भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 376

षष्ठ उच्छ्वासः ३२६ र्वग्रहाभिभवभास्वराणां हि सुभटकराणामग्रतो दिग्ग्रहणे पङ्गवः पतङ्गकराः। महामहिषशृङ्गतरङ्गभङ्गभङ्गुरभीषणान्तराला लोकप्रवादमात्रेण च दक्षिणाशा परमार्थतो भटभ्रुकुटिरधिवासो यमस्य। चित्रं च यदुन्मुक्तसिंहनादानां सहसा साहसरभसरसरोमाञ्चकण्टकनिकरेण सह न निर्यान्ति सटाः शूराणां रणेषु। द्वयमेव च चतुःसागरसंभृतस्य भूतिसंभारस्य भाजनं प्रतिपक्षदाहि दारुणं वडवामुखं वा महापुरुषहृदयं वा। तेजस्विनः सक- लाननवाप्य पयोराशिसहजस्य कुतो निवृत्तिरूष्मणः। वृथाविततविपुल- फणाभारो भुजङ्गानां भर्ता बिभर्ति यो भोगेन मृत्पिण्डमेव केवलम्। अप्रतिहतशासनाक्रान्त्युपभोगसुखरसं तु रसायां दिक्कुञ्जरकरभारभास्वर- प्रकोष्ठा वीरबाहव एव जानन्ति। रविरिवोन्मुखपद्माकरगृहीतपादपल्लवः सुखेनाखण्डिततेजा दिवसान्नयति शूरः। कातरस्य तु शशिन इव हरिण- हृदयस्य पाण्डुरपृष्ठस्य कुतो द्विरात्रमपि निश्चला लक्ष्मीः। अपरिमित- रन्ति गिरिभ्य एव लोहोत्पत्तेः। सर्वस्य वस्तुनो ग्रहोपहरणम्। ग्रहाश्चन्द्राद्याः। पतङ्गः सूर्यः। महामहिषशृङ्गयोस्तरङ्गवद्भङ्गुरा ये भङ्गास्तैर्भीषणमन्तरालं यस्याः सा। अन्यत्र,—महामहिषशृङ्गतुल्या। भूतिर्भस्मापि। तेजस्विनो वडवाग्नेरपि। मुखेन शोभनाकाशेनापि। शूरो रविरपि। हरिणहृदयस्याह्रस्रसत्त्वस्यापि पाण्डुर- सकते हैं ? सब ग्रहों के अभिभव करने में समर्थ (या सबका अपहरण करने वाले) सुभट लोगों के हाथों के सामने केवल दिशाओं के ग्रहण में सूर्य के कर (किरणें) पंगु हो जाते हैं। यह लोक प्रवाद मात्र है कि महामहिष की तरंगों के समान टेढ़ा सींगों से भयानक भीतरी भाग वाली दक्षिण दिशा यमराज का निवास स्थान है, परमार्थ रूप में महिष की सींग नहीं, बल्कि वहाँ योद्धाओं की भौहें न्यास हैं। आश्चर्य है कि संग्रामों में सिंहनाद करने वाले शूरवीरों के साहस रस के कारण उत्पन्न रोमांच के साथ ही सिंहों जैसी सटाएँ नहीं निकल जातीं। चारों समुद्रों से उत्पन्न होने वाले भूतिसम्भार (अर्थात् सम्पत्ति समूह अथवा भस्मसमूह) के योग्य स्थान दो ही हैं एक अपने प्रतिपक्ष (जल) को भस्म कर देने वाला (भस्मसमूह का योग्य स्थान) वडवानल और दूसरा (सम्पत्ति- समूह का योग्य स्थान) महापुरुष का हृदय। समुद्र में सहज उत्पन्न तेजस्वी बड़वानल के तीव्र तेज की निवृत्ति बिना सबको जलाए कैसे सम्भव है ? फणों का वृथा भार फैलाकर लादे हुए शेषनाग केवल मिट्टी का बोझ ही धारण कर रहे हैं। दिग्गज की सूंड़ के समान प्रकोष्ठ भागवाले वीरों के बाहु ही किसी प्रकार के विघ्न से रहित शासन द्वारा पृथिवी के उपभोगजनित आनन्द का अनुभव करते हैं। जैसे कमल (पद्माकर) सूर्य के किरणरूपी