हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 381, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंनास्वादितमिव रिपुरुधिरामृतममन्दरोपायमपायि पवनात्मजेन। जामद- ग्न्येन च शाम्यन्मन्युशिखिशिखासंज्वरसुखायमानस्पर्शशीतलेषु क्षत्रिय- क्षतजह्रदेष्वस्नायि।' इत्युक्त्वा व्यरंसीत्। देवस्तु हर्षस्तं प्रत्यवादीत्—'करणीयमेवेदमभिहितं मान्येन। इत- रथा हि मे गृहीतभुवि भोगिनायेऽपि दायाददृष्टिरीर्ष्यालोर्भुजस्य। उपरि गच्छतीच्छति निग्रहाय ग्रहगणेऽपि भ्रूलता चलितुम्। अनमत्सु शैलेष्वपि कचग्रहमभिलषति दातुं करः। तेजोदुर्विदग्धानर्ककरानपि चामराणि ग्राह- यितुमीहते हृदयम्। राजशब्दरुषा मृगराजानामपि शिरांसि वाञ्छति पादः पादपीठीकर्तुम्। स्वच्छन्दलोकपालस्वेच्छागृहीतानामाच्छेपादेशाय दिशामपि स्फुरत्यधरः। किं पुनरीदृशे दुर्जाते जाते जातामर्षनिर्भरे च मनसि नास्त्येवावकाशः शोकक्रियाकरणस्य? अपि च हृदयविषमशल्ये भीमसेनेन। क्षतजह्रदेषु रक्ततडाकेषु। इतरथापीत्यन्यथा यदिदृशं दुर्जातं जातं नाभूत्तदादावेवमद्भुतं भुजस्य भोगि- नाथेऽपि दायाददृष्टिः। किं पुनरीदृशे दुर्जाते व्यसने जाते संपन्नं शत्रुवृद्धिर्भवेदिति योजना। एवमुपरि गच्छतीत्यादौ बोद्धव्यम्। आच्छेपोऽपहरणम्। रुधिर का जो आस्वाद पाया था वही मन्दर के द्वारा मथन के बिना ही प्राप्त शत्रु (दुःशासन) के रुधिर रूपी अमृत का पान करके प्राप्त किया। परशुराम ने शान्त होती हुई क्रोधाग्नि की शिखा के संताप के कारण स्पर्श से सुख पहुँचाने वाली शीतल क्षत्रियों के रुधिर-सरोवरों में स्नान किया।' यह कहकर सेनापति सिंहनाद चुप हो गया। देवहर्ष ने उत्तर दिया—'आर्य, आपने जो कहा है वह अवश्य ही करने योग्य है। अन्यथा पृथिवी का भार धारण करते हुए राजपद पर प्रतिष्ठित होने पर भी मेरे ईर्ष्यालु भुज की विरुद्ध दृष्टि बराबर बनी रहेगी। मेरी भ्रूलता आकाश में ऊपर चलते हुए तारों को पकड़ने के लिए चल पड़ने की इच्छा करती है। हाथ चाहता है कि सामने न झुकने वाले पर्वतों की बाबरी पकड़ कर झटक दें। तेज हो जाने से सूर्य के दुर्विनीत करों (हाथों अथवा किरणों) में चंवर पकड़ाने की इच्छा मेरे हृदय में उत्पन्न होती है। मृगराज नाम वाले शेरों के नाम में 'राज' शब्द के प्रति क्रोध के कारण मेरा पैर उनके मस्तक को अपना पाद पीठ बनाना चाहता है। स्वतन्त्र लोकपालों ने जिन दिशाओं को अपने अधीन कर रखा है उन्हें भी हर लेने की आज्ञा देने के लिए मेरा अधर स्फुरित होता है। जब कि इतना बड़ा व्यसन आ पड़ा है तो फिर क्या कहना ! क्रोध से भरे हुए मन में शोक का कोई स्थान ही नहीं। जब तक अधम, चंडाल, दुष्ट, पापी जगत् में निन्दा का