भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 377, कुल 506 में से

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पृष्ठ 377

यशःप्रकरवर्षी विकासी वीररसः। पुरःप्रवृत्तप्रतापप्रहृताः पन्थानः पौरुषस्य। शब्दविद्रुतविद्विषन्ति भवन्ति द्वाराणि दर्पस्य। शस्त्रालोक- प्रकाशिताः शून्या दिशः शौर्यस्य। रिपुरुधिरशीकरासारेण भूरिव श्रीर- प्यनुरज्यते। बहुनरपतिमुकुटमणिशिलाशाणकोणकषणेन चरणनखरा- जिरिव राजताप्युज्ज्वलीभवति। अनवरतशस्त्राभ्यासेन करतलानीव रिपु- मुखान्यपि श्यामीभवन्ति। विविधरणबद्धपट्टकशतैः शरीरमिव यशोऽपि धवलीभवति। कवचिशु रिपूरुःकवाटेषु पात्यमानाः पावकशिखामिव श्रियमपि वमन्ति निष्ठुरा निस्त्रिंशप्रहाराः। यश्चाहितहृतस्वजनो मनस्वि- जनो द्विषद्योषिदुरस्ताडनेन कथयति हृदयदुःखम् परुषासिलतानिपात- पवनेनोच्छ्वसिति निरुच्छ्वसितशत्रुशरीराश्रुधारापातेन रोदिति विपक्षवनि- पृष्टस्य देशभाषया निर्लज्जस्यापि। द्विरात्रमपीति। पौर्णमास्यामेव शशिनः सातिशयं शोभायुक्तत्वात्। लक्ष्मीः श्रीः, कान्तिश्च। शून्या अनावृताः। अनुरज्यतेऽनुरक्ता भवति, उपलिप्ता च भवति। उज्ज्वला रम्या, निर्मला च। श्यामानि कृष्णानि, विच्छा- पादपल्लव को उन्मुख होकर पकड़ते हैं उसी प्रकार अखण्डित तेज वाला वीर जिसके पैर पद्मा (लक्ष्मी) अपने हाथों से दबाती है, सुखपूर्वक दिन व्यतीत करता है। हरिण के समान भीरु हृदय वाला (हरिण से युक्त मण्डल वाला) और ऊपर से देखने में उज्ज्वल चन्द्रमा की भाँति कायर पुरुष की लक्ष्मी (शोभा या सम्पत्ति) दो रात भी नहीं ठहरती। वीररस अपरिमित यशसमूह बरसाने वाला एवं विकासशील होता है। पौरुष के मार्ग आगे- आगे चलने वाले प्रताप के द्वारा अभ्यस्त होते हैं। वीर के आवाज करते ही उसके दर्प के द्वार से शत्रु निकल भागते हैं। शौर्य के शस्त्र के आलोक से प्रकाशित दिशाएँ जन- रहित होती हैं। शत्रुओं की रुधिर की वर्षा से पृथिवी के समान श्री भी अनुरक्त (लालिमा से युक्त या प्रेमपूर्ण) हो जाती है। अनेक राजाओं के मुकुट की शिखामणि के घर्षण से चरणनख के समान साम्राज्य भी उज्ज्वल हो जाता है। शस्त्रों के हमेशा अभ्यास करने से करतल के समान शत्रुओं के मुख भी काले पड़ जाते हैं। व्रणों के ऊपर बाँधे गए वस्त्र के सैकड़ों टुकड़ों से शरीर की भाँति यश भी उज्ज्वल हो जाता है। कवच पहने शत्रु के चौड़े वक्ष पर पड़ते हुए कठोर खड्ग के प्रहार अग्नि शिखा के समान श्री (सम्पत्ति) को भी उगलते हैं। जो मनस्वी वीर पुरुष शत्रु के द्वारा आत्मीय- जन के मारे जाने पर अपने हृदय का दुःख उस शत्रु की पत्नियों के वक्षताडन से व्यक्त करता है, वेग से चलती हुई असिलता की हवा के रूप में उच्छ्वास लेता है, साँस तोड़ते हुए शत्रु के नेत्र से बहती हुई अश्रुधारा के रूप में रुदन करता है और शत्रु पत्नियों की

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