हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहाय गन्धमादनात्, सर्वेषा राज्ञां सज्जीक्रियन्तां कराः करदानाय शस्त्रग्र- हणाय वा, गृह्यन्तां दिशाश्चामराणि वा, नमन्तु शिरांसि धनूंषि वा, कर्णपूरीक्रियन्तामाज्ञा मौर्व्यो वा, शेखरीभवन्तु पादरजांसि शिरस्त्राणि वा, घटन्तामञ्जलयः करिघटाबन्धा वा, मुच्यन्तां भूमय इषवो वा, समा- लम्ब्यन्तां वेत्रयष्टयः कुन्तयष्टयो वा, सुदृष्टः क्रियतामात्मा मच्चरणनखेषु कृपाणदर्पणेषु वा। परागतोऽहम्। पङ्गोरिव मे कुतो निवृत्तिस्ताव- द्यावन्न कृतः सर्वद्वीपन्तरसंचारी सकलनरपतिमुकुटमणिशिलालोकमयः पादलेपः ।' इति कृतनिश्चयश्च मुक्तास्थानो विसर्जितराजलोकः स्नाना- रम्भाकाङ्क्षी सभामत्याक्षीत् । उत्थाय च स्वस्थवन्निःशेषमाह्निकमकार्षीत् । अगलच्च दर्पप्रसर इव श्रुतप्रतिज्ञस्य शाम्यद्यूष्मा दिवसस्त्रिभुवनस्य । ततश्च निजाधिकारापहारभीत इव भगवत्यपि क्वापि गते गत- कुक्षिवेंदिः । गुह्यका यक्षाः । पङ्गोर्गतिविकलस्य । ऊष्मा औष्ण्यम् । ततश्चेत्यादौ । प्रदोषास्थाने नातिचिरं तस्थाविति संबन्धः । शरा अपि शिली- करने के लिए, दिशाओं का ग्रहण करें या सेवा चामरों का, अपने मस्तक को नम्र करें या धनुष को, आज्ञा को कानों तक करें या धनुष की मौर्वी को, अपने सिर पर चरण की धूल धारण करें या शिरस्त्र (युद्ध के लिए टोप), प्रणाम के लिए अंजलि का संघटन करें या युद्ध के लिए हाथियों को जुटाएं, भूमि का त्याग करें या बाणों का, वेत्र यष्टि धारण करें या युद्ध के लिए बछियाँ लें, झुक कर मेरे चरण के नखों में अपना प्रतिबिम्ब देखें (अर्थात् प्रणाम के लिए तैयार हो जाँय) अथवा युद्ध के लिए उठाए गए कृपाण के दर्पणों में अपना रूप देखें। मैं अब आया। पंगु के समान मुझे तब तक कहाँ सुख मिलेगा जब तक उस प्रकार का अपने चरण में लेप नहीं लगाता जिसे लगाते ही सब द्वीपान्तरों में बिचरण करने की शक्ति प्राप्त हो जाती है और जो सब राजाओं की मुकुट मणियों में आलोक उत्पन्न करता है।' इस प्रकार निश्चय की घोषणा करके वे बाह्य आस्थान मण्डप से उठे, एवं सब राजाओं को विदा किया। स्नान करने की इच्छा से सभा छोड़ कर भीतर गए । स्वस्थ के समान उन्होंने वहाँ से उठ कर सारे दैनिक कार्य किए । दिन का तेज शान्त होने लगा, इस रूप में मानों हर्ष की प्रतिज्ञा सुन कर त्रिभुवन का अहंकार विगलित हो गया । तब अपने अधिकार के छिन जाने के डर से भगवान् सूर्य भी क्षीण तेज होकर कहीं चले गए । भौरों की आवाज से भरे तामरसवन भी मानों त्रास के कारण संकुचित होने