भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 389

३४२ हर्षचरितम् धनोऽप्यस्पृष्टो मदेन भूतिमानपि स्नेहमयः पार्थिवोऽपि गुणमयः करिणा- मिव दानवतामुपरि स्थितः, स्वामितामिव स्पृहणीयां भृत्यतामप्यपरिभू- तामुद्वहन्नेकभर्तृभक्तिनिश्चलां कुलाङ्गनामिवानन्यगम्यां प्रभुप्रसादभूमिमा- रूढः, निष्कारणबान्धवो विदग्धानाम् , अभृतभृत्यो भजताम् , अक्रीत- दासो विदुषाम् , स्कन्दगुप्तो विवेश राजकुलम् । दूरादेव चोभयकरकम- लावलम्बितं स्पृशन्मौलिना महीतलं नमस्कारमकरोत् । उपविष्टं च नातिनिकटे तं तदा जगाद देवो हर्षः—'श्रुतो विस्तर एवास्यार्यव्यतिकरस्यास्माच्चिकीर्षितस्य च । अतः शीघ्रं प्रवेश्यन्तां पचा- रनिर्गतानि गजसाधनानि । न क्षाम्यत्यतिस्वल्पमप्यार्यपरिभवपीडापावकः प्रयाणविलम्बम् ।' इत्येवमभिहितश्च प्रणम्य व्यज्ञापयत्—'कृतमवधारयतु स्वामी समादिष्टं किंतु स्वल्पं विज्ञाप्यमस्ति भर्तृभक्तेः । तदाकर्णयतु देवः । देवेन हि पुष्यभूतिवंशसंभूतस्याभिजनस्याभिजात्यस्य सहजस्य तेजसो मदो गर्वोऽपि । भूतिः संपत्, भस्म च। पार्थिवो राजा, पृथिव्यारब्धश्च । गुणास्तन्त- वोऽपि । नहि घटः पटो भवतीति विरोधः । दानं मदः, वितरणं च । प्रचारो भक्षणम् । गजसाधनानि करिसैन्यानि । अभिषङ्गा अभिभवाः । शासन करता था उसी प्रकार दानियों में भी सबसे ऊपर रहने वाला था। अपनी स्वामिता के समान स्पृहणीय और कभी अभिभूत न होने वाली भृत्यता को धारण कर रहा था। कुलांगना के समान एक ही पति में निश्चल भक्ति रखने वाली और किसी दूसरे का गमन न करनेवाली अपने स्वामी की प्रसन्नता उसे उपलब्ध थी। वह विदग्ध लोगों का अकारण बन्धु था, सेवा करने वालों का अवैतनिक भृत्य था, और विद्वानों का भी बिना वेतन का दास था। उसने दूर ही से अपने दोनों कर-कमलों का अवलम्बन लेकर मस्तक से पृथिवी का स्पर्श करते हुए नमस्कार किया। स्कन्दगुप्त सम्राट् के कुछ दूर बैठ गया। तब देव हर्ष ने उससे कहा—'आर्य के हत्याकाण्ड के बारे में तथा हमने जो निश्चय किया है वह आपने विस्तार से सुन लिया होगा। अतः शीघ्र ही चरने के लिए बाहर गई हुई गजसेना को स्कन्धावार में लौटने की आज्ञा दी जाय। आर्य की हत्या से उत्पन्न कष्ट के कारण मैं क्षण भर भी शत्रु पर धावा बोलने में विलम्ब सह नहीं सकता।' हर्ष के ऐसा कहने पर स्कन्दगुप्त ने प्रणाम करके निवेदन किया—'देव, आपने जो आज्ञा दी है उसे पूरी ही समझें, किन्तु स्वामी के प्रति भक्ति के कारण थोड़ा-सा मेरा निवेदन है। कृपया देव उसे सुनें। देव ने जो यह