भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 388, कुल 506 में से

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पृष्ठ 388

षष्ठ उच्छ्वासः ३४१ नामृतरसस्वादुना नवपल्लवकोमलेन कवलेनेव श्रीकरेणुकां विलोभयन्नि- जनृपवंशदीर्घं नासावंशं दधानः, अतिस्निग्धमधुरधवलविशालतया पीत- क्षीरोदेनेव पिबन्नेक्षणयुग्मायामेन दिशामयामं मेरुतटादपि विकटवि- पुलालिकः, सततमविच्छिन्नच्छत्रच्छायाप्ररूढिवशादिव नितान्तायतनी- लकोमलच्छविसुभगेन स्वभावभङ्गुरण कुन्तलबालवल्लरीवेष्टितविलासिना लुनन्निव, लुप्तालोकानर्ककरान्बर्बरकेणारिपक्षपरिक्षयपरित्यक्तकार्मुकक- र्मोपि सकलदिगन्तश्रूयमाणगुरुगुणध्वनिः, आत्मस्थसमस्तमत्तमातङ्गसा- थे, मानों अपने दोनों ओर हाथियों को मारने के लिए पत्थर के आलानस्तम्भ गाड़ रहा था। अमृत के समान स्वादु, नवपल्लवसदृश कोमल, कुछ ऊँचे और लटके हुए अपने अधर से मानों वह श्रीकरेणुका (सिंगार-पटार से सजाई हुई हथिनी) को लुभा रहा था। उसका नासिकावंश अपने राजा के वंश के समान ही लम्बा था। मानों क्षीरसमुद्र को ही पी लेने के कारण उसकी आंखें अत्यन्त स्निग्ध, मधुर, धवल एवं विशाल थीं, जिनसे दिशाओं के आयाम को भी मानों पान करता जा रहा था। उसका ललाट मेरु के तट से भी कहीं अधिक विकट और फैला हुआ था। उसकी बबरी हमेशा छत्र की छाया में ही बढ़ते रहने से मानों अत्यन्त नील और कोमल हो गई थी। बालों के गुच्छे मजरी के समान घुमावदार थे, मानों वह उनसे सूर्यकिरणों के आलोक को भी मलिन कर रहा था। वह शत्रुओं के विनाश के लिए धनुष धारण करने का कर्म छोड़ चुका था, फिर भी समस्त दिशाओं में उसके गुणों की गम्भीर ध्वनि सुन पड़ती थी¹। मतवाले हाथियों की सेना उसके अधीन थी, फिर भी उसे मद छू भी न सका था²। वह ऐश्वर्यसम्पन्न और स्नेह से भरा था³। वह पार्थिव (राजा) और गुणमय था⁴। दान से भरे हाथियों पर जैसे वह १. विरोध पक्ष यह कि धनुष कर्म छोड़ देने पर दिशाओं में गुणों अर्थात् धनुष के तन्तुओं की टंकार कैसे सुन पड़ेगी ? समाहार पक्ष यह है कि उसके विनय आदि गुणों की सर्वत्र प्रसिद्धि हो गई थी। २. विरोध—मदवाले हाथी को अपने अधीन रखने पर उनके मद का स्पर्श होना स्वाभाविक है। परिहार पक्ष—मद अर्थात् गर्व ने उसका स्पर्शन नहीं किया था। ३. विरोध—जो भूतिमान् अर्थात् भस्मयुक्त है वह स्नेहमय कैसे हो सकता है ? परिहार—भूतिमान् अर्थात् वह ऐश्वर्यसम्पन्न और स्नेह से भरा था। ४. विरोध—पार्थिव अर्थात् घट के समान पृथिवी से जो उत्पन्न हो वह पट के समान गुणमय अर्थात् तन्तु से बना कैसे हो सकता है ? परिहार—पार्थिव अर्थात् राजा एवं गुणमय अर्थात् गुणवान् था।

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