातकी, अप- राधी, द्रोही, लुटा हुआ, छला हुआ जैसा लग रहा था। उसकी ऐसी दीन दशा थी जैसे यूथपति के मरने पर तरुण हाथी की हो जाती है। वह उस सरोवर के समान था जो सूर्य के अस्त हो जाने से हो जाता है, जैसे दुर्योधन के मर जाने से अश्वत्थामा दुःखी हुआ उसी प्रकार वह भी राज्यवर्धन के निधन से विषादमग्न था। वह उस समुद्र की भांति था जिसमें से रत्न हर लिया गया हो । घोड़े से उतर कर वह मुँह लटकाए ही राजमंदिर के भीतर गया। दूर ही से धाड़ मार कर वह पैरों पर गिर पड़ा ।

सप्तम उच्छ्वासः ३६५ अवनिपतिरपि दृष्ट्वा तमुत्थाय प्रविरलैः पदैः प्रत्युद्गम्योत्थाप्य च गाढमुपगूह्य कण्ठे करुणमतिचिरं रुरोद । शिथिलीभूतमन्युवेगश्च पुरैव पुनरागत्य निजासने निषसाद । प्रथमप्रक्षालितमुखे च भण्डौ मुखं प्रक्षा- लयत् । समतिक्रान्ते च कियत्यपि कालकलाकलापे भ्रातृमरणवृत्तान्त- मप्राक्षीत् । अथकथयच्च यथावृत्तमखिलं भण्डिः । अथ नरपतिस्त- मुवाच—'राज्यश्रीव्यतिकरः कः ?' इति । स पुनरवादीत्—'देव ! देव- भूयं गते देवे राज्यवर्धने गुप्तनाम्ना च गृहीते कुशस्थले देवी राज्यश्रीः परिभ्रश्य बन्धनाद्विन्ध्याटवीं सपरिवारा प्रविष्टेति लोकतो वार्तामशृण- वम् । अन्वेष्टारस्तु तां प्रति प्रभूताः प्रहिता जना नाद्यापि निवर्तन्ते' इति । तच्चाकर्ण्य भूपतिरब्रवीत्—'किमन्यैरनुपदिभिः यत्र सा तत्र परित्यक्तान्यकृत्यः स्वयमेवाहं यास्यामि । भवानपि कटकमादाय प्रवर्ततां गौडाभिमुखम्।' इत्युक्त्वा चोत्थाय स्नानभुवमगात् । कारितशोकश्म- श्रुवपनकर्मणा च महाप्रतीहारभवनस्नातेन, शारीरिकवसनकुसुमाङ्गरागा- लंकारप्रेषणप्रकटितप्रसादेन भण्डिना सार्धमभुक्त, निनाय च तेनैव सह वासरम् ।

हर्ष उसे देखकर उठे और लड़खड़ाते पैरों से आगे बढ़ उसे गले लगाया और स्वयं भी देर तक फूट-फूट कर रोते रहे । जब उनका शोक कुछ कम हुआ तब पहले की तरह आकर आसन पर बैठ गए । जब भण्डि अपना मुँह धो चुका तब उन्होंने भी धोया । कुछ देर के बाद भाई की मृत्यु का वृत्तान्त पूछा । जैसा हो चुका था भण्डि ने सब हाल कह सुनाया । तब राजा ने उससे फिर कहा—'राज्यश्री की क्या गति हुई ?' वह फिर बोला— 'देव, देव राज्य वर्धन के दिवंगत होने पर जब गुप्त नाम के व्यक्ति ने कान्यकुब्ज पर अधिकार कर लिया तो देवी राज्यश्री किसी प्रकार बन्धन से छूट कर अपने परिवार के साथ विन्ध्याचल के जंगल में चली गई । यह मैंने लोगों के मुँह से सुना है । बहुत खोज- पड़ताल करने वाले आदमी वहाँ भेजे गए जो अभी तक नहीं लौटे ।' यह सुनकर राजा ने कहा—'औरों के ढूँढने से क्या ? जहाँ राज्य श्री है मैं वहां दूसरे सब काम छोड़ कर स्वयं जाऊँगा । तुम भी सेना लेकर गौड़ पर चढ़ाई करो।' यह कहकर वे उठे और स्नानभूमि में चले गए । भण्डि ने हर्ष के कहने पर शोक से बढ़े हुए केशों का क्षौर कराया और महाप्रतीहार-भवन में स्नान किया । हर्ष ने उसके लिए वस्त्र, पुष्प, अंगराग और आभूषण भेज कर अपना प्रसाद प्रकट किया और साथ ही भोजन किया । एवं वह दिन उसके साथ ही बिताया ।

३६६ हर्षचरितम्

अथापरेद्युरुषस्येव भण्डिर्भूतपालमुपसृत्य व्यज्ञापयत्—'पश्यतु देवः श्रीराज्यवर्धनभुजबलार्जितं साधनं सपरिबर्हं मालवराजस्य' इति । नर- पतिना स 'एवं क्रियताम्' इत्यभ्यनुज्ञातो दर्शयांबभूव । तद्यथा—अन- वरतगलितमदमदिरामोदमुखरमधुकरजूटाजटिलकरटपट्टपङ्किलगण्डान् , गण्डशैलानिव जङ्गमान् , गम्भीरगर्जितरवाञ्जलधरानिव महीमवतीर्णा- नुत्फुल्लसप्तच्छदवनामोदमुचः, शरदिवसानिव पुञ्जीभूतान् , अनेकसहस्र- संख्यान्करिणः, चारुचामीकरचित्रचामरमण्डलमनेहरांश्च हरिणरंहसो हरीन् , बालआतपविसरवर्षिणां च किरणैरनेकेन्द्रायुधीकृतदशदिशामलं- काराणां विशेषान् , विस्मयकृतः स्मरोन्मादितमालवोकुचपरिमलदुर्ललि- तांश्च निजज्योत्स्नापूरप्लावितदिगन्तानपि तारान्हारान् , उडुपतिपादसं- चयशुचीनि निजयशांसीव बालव्यजनानि, जातरूपमयनालं च निवा- मपुण्डरीकमिव श्रियः श्वेतमातपत्रम् , अप्सरस इव बहुसमररससाहसा- नुरागावतीर्णा वारविलासिनीः, सिंहासनशयनासन्दीप्रभृतीनि सद्योप- करणानि, कालायसनिगडनिश्चलीकृतचरणयुगलं च सकलं मालवराजलो-

उसके बाद दूसरे दिन पौ फटते ही भण्डि ने राजा के पास आकर निवेदन किया— 'श्री राज्यवर्धन के भुजबल से मालवराज की जो सेना साज-सामान के साथ जीती गई है उसे देव देखने की कृपा करें।' राजा ने 'ऐसा ही करो' जब यह आज्ञा दी तो उसने वह सब सामान दिखाया। हजारों की संख्या में अनेक हाथी, जिनके गण्डस्थल को हमेशा बहते हुए मदजल की मादक गंध से आकृष्ट होकर लूझते हुए भौंरे पंकिल बना रहे थे, जो चलते-फिरते गण्डशैल की भांति लग रहे थे और इस प्रकार चिग्घाड़ रहे थे मानों पृथिवी पर उतरे हुए मेघ हों, और खिले हुए तमाल वन की तरह जिनकी गंध फैल रही थी। हरिण की भांति तेज चाल वाले घोड़े सुन्दर सुनहली चौरियों से सजे थे। बहुत से अलंकार, जिनकी किरणें बालआतप के रूप में निकल रही थीं, अपनी रंग-बिरंगी प्रभा से दिशाओं में इन्द्रायुधों का निर्माण कर रहे थे। आश्चर्य करने वाले शुद्ध मोतियों से पोहे गए तारहार जिनमें काम से मतवाली मालवी स्त्रियों के कुचों के परिमल लगे हुए थे और जो अपनी ज्योत्स्ना के प्रभाव से दिशाओं को प्लावित कर रहे थे। चन्द्रमा के किरणसमूह के समान सफेद चँवर जो हर्ष के अपने यश की भांति प्रतीत हो रहे थे। सुवर्ण दण्ड वाला श्वेत छत्र, जो मानों लक्ष्मी के निवास का कमल हो। वेश्याएँ, जो मानों अनेक युद्धों के देखने के साहस और अनुराग से पृथिवी पर उतरी हुई अप्सराएँ हों। सिंहासन, शयनासन आदि राज्य का सामान पैरों में

कम्, अशेषंश्च ससंख्यालेख्यपत्रान्, सालंकारापीडपीडान् कोशकल- शान् । अथालोच्य तत्सर्वमवनिपालः स्वीकृतं यथाधिकारमादिशदध्य- क्षान् । अन्यस्मिंश्चाहनि हयैरेव स्वसारमन्वेष्टुमुच्चचाल विन्ध्याटवीमवाप च परिमितैरेव प्रयाणकैस्ताम् । अथ प्रविशन्दूरादेव दह्यमानषष्टिकतुसविसरविसारिविभावसूनां वन्यधान्यबीजधानीनां धूमेन धूसरिमाणमादधानैः, शुष्कशाखासंचयर- चितगोवाटवेष्टितविकटवटैः, व्यापादितवत्सरूपकरोषाविष्टगोपालकल्पित- व्याघ्रयन्त्रैः, अयन्त्रितवनपालहठह्रियमाणपरग्रामीणकाष्ठिककुठारैः, गहन- तरुखण्डनिर्मितचामुण्डामण्डपैर्र्वनप्रदेशैः, प्रकाश्यमानमटवीप्रायप्रान्त- तया कुटुम्बभरणाकुलैः कुद्दालप्रायकृषिभिः कृषीवलैर्बलवद्भिरुच्चभागभा- षितेन भज्यमानभूरिशालिखलक्षेत्रखण्डलकमलपावकाशैश्च कापिलै., का- लायसैरिव कृष्णमृत्तिकाकठिनैः, स्थानस्थानस्थापितस्थाणूत्थितस्थूलप- लोहे की बेड़ी पहने हुए मालव के राजा लोग। कोष से भरे हुए कलसे, जिनपर ब्यौरे की पट्टियां लगी थीं और जिनके गले में आभूषणों की बनी मालाएँ पड़ी थीं। सब सामान को देखकर हर्ष ने अपने विभिन्न अधिकारी अध्यक्षों को उसे विधिपूर्वक स्वीकार करने की आज्ञा दी। दूसरे दिन घोड़ों से बहन राज्यश्री को ढूँढने के लिए प्रस्थान किया और कुछ ही पड़ावों के बाद विन्ध्याटवी में पहुँच गए। उसमें प्रवेश करते ही उन्होंने वनबस्ती के चारों ओर के वन-प्रदेश पर दृष्टिपात किया जो उसका दूर ही से परिचय दे रहे थे। वहाँ के लोग साठी चावल का भूसा जला लेते थे और उसकी फैलती हुई आग बनैले धान तक पहुँच कर वनप्रदेश को धुमैला बना रही थी। कहीं पुराने खंखाड़ बरगद के चारों ओर सूखी लकड़ियों के अम्बार लगाकर गायों का बाड़ा बनाया गया था। कहीं बाघों ने बछड़ों पर वार किया था तो उससे खीझकर ग्वालों ने बाघ को फँसाने का जाल लगा रखा था। स्वतन्त्र विचरण करने वाले वनपालों ने गाँवों से आकर लकड़ी काट ले जाने वाले लकड़हारों के कुठार जबर्दस्ती छीन लिये थे। पेड़ों के घने झुरमुट में चामुण्डा देवी का मण्डप बना हुआ था। वनग्राम के चारों ओर जङ्गल के सिवा और कुछ न था। इसलिए किसान कुटुम्ब का पेट पालने के लिये व्याकुल रहते थे और उसी चिन्ता में दुर्बल होकर जोर-जोर से आवाज करते हुए केवल कुदारी से खोदकर परती जमीन तोड़ते और खेत के टुकड़े निकाल लेते। खेत छोटे-छोटे और कहीं-कहीं पर थे। भूमि काश से भरी हुई थी। काली मिट्टी लोहे के तवे की तरह कड़ी थी। कुदारी ही उनका एक सहारा था। जगह-जगह पर काटने से पेड़ों के ठूँठ पड़े

३६८ हर्षचरितम् ङ्गवैः दुरुपगमश्यामाकप्ररूढिभरलम्बुसबहुलेः, अविरहितकोकिलाक्षक्षुपै- र्विरलविरलैः केदारैः, कृच्छ्रात्कृष्यमाणैरैनातिप्रभूतप्रवृत्तगतागतप्रहतभुव- मुपचेत्रमुपरचितैरुञ्चैर्मञ्चैश्च सूच्यमानश्वापदोपद्रवं, दिशि दिशि च प्रति- मार्गद्रुमकूतानां पथिकपादप्रस्फोटनधूलिधूसरैर्नवपल्लवैर्लाञ्छितच्छाया- नाम्, अटवीसुलभसालकुसुमस्तबकाञ्चितनवखातकूपिकोपकण्ठप्रतिष्ठित- नागस्फुटानामच्छिद्रकटकल्पितकुटीरकाणाम्, कुटिलकीटवेणीवेष्ट्यमान- शक्तुशारशरावश्रेणीश्रितानाम्, अध्वगजनजग्ध जम्बूफलास्थिशबलसमीप- भुवाम्, उद्वूलितधूलीकदम्बस्तबकप्रकरपुलकिनीनाम्, कण्टकितकर्करी- चक्राक्रान्तकाष्ठमञ्चिकामुषिततृषाम्, तंभ्यत्तलशीतलसिकतिलकलशीश- मितश्रमागाम्, आश्यानशैवलश्यामलितलिञ्जरजायमानजलजडिम्नाम्, उदकुम्भाकृष्टपाटलशर्कराशकलशिशिरीकृतदिशाम्, घटमुखघटितकटहार- पाटलपुष्पपुटानाम्, शीकरपुलकितपल्लवपूलीपाल्यमानशोप्यसरसिशिशु- थे। उनमें फिर से पत्ते निकल रहे थे। खेतों में साँवा का जङ्गल लहरा रहा था। छुईमुई भी खूब बढ़ आई थी। तालमखाने के छोटे-छोटे पौधों से भी चलने में कठिनाई होती थी। खेत बड़ी कठिनाई से जोते जाते थे। आने जाने वाले कम थे, इसलिए पगडण्डियाँ साफ दिखायी न पड़ती थीं। खेतों के पास ऊँचे बँधे हुए मचानों से यह सूचित हो रहा था कि यहाँ जङ्गली जानवर उपद्रव करते हैं। जंगल के प्रवेशमार्गों पर प्याउओं का विशेष प्रबन्ध था। पेड़ों के झुरमुट में प्याऊ के स्थान बना लिए गये थे। पथिक वहाँ आते और पल्लवों की टहनी तोड़कर पैरों की धूल झाड़कर छाया में बैठते थे। नई खोदी हुई छोटी कुइयाँ पर जङ्गली साल के फूलों के गुच्छे टांग दिए गए थे और समीप में नागफनी से घेर दिया गया था। वहीं पर प्याऊ की मड़ैया घने घास-फूस से छा ली गई थी। सत्तू खाकर पथिकों ने जो सिकोरे फेंक दिए थे उन पर जंगली मक्खियाँ भिनभिना रही थी। प्याऊ के समीप की भूमि पथिकों को खाये जामुन की गुठलियों से रङ्गविरंग की हो रही थी। कदम्बों के फूलों से लदी हुई टहनियाँ तोड़कर धूल में फेंक दी गई थीं। काठ की बढ़ौचियों पर प्यास बुझाने के लिए मिट्टी की गगरियाँ, जिन पर काँटे जैसे बुन्दकियों की सजावट बनी थी, रखी हुई थीं। बालू की ठण्डी कलसियों में पानी पड़ जाने से जब वे रिसती थीं तो उन्हें ही देखकर पथिकों की थकान दूर हो जाती थी। कुछ सिम-सिम सिरवाकों के लपेट देने से नीले रङ्ग के नादों का जल खूब ठण्डा हो गया था। जल निकाल करके जलकुंभों में लाल शर्करा रखी गयी थी, जो चारों ओर ठंडक फैला रही थी। घड़े के मुँह गेहूँ की नालियों या तिनके के ढक्कन से ढँके थे, और उनके

सप्तम उच्छ्वासः ३६६

सहकारफलजूटीजटिलस्थाणूनाम्, विश्राम्यत्कार्पटिकपेटकपरिपाटीपीय- मानपयसामटवीप्रवेशप्रपाणां शैत्येन त्याजयन्तमिव ग्रैष्ममूष्माणं क्वचि- दन्यत्र ग्राहयन्तमिवाङ्गारीयदारुसंग्रहदाहिभिः व्योकारैः, सर्वतश्च प्रातिवे- श्यविषयवासिना समासन्नग्रामगृहस्थगृहस्थापितस्थविरपरिपाल्यमानपाथे- यस्थगितेन कृतदारुणदारुव्यायामयोग्याङ्गाभ्यङ्गेन स्कन्धाध्यासितकठोर- कुठारकण्ठलम्बमानप्रातराशपुटेन पाटच्चरप्रत्यवायप्रतिपन्नपटच्चरेण काल- वेत्रकत्रिगुणप्रततिवलयपाशग्रथितग्रीवाग्रथितैः पत्रवीटावृतमुखैः, बोटकूटै- रूढवारिणा पुरःसरबलद्वलीवर्दयुगसरेण नैकटिककुटुम्बिकलोकेन काष्ठ- संग्रहार्थमटवीं प्रविशता श्वापदव्यधनव्यवधानबहलीसमारोपितकुटीकृत- कूटपाशैश्च गृहीतमृगतन्तुतन्त्रीजालवलयवागुरैः, बहिर्व्याधैर्विचरद्भिरंसा-

ऊपर जल सुवासित करने के लिए पाटल के फूल रखे गये थे । भीतर थूनियों के सिरों पर बाल सहकार के फलों की डालें झूल रहीं थीं और हरे पत्तों पर पानी का छींटा देकर उनके झुगते हुए फलों को ताजा रखा जा रहा था । झुंड के झुंड यात्री प्याऊ में आकर पानी पी रहे थे । प्रपाओं की ठण्डक से ग्रीष्म की गरमी कम पड़ रही थी । दूसरी ओर लकड़ी के ढेरों में आग लगाकर अङ्गार बनाने वाले लुहार फिर उतनी ही तपन पैदा कर रहे थे । पड़ोसी प्रदेश में रहने वाले निकटवासी कुणबी (कुटुम्बिक) जाति के लोग काष्ठ- संग्रह के लिए जंगल में आ रहे थे। निकट के गांवों में रहने वाले गृहस्थों के घर पर अपने भोजन के सामान रख आये थे और बूढ़ों को रखवाली के लिए बैठा आये थे । लकड़ियों के साथ कुल्हाड़ा भाँजने की कसरत के बर्दाश्त के लिए शरीर में तेल की मालिश कर रखी थी । उनके कन्धों पर भारी कुठार रखे थे और गले में कलेवे में पोटकी लटक- रही थी। चोरों के डर से फटे-पुराने कपड़े पहन रखे थे । उनके गले में काले बेंत की तिलड़ी माला लपेटी हुई थी और उसी से पानी की लम्बोतरी घड़ियों जिनके मुँह में डाट लगी थी, लटकी हुई थीं। उनके आगे लकड़ी लादने के लिए बैलों की जोड़ी चल रही थी। आधे ग्राम के बाहर वाले जंगल में विचर रहे थे । जंगल के खूंखार जानवरों के शिकार में घुसने के लिए टट्टियाँ लगाई थीं और शिकारी कूटपाशी की गेडुरी बनाकर साथ में लिये थे । उनके हाथ में पशुओं के नसों की डोरियों, जाल और फन्दे थे । कुछ दूसरी तरह के बहेलिये चिड़ियों फसाने वाले शाकुनिक विचर रहे थे, जो कन्धेपर बीतंसक जाल या डला लटकाये थे, जो उनके बालपाशिक आभूषण से उलझ-उलझ जाते थे । उनके हाथों में बाज, तीतर और भुजंगा आदि के पिंजड़े थे । चिड़ीमारों के लड़के बेलों पर लासा लगाकर गौरैया पकड़ने के इरादे में इधर से उधर फुदक रहे थे । चिड़ियों

१. 'पीत' इति ।

४०० हर्षचरितम् वसकवीतंसव्यालम्बमानबालपाशिकैश्च संगृहीतग्राह्रकक्रकरकपिञ्जलादि- पञ्जरकैः शाकुनिकैः, संचरद्भिश्चयुतलासकलेशालितलतावधूलद्बालम्पटानां चपेटकैः, पाशकशिणूनामटद्भिः तृणस्तम्बान्तरिततित्तिरतरलायमानकौले यककुलचाटुकारैश्चलद्विहगमृगयां मृगयुयुवभिः क्रीडद्भिः, परिणतचक्रवाक- कण्ठकषायरूचां शीधव्यानां वल्कलानां कलापान्, नातिचिरोद्धृतानां च धातुत्विषां धातकीकुसुमानां गोणीरगणिताः पिचव्यानां चातसीगण- पट्टमूलकानां पुष्कलान्संभारान्, भारांश्च मधुनो माक्षिकस्य मयूराङ्गज्- स्याक्लिष्टमधूच्छिष्टचक्रमालानां लम्बमानलामजकमुञ्जजटानामपत्वचां खदिरकाष्ठानां कुष्ठस्य कठोरकेसरिसटाभारबभ्रुणश्च रोध्रस्य भूयसो भारकान्, लोकेनादाय व्रजता प्रविचितविविधवनफलपूरितपिटकमस्त- काभिश्चाभ्यर्णग्रामगत्वरीभिस्त्वरमाणाभिर्विक्रयचिन्ताव्यग्राभिर्भ्रामेयकाभि- र्व्याप्तदिगन्तरमितस्ततश्च युक्तशूरशकुरशाकराणां पुराणपांसूत्किरकरीष- कूटवाहिनीनां धूर्गतधूलिधूसरसैरिरभसरोपस्वरसार्यमाणानां संक्रीडकटुल- मधुनः क्षौद्रस्य । मयूराङ्गजस्य बर्हिपिच्छस्य । मधूच्छिष्टं सिक्थकम् । लामज्ज केति । 'लामज्जकं लघुलयम्' इत्यमरः। उशीरभेद इत्यन्ये । बभ्रुगः कपिलस्य । रोध्रस्येति । रोध्रो लोध्रः । शाबरकः 'शिल्लकः शिल्लुकस्त्वरः । तिरीटः कानहीरश्च शिल्लो शाबरपादपः' । शकुरास्तरुगाः । शाकरा बलीवर्दाः । करीषं शुष्कगोमयम् । उक्तं च—'गोविष्ठोमयमस्त्रियाम् । तत्तु शुष्कं करीषोऽस्त्री' इति । सैरिको हालिकः । के शिकार के शौकीन नवयुवक लोग शिकारी कुत्तों को जो बीच-बीच में झाड़ी में उड़ते हुए तीतरों की फड़फड़ाहट से बेचैन हो उठते थे, पुचकार रहे थे। गाँव के लोग वन की उपज के बोझ सिर पर उठाये जा रहे थे। कोई पुराने चक्रवाक के गले की तरह लाल पीली सेंहुड़ की छाल का गट्ठा लिए था। किसी के पास तुरत तोड़े हुए गेरू की तरह लाल वर्ण वाले धाय के फूलों की बोरियाँ थीं। कई लोग रुई, अलसी, सन के मुट्ठों का बोझा लिए थे । मधुमक्खी की शहद, मोर के पिच्छ, छाल उधेड़ी हुई कत्थे की लकड़ी, जिसपर खस की जटायें लटक रही थीं, कूठ (एक पौधा) पुराने सिंह के केसर के समान पीले- पीले लोध के भार सिरों पर उठाये बोझिये जा रहे थे। गाँवई स्त्रियों ने अनेक प्रकार के जंगली फूलों को बीन-बीन कर टोकरे भर लिए थीं और उन्हें बेचने की चिन्ता में व्यग्र होकर जल्दी-जल्दी डेग रखती हुई पास के गाँवों में चली जा रही थीं। एक ओर छोटी-छोटी गाड़ियाँ इधर-उधर चली जा रही थीं। उनमें पुष्ट और तरुण बैल जुते थे । वे पुराने खाद कूड़े के ढेर ढो रही थीं। उनमें जुते हुए बैल धूल से

सप्तम उच्छ्वासः ४०१ चक्रचीत्कारिणीनां शकटश्रेणीनां संपातैः, संपाद्यमानदुर्बलोर्वीविरूक्षक्षेत्र- संस्कारमारक्षिक्षिप्तदान्तवाहकद्ण्डोड्डीयमानहरिणेलालङ्घिततुङ्गवैणववृति- भिश्च निखातगौरकरङ्ककुशङ्कितशशक शकलिततुङ्गशुङ्गैः, प्रयत्नप्रभृतवि- शङ्कटविटपैर्वाटैरेक्षवैः सुबहुभिः श्यामायमानोपकण्ठमतिविप्रकृष्टान्तरैर्मर- कतस्निग्धसुहावाटवेष्टितैः, कार्मुककर्मण्यवंशविटपसंकटैः, कण्टकितकर- ञ्जराजिदुष्प्रवेश्यैः, उरुबूकवचावङ्गकसुरमसूरणशिग्रुग्रन्थिपर्णगवेधुकागर्मु- संक्रीडत्कूजत् । वृत्तिर्वाटोपान्ते लताकृतः प्राकारमयः । करङ्कः कङ्कालः । तदुप- लक्षिताः शङ्कवः । शुङ्गोऽग्रभागः । वृत्तिरित्यन्ये । प्रभृताः पोषिताः । विशङ्कटा विस्तीर्णाः । विटपाः शाखाः । अतिविप्रकृष्टत्यादि । अटवीकुटुम्बिनां गृहैरुपेतमिति वनग्रामविशेषणम् । स्नुहा सुधावृक्षः । उक्तं च—'स्नुक्स्नुहा च सुधावृक्षः शुंभी निस्त्रिंशपत्रकः । समन्तदुग्धी गण्डोरी सेहुण्डो वज्रकन्दकः' ॥ इति । कर्मणि साधुः कर्मण्यः । करञ्जो नक्तमालः । उक्तं च—'करञ्जो नक्तमालः स्यात्प्रतीतश्विरबिल्वकः' इति । उरुबूक एरण्डः । उक्तं च—'उरुबूकस्तथैरण्डो रुबको वातनाशनः । पञ्चाङ्गुलो वर्धमानश्चित्रो गन्धर्वपात्तथा ॥' वचा उग्रगन्धा । उक्तं च—'वचोग्रगन्धा गोलोमी जटिलोग्रा सलोमशा' इति । वङ्गको हरीतकीविशेषः । सुरसो भूतघ्नी । उक्तं च—'सुरसा तुलसीद्वुः स्यादलसो बहुमञ्जरी । अपेतो राक्षसो गौरी भूतघ्नी देवदुन्दुभिः ।' इति । सूरणः कन्दविशेषः । शिग्रुः सौभाञ्जनः । उक्तं च—'साभा- ञ्जनः कृष्णगन्धा मुखभञ्जोऽथ शिग्रुकः' इति । ग्रन्थिपर्णः मुस्ताकारः सुगन्धिकन्द- विशेषः । उक्तं च—'ग्रन्थिपर्णोऽशुकं बर्हिपुष्पं स्थौणेयकुन्दुरे' इति । गवेधुका लथपथ थे और चलने के लिए ललकारे जा रहे थे । डगमग पहिये घिसटते हुये चुं-चूं कर रहे थे । जिन खेतों की उपजाऊ शक्ति कम हो गई थी, उनमें लाद कर कूड़ा-कर्कट डाले जा रहे थे । गन्नों के खूब लहलहाते हुए बहुत से खेतों के बाड़े गाँव की हरियाली बढ़ा रहे थे । खेतों के रखवाले जब गन्नों में छिपे हुये हिरनों को ताककर बेलों को हाँकने का डण्डा उनकी ओर चलाते तो हिरन छलाँग मार कर ऊंची बाँसों की बाड़ से उस पार निकल जाते थे । जंगली भैसों के कंकाल खेत में काँटे की तरह गाड़े गये थे, उनसे डरे हुए खरहे गन्ने के ऊँचे अंकुरों को ही कुतर डालते थे । गन्नों के पौधे बड़े यत्न से बढ़ाये गये थे । वनग्राम के घर एक-दूसरे से काफी दूरी पर थे । उनके चारों ओर मरकत के जैसे चिकने हरे रङ्गवाली सेंहुड़ की बाड़ लगी थी । धनुष बनाने के काम में लाने योग्य बाँसों की बँसवारी पास में उग रही थी । करंजुए के कांटेदार वृक्षों की पंक्ति में रास्ता बना कर घुसना मुश्किल था । एरंड, बचा, बंगक (बैंगन), तुलसी, सूरनकन्द, मोंडिजन. गंठिनवन, गरबेरुआ और मरुश्रा धान के गुश्म घरों २६ ह० च०

४०२ हर्षचरितम् दृगुल्मगहनगृहवाटिकाैः, निखातोच्चकाष्ठारोपितकाष्ठालुकलताप्रतानविहित- च्छायैः, परिमण्डलबदरीमण्डपकतलनिखातखादिरकील बद्धवत्सरूपैः, कथमपि कुक्कुटरटितानुमीयमानसंनिवेशैरङ्गनाशस्तिस्तम्भतलविरचितप- क्षिपूपिकावापिकैर्विकीर्णबदरपाटलपटलैः, वेगुपोटदलनकलितशरमयुष्टु- तिविहितभित्तिभिः, किंशुकगोरोचनारचितमण्डलमण्डपबल्वजबद्धाङ्काररा- शिभिः, शाल्मलीफलतूलसंचयबहुलैः, संनिहितनलशालिशालूकखण्ड- कुमुदबीजवेगुतण्डुलैः, संगृहीततमालबीजैः, भस्ममलिनम्लानकाश्मर्य- कूटव्याधृतकटैराश्यानराजादनमदनफलस्फीतैर्मधूकासवमद्यप्रायैः, कुसुमभ- तृणधान्यभेदः । गर्मुङ्गतागुल्मः । ‘अप्रकाण्डे स्तम्बगुल्मौ’ इति काष्ठालुकलता अलाबुवल्ली । स्वल्पा वत्सा वत्सरूपा । संनिवेशो रचना । अगस्तिर्मुनितरुः । पक्षिपूपिका पक्षिणां वेत्रवलानि भाण्डभेदः । पोटः शकलः । किंशुकानि पलाश- वृक्षपुष्पाणि । बल्वजस्तृणभेदः । बन्धकाष्ठ इति प्रसिद्धः । शाल्मली रक्त- पुष्पा । उक्तं च—‘शाल्मली रक्तपुष्पा च कुर्कुटी स्थिरजीविता । पिच्छिला तूलिनी मोचा कण्टकाढ्या सुपूरिणी ॥’ इति । तूलं कर्पासः । नलशालिः शालिभेदः । शालूकं पद्ममूलम् । उक्तं च—‘पद्ममूलं तु शालूकं सकिलं तत्किरात- कम् । शालीनं पद्मकन्दं च जालालूकं निगद्यते ॥’ इति । काश्मर्यः कश्मीरीहीरः । ‘काश्मीरी मधुमत्यपि । श्रीपर्णी सर्वतोभद्रा गम्भीरी कृष्णमृत्तिका ॥’ इति । कूटाः कुनालानि । राजादनः कपीष्टः । उक्तं च—‘क्षीरोदस्त्व राजन्यः क्षीरमृत्स्नः कपी- नृपः । राजादनो दृढस्कन्धः कपीष्टः प्रियदर्शनः ॥’ इति । मदनो रोधः । उक्तं च— ‘मदनः शल्यको रोधो गालः पिण्डीतकः फलम् । भसरः करहाटश्च सुमनोऽति- के साथ लगी हुई बगीचियों में भरे हुए थे। गाड़ी गई ऊँची बल्लियों पर चढ़ाई हुई लौकी की बेलें फैल कर छाया दे रही थीं। बेरी की गेल में मंडपों के नीचे खैर के खूँटे गाड़कर बछड़े बांध दिए गए थे। मुर्गों की कुकड़ूँकूँ से पहचान मिलती थी कि घर कहाँ कहाँ बसे हैं। आंगन में लगे अगस्त्य वृक्ष के नीचे चिड़ियों का चुग्गा खिलाने और पानी पिलाने की हौदियाँ बनी हुई थीं और लाल बेरों की चादरसी बिछी थी। घरों की दीवारें बांस के फट्टे, नरकुल और सरकंडों को जोड़ कर बना ली गई थीं। कोयले के ढेरों पर बबइ घास के मड़वे छाए थे, जिनपर पलास के फूल और गोरोचना की सजावट थी। घरों में सेमल की रूई ढेर के ढेर पड़ी थी। नलशालिकमल की जड़, खंड शर्करा, कमलबीज, बाँस, तंडुल और तमाल के बीज आदि बटोर कर रखा लिए गए थे। चटाइयों पर गंभीरी के ढेर के ढेर सूख रहे थे और धूल पड़ने से कुछ मटमैले लग रहे थे। खिरनी और मेनफल सुखा कर रखे गए थे। महुए का आसव और चुवाया हुआ मद प्रायः हर

सप्तम उच्छ्वासः ४०३ कुम्भगण्दकुसूलैरविरहितराजमाषत्रपुषकर्कटिकाकूष्माण्डलाबुबीजैः, पोष्य- माणवनबिडालमालुधाननकुलशालिजातजातकादिभिरटवीकुटुम्बिनां गृहै- रुपेतं वनग्रामकं ददर्श । तत्रैव च तं दिवसमत्यवाहयदिति । इति श्रीमहाकविबाणभट्टकृतौ हर्षचरिते छत्रलब्धिर्नाम सप्तम उच्छ्वासः ।

सुपुष्पकः ॥' इति । मधूको गुडपुष्पः । उक्तं च—'गुडपुष्पो रोध्रपुष्पो मालप्रस्थोऽथ माधवः' इति । राजमाषो निष्पावः । त्रपुसं लाडुकः । कर्कटिकादयः प्रसिद्धाः । मालुधाना मालुकावधारुयाः प्राणिभेदाः, नकुलादयश्च । इति श्रीशंकरकविरचिते हर्षचरितसंकेते सप्तम उच्छ्वासः ।

घर में था । प्रत्येक घर में कुसुम्भ, कुंभ और गंडकुसूल भी थे । रवांस, खोरा, ककड़ी, कोहड़ा और लौकियों के बीजों से उनके घर भरे हुए थे । घरों में बनबिलाव, नेवले, मालुधान और शालिजात नाम के पशुओं के बच्चे पले हुए थे । इस प्रकार के वनग्राम में ही हर्ष ने उस दिन को व्यतीत किया । हर्षचरित सप्तम उच्छ्वास समाप्त

अष्टम उच्छ्वासः सहसा संपादयता मनोरथप्रार्थितानि वस्तूनि । दैवेनापि क्रियते भव्यानां पूर्वसेवेव ॥ १ ॥ विद्वज्जनसंपर्को नष्टेष्टज्ञातिदर्शनाभ्युदयः । कस्य न सुखाय भवने भवति महारत्नलाभश्च ॥ २ ॥ अथापरेद्युरुत्थाय पार्थिवस्तस्माद्ग्रामकान्निर्गत्य विवेश विन्ध्याट- वीम् । आट च तस्यामितश्चेतश्च सुबहून्दिवसान् । एकदा तु भूपतेर्भ्रमत एवाटविकसामन्तस्य शरभकेतोः सूनुर्व्याघ्रकेतुर्नाम कुतोऽपि कज्जलश्या- मलश्यामलतावलयेनाधिल्लाटमुर्द्धैः कृतमौलिबन्धम्, अन्धकारिणीम- कारणभुवा भ्रुकुटिभङ्गेन त्रिशाखिन त्रियामामिव साहससहचारिणीं लला- टस्थलीं सदा समुद्वहन्तम्, अवतंसितैकशुकपक्षप्रभाहरितायमानेन पिनद्धकाचरकाचमणिकर्णिकेन श्रवणेन शोभमानम्, किंचिच्चुलुल्लस्य सहसेत्यादियुगलकेन श्रीहर्षाभ्युदयशिवाकारमित्रराज्यश्रीप्राप्त्येकावलीलाभा- न्सूचयति । भव्यानां पूर्वसेवा दैवेन शुभसंपादनेन । शुभाभ्यासभावितचिन्ता भूयोऽपि क्रियत इति प्रतिपाद्यते । एकदा त्वित्यादौ । व्याघ्रकेतुर्नाम कुतोऽपि शबरयुवानमादाय भूपतेरर्थात्समी- पमाजगामेति संबन्धः । अटव्यां भव आटविकः । श्यामा गन्धप्रियङ्गुः । मौलयः केशाः । अन्धकारिणीं कृष्णाम् । त्रिशाखेन त्रिलेखेन । पिनद्धो बद्धः । काचरस्य कपिलस्य काचमणेः कर्णिका यत्र तसेन । चुल्लश्चिल्लः । उक्तं च—'स्युः क्लिन्नाक्षे बड़े लोगों के मन में जिन वस्तुओं की अभिलाषा उत्पन्न होती है, दैव उन्हें उपस्थित करने में देर नहीं लगाता, मानों वह भी पहले से उनकी सेवा करता रहता है । विद्वानों का संपर्क, भूले हुए अपने प्रिय बन्धु का दर्शन और अपने ही भवन में बहु- मूल्य रत्नों का लाभ—ये तीनों किसे सुख नहीं देते ? दूसरे दिन हर्ष उठे और उन्होंने उस वनग्राम से निकल कर विन्ध्याटवी में प्रवेश किया । बहुत दिनों तक उसी में इधर-उधर घूमते रहे । एक दिन जब राजा भटक ही रहे थे कि जंगली प्रदेशों के राजा शरभकेतु का लड़का व्याघ्रकेतु कहीं से एक शबर युवक को साथ लेकर मिलने आया । उस शबर युवक ने ललाट के ऊपर सांवली प्रियंगुलता से अपने बालों का जूड़ा बांध लिया था । बिना कारण के ही उसकी भौंहें तिरछी हो गई थीं, मानों वह साहस करके पास आई अंधेरी रात की भांति अपनी ललाटस्थली को हमेशा