भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 382

षष्ठ उच्छ्वासः ३३५ मुसल्ये जीवति जाल्मे जगद्विगर्हिते गौडाधिपाधमचण्डाले जिह्रेमि शुष्काधरपुटः पोटेव प्रतिकारशून्यं शुचा फूत्कर्तुम् । अकृतरिपुबलाबला- विलोललोचनोदकदुर्द्दिनस्य मे कुतः करयुगलस्य जलाञ्जलिदानम् । अदृष्टगौडाधमचिताधूममण्डलस्य च चक्षुषः स्वल्पमप्यश्रुसलिलम् । श्रूयतां मे प्रतिज्ञा - 'शपाम्यार्यस्यैव पादपांसुस्पर्शन, यदि परिगणितैरेव वासरैः सकलचापचापलदुर्ललितनरपतिचरणरणायमाननिगडां निर्गोडां गां न करोमि ततस्तनूनपाति पीतसर्पिषि पतङ्ग इव पातकी पातयाम्य- त्मानम्' इत्युक्त्वा च महासंधिविग्रहाधिकृतमवन्तिकमन्तिकस्थमादि- देश - 'लिख्यताम् । आ रविरथचक्रचीत्कारचकितचारणमिथुनमुक्तसानो- रुदयाचलात्, आ त्रिकूटकटककुट्टाकटङ्कलिखितकाकुत्स्थलङ्कालुण्ठनव्य- तिकरात्सुवेलात्, आ वारुणीमदस्खलितवरुणवरनारीनूपुररवमुखरकुहर- कुद्देरस्तगिरेः, आ गुह्यकगेहिनीपरिमलसुगन्धिगन्धपाषाणवासितगुहागृ- मुसलेन वध्यो मुसल्यः । तस्मिन् जाल्मे पापिष्ठे । पोटा नपुंसकम् । निगडो बन्धनशृङ्खला । तनूनपाद्वह्निः । चारणा गन्धर्वाः । काकुत्स्थो रामः । वारुणी सुरा । पात्र गौडाधिप जीवित रह कर मेरे हृदय में विषम काँट की तरह चुभता रहता है तब तक सूखे हुए अधर पुट वाले मेरे लिए बदला न लेने के कारण नपुंसक की भाँति रोना- धोना लज्जास्पद है। जब तक शत्रु की अबलाओं के चंचल नेत्रों के जल से दुर्द्दिन न कर लूं तब तक मेरे हाथों से जलांजलि कैसे दी जा सकती है ? जब तक गौडाधम की चिता से उठता हुआ धुवाँ में नहीं देखूं तब तक मेरे नेत्रों में आँसू कहाँ ? तो सुनिए मेरी प्रतिज्ञा - 'आर्य के ही पैरों की धूक लेकर प्रतिज्ञा करता हूं कि यदि कुछ ही दिनों में धनुष चलाने की चपलता के घमण्ड में भरे हुए समस्त उद्धत राजाओं के पैरों की बेड़ियों की झनकार से पूर्ण करके पृथिवी को गौड़ों से रहित न बना दूं तो घी से धधकती हुई आग में पतंगे की तरह पातकी अपने आप को जला दूंगा ।' यह कह कर उन्होंने अपने पास में बैठे महासन्धिविग्रहाधिकृत अवन्तिक को आज्ञा दी - 'लिखो, पूर्व में सूर्य के रथ के चक्रों की घर्घर आवाज से चकचिहाए गन्धर्व युगलों द्वारा छोड़े गए शिखर वाले उदयाचल तक, दक्षिण में त्रिकूट पर्वत तक जिसके मध्यभाग में कुट्टाक की टाँकी से राम के द्वारा लंकापुरी के लूटे जाने की घटना लिखी गई है, पश्चिम में मदिरा पीकर मतवाली वरुण की श्रेष्ठ सुन्दरियों के नूपुर की आवाज से जिसकी कन्दराएं भर रही हैं ऐसे अस्ताचल तक, उत्तर में यक्षिणियों के शरीर की सुगन्धि से सुवासित पाषाणों से युक्त गुहाओं वाले गन्धमादन तक सब राजा हाथ से कर दान के लिए तैयार हों या शस्त्रग्रहण