हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ उच्छ्वासः ३३१ ताचक्षुषा ददाति जलं स श्रेयान्नेतरः । नच स्वप्नदृष्टनष्टेष्विव क्षणिकेषु शरीरेषु निबध्नन्ति बन्धुबुद्धिं प्रबुद्धाः । स्थायिनि यशसीव शरीरधीर्वी- राणाम् । अनवरतप्रज्वलिततेजःप्रसरभास्वरस्वभावं च मणिप्रदीपमिव कलुषः कज्जलमलो न स्पृशत्येवातितेजस्विनं शोकः । स त्वं सत्त्ववता- मग्रणीः प्राग्रहरः प्राज्ञानां प्रथमः समर्थानां प्रष्ठोऽभिजातानामग्रेसरस्ते- जस्विनामादिरसहिष्णूनाम् । एताश्च सततसंनिहितधूमायमानकोपाग्नयः सुलभासिधारातोयतृप्तयो विकटबाहुवनच्छायापगूढा धीरताया निवास- शिशिरभूमयः स्वायत्ताः सुभटानामुरःकवाटभित्तयः । यतः किं गौडा- धिपाधमैकेन । तथा कुरु यथा नान्योऽपि कश्चिदाचरत्येवं भूयः । सर्वो- र्वीश्रद्धाकामुकानामलीकविजिगीषूणां संचारय चामराण्यन्तःपुरपुरंध्रिनिः- श्वसितैः । उच्छिन्धि रुधिरगन्धान्धगृध्रमण्डलच्छादनैश्छत्रच्छायाव्यस- नानि । अपाकुरु कदुष्णशोणितोदकस्वेदैः कुलदमीकुलटाकटाक्षचक्षूरा- गरोगांन् । उपशमय निशितशरशिरावेधैरकार्यशौर्यश्वयथुन् । उन्मूलय यानि च । श्रेयान्प्रशंसनीयः । शिशिरभूमयोऽप्यमृतांयच्छायायुक्ता भवन्ति । स्वैर्देश्च आँखों से जलदान करता है, वही सबसे श्रेष्ठ है दूसरा नहीं । समझदार लोग देखते ही स्वप्न की तरह नष्ट हो जाने वाले क्षणभंगुर शरीर में आत्मीय भावना को स्थापित नहीं करते । वीर लोग स्थायी रहने वाले यश को ही अपना शरीर मानते हैं । मणि-प्रदीप के समान हमेशा प्रज्वलित रहने वाले अपने तेज से भास्वर स्वभाव के तेजस्वी को कज्जल के समान मलिन शोक नहीं छू पाता । तुम बलवानों में अग्रणी, बुद्धिमानों में प्रधान, सामर्थ्यवानों में प्रथम, कुलीनों में श्रेष्ठ, तेजस्वियों में अग्रसर, (शत्रु के पराक्रम को) न सहने वालों में मुख्य हो । योद्धाओं के वक्षरुपी कपाट की ये दीवारें, जिनमें हमेशा जलती हुई क्रोधाग्नि का धुआँ व्याप्त रहता है, जो असिधारा जल के सुलभ होने से तृप्त हैं, जिन पर उनके विशाल भुजवन की छाया पड़ती रहती है और जो धीरता के रहने से ठंढी हैं, अपने अधीन ही समझो । क्योकि अकेले उस अधम गौड़ाधिप की क्या बात है ? तुम ऐसा उपाय करो जिससे फिर कोई दूसरा ऐसा आचरण न करे । समस्त पृथिवी की चाह रखने वाले एवं अलीक विजय की इच्छा वाले राजाओं के लिए उनके अन्तःपुर की नवेलियों के निःश्वास के चँवर संचारित करो । रुधिर की दुर्गन्ध के लोलुप गीधों की छाया देकर उनके आतपत्र की छाया में रहने का शौक तोड़ो । कुत्सित लक्ष्मी रूपी कुलटा के कटाक्ष से उत्पन्न उनके चक्षुराग रूप रोगों को कुछ उष्ण रुधिर के विन्दुओं से दूर करो । अन्याय के कार्यों में बढ़े हुए उनके पराक्रम के शोथ को तीक्ष्ण बाणों के शिरावेध