हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 398, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तम उच्छ्वासः ३५१ राजतानि जातरूपमयानि च सहस्रशस्तिलपात्राणि कनकपत्रलतालंकृत- शफशृङ्गशिखरा गाश्चार्बुदशः, समुपविश्य विततव्याघ्रचर्मणि भद्रासने विलिप्य प्रथमविलिप्तायुधो निजयशोधवलेनाचरणनश्चन्दनेन शरीरं, परिधाय राजहंसमिथुनलक्ष्मणी सदृशे दुकूले, परमेश्वरचिह्नभूतां शशि- कलामिव कल्पयित्वा सितकुसुममुण्डमालिकां शिरसि नीत्वा, कर्णाभरण- मरकतमयूखमिव कर्णगोचरतां गोरोचनाच्छुरितमभिनवं दूर्वापल्लवं विन्यस्य सह शासनवलयेन गमनमङ्गलप्रतिसरं प्रकोष्ठे परिपूजितप्रहृष्ट- पुरोहितकरप्रकीर्यमाणशान्तिसलिलसीकरनिकराभ्युक्षितशिराः संप्रेष्य म- हार्हाणि वाहनानि बहलरत्नालोककलितककुम्भि च भूषणानि भूभुजां संवि- भज्य क्लिष्टकार्पटिककुलपुत्रकलोकमोचितैः प्रसाददानैश्च विमुच्य बन्ध- नानि सकलानि नियुज्य तत्कालस्मरणस्फुरणेन कथितात्मानमिव चाष्टा- तरङ्गः । आशुशुक्षणिमग्निम् । राजतानि रौप्यानि । जातरूपं सुवर्णम् । पत्रलता पत्रभङ्गः । शफाः खुराः । अर्बुदं दशकोटयः । नृपासनं भद्रासनम् । उक्तं च— 'नृपासनं भद्रासनं, सिंहासनं तु तद्धैम'मिति । परमेश्वरो राजा, हरश्च । शासन- वलयेन मुद्राकटकेन । प्रतिसरं कङ्कणम् । तिलपात्र और सोने के पत्तरों में मढ़े खुर और सींगों वाला असंख्य गायें ब्राह्मणों को दान में दिया । व्याघ्रचर्म पर भद्रासन बिछा कर विराजमान हुए । पहले अपने आयुध में यश के समान धवल चन्दन लगाया और फिर अपने सिर से पैर तक उसका लेप किया । फिर कोनों पर छपे हंसमिथुन वाले दुकूल वस्त्रों का जोड़ा धारण किया । शिव के चिह्न के रूप में चन्द्रकला के समान श्वेत फूलों की मुण्डमालिका को सिर पर रखा । कानों में मरकत के कर्णाभरण सदृश, गोरोचनों से युक्त सुन्दर दूब का पल्लव धारण किया । हाथ के प्रकोष्ठ में मंगलप्रद कंकण पहना और मुद्राकटक (राजकीय मुद्रा से युक्त कड़ा) भी धारण किया । पूजा पाये पुरोहित ने उनके सिर पर शान्ति का जल छिड़का । तब उन्होंने सहयोगी राजाओं को कीमती सवारियाँ भेजीं और दिशाओं में आलोक फैलाने वाले रत्नजटित आभूषण बाँटे । राज्य में कार्पटिक (सिर पर चीरा बाँधने के अधिकारी राजकीय कर्मचारी) राजघरानों के सम्बन्धी कुलपुत्र और साधारण जन जो बन्दी थे वे छोड़ दिए गए और जो किसी कारणवश दण्डित या कृपा से वंचित हो गए थे वे फिर से सम्राट् के प्रसादपात्र बनाए गए । उसी समय अपने दाहिने भुजस्तम्भ को जो फरक कर अपने स्वरूप को व्यक्त कर रहा था, अट्ठारह द्वीपों पर विजय पाने के योग्य अधिकार में नियुक्त किया । सेवकों के समान सुनिमित्त एक पर एक सामने