भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 396

षष्ठ उच्छ्वासः ३४६ मकार्णीत्कौलेयकगणः । गणयन्तीव गतायुषस्तर्जनतरलया तर्जन्या दिव- समाटवाटकेषु कोटवी । कुट्टिमेषु कुटिलहरिणखुरवेणीतरङ्गिण्यश्च शष्प- राजयोऽजायन्त । जनितवेणीबन्धामि निरञ्जनरोचनारोचींषि चषकमधुनि मुखकमलप्रतिबिम्बान्यदृश्यन्त भटीनाम् । समासन्नात्मापहारचकिता इव चकम्पिरे भूमयः । वध्यालंकाररक्तचन्दनरसच्छटा इवालक्ष्यन्त शूराणां पतिताः शरीरेषु विकसितबन्धूककुसुमशोणितशोचिषः शोणितवृष्टयः । पर्यग्नीकुर्वाणा इव विनश्वरीं श्रियमविरलस्फुरत्स्फुलिङ्गाङ्गारोद्गारदग्धतारा- गणा गणशः पतन्तः प्रज्वलन्तो न व्यरंसिषुरुल्कादण्डाः । प्रथममेव प्रति- हारीवापहरन्ती प्रतिभवनं चामरातपत्रव्यजनानि परुषा बभ्राम वात्येति । इति श्रीबाणभट्टकृतौ हर्षचरिते राजप्रतिज्ञावर्णनं नाम षष्ठ उच्छ्वासः । हयाः । अकार्णीद्ध्वान । कौलेयकाः श्वानः । आट बभ्राम । कोटवी नग्ना स्त्री । शष्पं बालतृणम् । बन्धूकं बन्धुजीवः । अपरिगताग्निं परिगताग्निं कुर्वाणाः । अग्नौ समन्तात्क्षिपन्तः । व्यरंसिपुर्निववृतिरे ॥ इति श्रीशंकरकविरचिते हर्षचरितसंकेते षष्ठ उच्छ्वासः । मन्दिरमयूरों ने नाचना छोड़ दिया। हर रात में मुंह उठाकर मानों चन्द्रमा के हिरन की ओर आँख लगाए कुत्ते तोरण के समीप बिना कारण ही जोर से रोने लगे। मार्गों में नंगी स्त्रो चंचल तर्जनी से मरने वालों की मानों गणना करती हुई चक्कर लगाती दिखाई पड़ी। राज भवन के कुट्टिमों में टेढ़े हरिण के खुर के समान तरङ्ग मरी घास लहराने लगी। योद्धाओं की स्त्रियों के मुख का जो प्रतिबिम्ब मधुपात्र में पड़ता था उसमें विधवाओं जैसी एक वेणी और अञ्जन से रहित गोगोचना के समान पीली आँखें दिखाई पड़ने लगीं। निकट में होने वाले अपने हरण से मानों चकित होकर भूमि काँपने लगी। वीरों के शरीर पर पड़े हुए खिले बन्धूकपुष्प के समान लाल खून के छींटे वधदण्ड प्राप्त होने पर लगाए गए चन्दन के समान दिखाई पड़ने लगे। दिशाओं में चारों ओर मानों नाशावस्था को प्राप्त श्री को घेर कर निरन्तर निकलती हुई चिनगारियों से तारों को जलाती हुई उल्काएँ बार-बार गिरने लगीं। भयंकर हवा प्रतीहारी के समान सबके चँवर, छत्र और व्यजन का अपहरण करती हुई प्रत्येक घर को झकझोरने लगी। हर्षचरित षष्ठ उच्छ्वास समाप्त।