हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ उच्छ्वासः ३४३ दिक्करिकरप्रलम्बस्य बाहुयुगलस्यासाधारणस्य च सोदरस्नेहस्य सर्वं सह- शमुपक्रान्तम्। काकोदराभिधानाः कृपणाः कृमयोऽपि न मृष्यन्ति निकारं किमुत भवादृशास्तेजसां राशयः। केवलं देवराज्यवर्धनोदन्तेन कियदपि दृष्टमेव देवेन दुर्जनदौरात्म्यम्। ईदृशाः खलु लोकस्वभावाः प्रतिग्रामं प्रतिनगरं प्रतिदेशं प्रतिद्वीपं प्रतिदिशं च भिन्ना वेशाश्चाकाराश्चाहाराश्च ठ्याहाराश्च व्यवहाराश्च जनपदानाम्। तदियमात्मदेशाचारोचिता स्वभा- वसरलहृदयजा त्यज्यतां सर्वविश्वसिता। प्रमाददोषाभिषङ्गेषु श्रुतबहुवार्त एव प्रतिदिनं देवः। यथा नागकुलजन्मनः सारिकाश्रावितमन्त्रस्यासीन्नाशो नागसेनस्य पद्मावत्याम्। शुकश्रुतरहस्यस्य च श्रीरशोर्यत श्रुतवर्मणः श्रावस्त्याम्। स्त्रप्रायमानस्य च मन्त्रभेदोऽभून्मृत्यवे मृत्तिकावत्यां सुवर्ण- चूडस्य। चूडामणिगलम्लेखप्रतिबिम्बवाचिताक्षरा च चारुचामीकरचामर- प्रियममिति। उपक्रान्तं निदर्शयितुमाह-यथेति। अत्र कथा-नागसेननामा पद्मावत्यां राजा मन्त्रिणमर्धराज्यहरमपाकतुं शारिकासमक्षं मन्त्रमकरोत्। स चापि मन्त्री शारिकामुखाद्विज्ञाय विस्रम्भपूर्वकं तं दण्डेनावधीदिति। श्रावस्त्यां च श्रुतवर्मा पूर्ववच्छुकश्रावितमन्त्रो राज्याच्च्युत्याव। अनेन च गूढमन्त्रेण यत्ना- द्वाव्यमित्युक्तम्। मृत्तिकावत्यां सुवर्णचूडो नाम राजा कंचिद्विस्रम्भपूर्वकं जिघृक्षन्मन्त्रितवांस्तदेव तस्मै विललास। ततस्तत्पूर्वं तत्प्रयुक्तेन विश्वासिना शिरो- रक्षकेण स्वस्वामिप्रयुक्तेन व्यापादित इति। अनेन च कुलस्वभावाद्यपरीक्ष्य न उपक्रम किया है वह पुष्पभूति के वंश में उत्पन्न होने वाले आपके और परम्परागत आपके तेज के एवं दिग्गज को सूँड के समान लम्बी आपकी भुजाओं और सहोदर भाई के प्रति आपके असाधारण स्नेह के सर्वथा अनुकूल है। बेचारे साँप जैसे कीड़े भी जब अपना परिभव नहीं सहन कर पाते तो आपके जैसे तेजस्वियों की बात क्या ? केवल आपने देव राज्यवर्धन के इस वृत्तान्त से दुर्जनों के अत्याचार को कुछ ही देखा। निश्चय ही अब के लोगों के ऐसे स्वभाव हैं जो कि प्रत्येक ग्राम, प्रत्येक नगर, प्रत्येक द्वीप और प्रत्येक दिशा में सारे जनपदों के भिन्न भिन्न आकार, भिन्न-भिन्न आहार, भिन्न- भिन्न बातचीत एवं व्यवहार हो गए हैं। अतः स्वभाव से ही सरल हृदय होने के कारण अपने देश के अनुकूल सब पर विश्वास कर लेने की भावना का परित्याग करें। प्रतिदिन देव ने प्रमाद दोष से राजाओं पर आने वाली विपत्तियों के सम्बन्ध में बहुत कुछ सुना ही है। जैसा कि पद्मावती नगरी के नागवंशी राजा का नाश सारिका के गुप्त विचार देने पर (उसी का आधा राज्य हड़प कर बैठे हुए मंत्री द्वारा) हो गया। श्रावस्ती के राजा