हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३२ हर्षचरितम् लोहनिगडापीडमालामलमहौषधैः पादपीठदोहददुर्ललितपादपटुमान्द्यानि। क्षपय तीक्ष्णाज्ञाक्षरक्षारपातैर्जयशब्दश्रवणकर्णकण्डूः । अपनय चरणनख- मरीचिचन्दनचर्चाललाटलेपैरनमितस्तिमितमस्तकस्तम्भविकारान् । उद्धर करदानसंदेशसंदंशैर्द्रविणदर्पोष्मायमाणदुःशीललीलाशल्यानि । भिन्धि मणिपादपीठदीधितिप्रदीपिकाभिः शुष्कसुभटाटोपभ्रुकुटिबन्धान्धका- रान् । जय चरणलङ्घनलाघवगलितशिरोगौरवारोग्यैर्मिथ्याभिमानमहास्रं- निपातान् । म्रदय सततसेवाञ्जलिमुकुलितकरसंपुटोष्मभिरिष्वासनगुणकि- णकार्कश्यानि । येनैव च ते गतः पिता पितामहः प्रपितामहो वा तमेव मा हासीस्त्रिभुवनस्पृहणीयं पन्थानम् । अपहाय कुपुरुषोचितां शुचं प्रतिपद्यस्व कुलक्रमागतां केसरीव कुरङ्गीं राजलक्ष्मीम् । देव ! देवभूयं गते नरेन्द्रे दुष्ट- गौडभुजङ्गजग्धजीविते च राज्यवर्धने वृत्तेऽस्मिन्महाप्रलये धरणी- नयनव्याध्युपशमो जायते, एवं निशितशरसिरावेधैरित्यादि बोद्धव्यम् । संदेशः शल्याञ्चनम् । सतताञ्जलिबन्धात्करयोरूष्मसंभवः । इष्वासनं धनुः । देवभूयं (इन्जेक्शन) से शान्त करो। लोहे की बेड़ी रूपी महौषध से पादपीठों पर विराजमान होने में चतुर उनके पैरों की बढ़ी हुई मन्दता को हटाओ। अपनी प्रतिज्ञा के खारे अक्षरों को जयशब्द सुनने वाले उनके कानों में डालकर उनकी खुजान मिटाओ। चन्दन के समान अपने चरण नख की किरणों का लेप लगाकर नहीं झुकने वाले और निश्चल उनके मस्तक के स्तम्भरोग को दूर करो। कर देने के संदेश रूपी संड़सी से धनमद की गर्मी को उगलते हुए उनके दुराचरण रूपी शल्यों को निकाल डालो। अपने मणिमय पादपीठ की किरणों की दीपिकाओं से योद्धाओं के नीरस आरोपजनित भ्रूभङ्ग के अन्धकार को मिटाओ। चरण के द्वारा लंघन करने से (अथवा भोजन न करने से) उनके सिर के गौरव (अथवा भारीपन) को मिटाने वाले औषध प्रयोग से उनके मिथ्या अभिमानरूपी महासन्निपात को पराजित करो। तुम ऐसा करो कि तुम्हारी सेवा में वे इस प्रकार हाथ जोड़े हमेशा खड़े रहें कि उनके करसम्पुट की गर्मी से धनुष के गुणों की रगड़ के कारण पड़े हुए घट्टे मुलायम हो जायें। जिस मार्ग से तुम्हारे पिता, पितामह, प्रपितामह गए हैं त्रिभुवन में श्लाघनीय उस मार्ग की हँसी मत उड़ाओ। कुपुरुषों के लिए उचित शोक को छोड़कर परम्परागत राजलक्ष्मी को उस प्रकार प्राप्त करो जैसे सिंह हिरनी को अपने कब्जे में कर लेता है। देव, महाराज के देवत्व प्राप्त करने पर एवं राज्यवर्धन के दुष्ट गौड़ाधिप रूपी सर्प द्वारा डंस लिए जाने से जो महाप्रलय का समय आया है इसमें तुम्हीं शेषनाग