हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 380, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंधारणायाधुना त्वं शेषः । समाश्वासय अशरणाः प्रजाः । क्ष्मापतीनां शिरःसु शरत्सवितेव ललाटंतपान्प्रयच्छ पादन्यासान् । अहितानामभिन- वसेवादीक्षादुःखसंतप्रश्वासधूममण्डलैर्नखंपचैः प्रचलितचूडामणिचक्रवा- लबालातपैश्चायाहि कल्माषपादताम् । अपि च हृते पितर्यंकाकी तपस्व्रा मृगैः सह संवर्धितः सहजब्राह्मण्यमार्दवसुकुमारमनाः कृतनिश्चयश्चण्डचा- पवनाटनिंटंकारनादनिर्मदीकृतदिग्गजं गुञ्जज्ज्याजालजनितजगज्ज्वरं स- मप्रमुद्यतमेकविंशतिकृत्वः कृत्तवंशमुत्खातवान्राजन्यकं परशुरामः, किं पुनर्नैसर्गिककायकार्कश्यकुलिशायमानमानसो मानिनां मूर्धन्यो देवः । तदद्यैव कृतप्रतिज्ञो गृहाण गौडाधिपाधमजीवितध्वस्तये जीवितसंकलना- कुलकालाकालदण्डयात्राचिह्नध्वजं धनुः । न ह्ययमरातिरक्तचन्दनचर्चा- शिशिरोपचारमन्तरेण शाम्यति परिभवानलपच्यमानदेहस्य देवस्य दुःख- दाहज्वरः सुदारुणः । निकारसंतापशान्त्युपायपरिक्षये हि हिडिम्बाचुम्ब- देवत्वम् । शेषोऽवशिष्टः, शेषभट्टारकश्च । ललाटंतपानिति प्रचण्डतोक्ता । कल्माप- पादतां चित्रचरणत्वम् । राजन्यकं क्षत्रियसमूहः । रामो भार्गवः । नैसर्गिकः स्वाभाविकः । मूर्धन्यो मुख्यः । परिभवो निकारः । हिडिम्बा राक्षसी । पवनात्मजेन की भाँति पृथिवी को धारण करने में समर्थ हो । आश्रयहीन प्रजा को आश्वासन दो । शरत्कालीन सूर्य के समान राजाओं के सिर पर ललाट को पीड़ित करने वाले अपने चरण रखो । शत्रुओं को सेवा की नवीन दीक्षा देने वाले दुःख के कारण संतप्त श्वास के धूम मण्डल से, एवं नख को पीड़ित करने वाले चूडामणियों के बालातप से अपने चरण को चित्रित करो । पिता के मर जाने से अकेले, मृगों के साथ पले हुए स्वाभाविक ब्राह्मणत्व के कारण मृदु और अतिकोमल मन वाले तपस्वी परशुराम ने प्रतिज्ञा करके प्रचंड बाण समूह के टंकार करने की ध्वनि से दिग्गजों को मदहीन बना देने वाले, गूँजती हुई धनुष की डोरियों की आवाज से संसार को ज्वरग्रस्त कर देने वाले, संग्राम के लिए उद्यत समस्त राजाओं के वंशों का इक्कीस बार उन्मूलन किया था । देव भी अपने शरीर की स्वाभाविक कठोरता और वज्रतुल्य मन से मानियों के मूर्धन्य हैं । तो प्रतिज्ञा करके उस अधम गौड़ाधिप के नाश के लिए प्राणों के संग्रह में लगे हुए यमराज के अचानक सैनिक कूच की सूचक झंडी के साथ धनुष उठा लीजिए । परिभव की अग्नि में पके जाते हुए शरीर वाले देव का दुःखजन्य दारुण ज्वर शत्रु के रक्त की चन्दन चर्चा के शिशिरोपचार के बिना शान्त नहीं हो सकता । परिभवजन्य सन्ताप की शान्ति के लिए शत्रु का विनाश एकमात्र उपाय है । भीम ने हिडिम्बाराक्षसी के चुम्बन के साथ