भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 387, कुल 506 में से

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पृष्ठ 387

३४० हर्षचरितम्

नवगजसाधनसंचरणवार्तानिवेदनबिसर्जितैश्च नागवनवीथीपालदूतवृन्दैः, प्रतिक्षणप्रत्यवेक्षितकरिकवलकूटैश्च, कटभङ्गसंग्रहं ग्रामनगरनिगमेषु निवे- दयमानैः, कटककदम्बकैः क्रियमाणकोलाहलः, स्वामिप्रसादसंभृतेन महा- धिकाराविष्कारेण स्वाभाविकेन चावष्टम्भाभोगोनोदासीनोऽप्यादिशन्निव, असंख्यकरिकर्णशङ्खसंपत्संपादनाय समुद्रानाज्ञापयन्निव, शृङ्गारगैरिकप- ङ्करागसंग्रहाय गिरीन्मुष्णन्निव, दिग्गजाधिकारं ककुभामैरावतमिवाप- हरन्हरेर्हरपदभरनमितकैलासगिरिगुरुभिः पादन्यासैर्गुरुभारग्रहणगर्वमु- र्व्याः संहरन्निव, गतवशविलोलस्य चाजानुलम्बस्य बाहुदण्डद्वयस्य विक्षे- पैरालानशिलास्तम्भमालामिवोभयतो निखनन्नीषत्सुङ्गुलम्बेनाघरबिम्बे-

शिक्षायै । चर्मपुटः चर्मकृतो हस्त्याकारः । कटभङ्गः प्रत्यग्रम् । गोधूमादियवसम्, घास इत्यर्थः । निगमा वणिकपथाः । कटका हस्तिपटनियुक्ताः, अग्रेसरा वेत्रिण इत्यन्ये । गुणाः शौर्याद्याः, मौर्वी च गुणः ।

दुःख से लम्बी दाढ़ी बढ़ाए उसके आगे आगे चल रहे थे । बाहर से नये पहुंचे हुए सिर पर चीरा बांधे हाथियों के परिचारक हाथियों की सेवा के काम मिलने की प्रत्याशा में खुशी से दौड़ रहे थे । हाथियों को फंसाने के काम में फुसलात्रा देने वाली गणिका संज्ञक हथि- नियौँ के अधिकारी बहुत दिनों से आकर प्रतीक्षा कर रहे थे और अवसर पाकर काम में सिद्ध हथिनियों के करतब हाथ उठा कर सुनाने लगे । पल्लव के चिह्न वाले अरण्यपाल लोग नये पकड़े हुए गजयूथों को लेकर हाथ में ऊँचे अंकुश लिए कटक में उपस्थित थे । महामात्र लोग चमड़े का मरा हुआ हाथी का पुतला तैयार करके उसके द्वारा हाथियों को युद्ध की शिक्षा देते थे । नागवीथीपालों के भेजे हुए दूत अभिनव गजयूथ के संचरण की खबर देने के लिए आए हुए थे । कटक में एक एक क्षण हाथियों के लिए चारे की बाट देखने में नियुक्त झुण्ड के झुण्ड प्यादे हर गांव, नगर, मंडी में चारा संग्रह करके सूचना देते थे । स्वामी के प्रसाद से प्राप्त गजसाधनाधिकृत के पद की प्रतिष्ठा से एवं स्वाभाविक गर्वजनित गम्भीरता से वह चुपचाप होने पर आदेश देता हुआ सा लग रहा था । मानों समुद्रों को यह आज्ञा दे रहा था कि संख्यातीत हाथियों के कान में अलंकार के रूप में लटकाने के लिए शंख उत्पन्न करो। हाथियों के शृङ्गार के लिए गैरिक पंक के अंगराग के संग्रह के लिए पर्वतों को मानों लूट रहा था। दिशाओं के दिग्गजों के पद पर प्रतिष्ठित ऐरावत के अधिकार को मानों छीन रहा था। शिव के पदभार से झुके हुए कैलास पर्वत के समान भारी अपने पादन्यासों से वराहरूपधारी विष्णु के पृथिवी को उठाने से उत्पन्न गर्व को मानों कम कर रहा था । जानुभाग तक लम्बे उसके दोनों हाथ चलने से हिल रहे

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