हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतेजस्यहिमभासि, तामरसवनेष्वपि निगूढशिलीमुखालापेषु त्रासा- दिव संकुचत्सु, विहगगणेष्वपि समुपसंहृतनिजपक्षविक्षेपनिश्चलेषु भियेवाप्रकटीभवत्सु, भुवनव्यापिनीं संध्यां प्रतिज्ञामिव मानयति नतशिरसि घटिताञ्जलिवने जने सकले, स्वपदच्युतिचकितदिक्पा- लदीयमानाभ्रंलिहलोहप्राकारवलयकलितास्विव बहलतिमिरमालातिरो- धीयमानासु दिक्षु प्रदोषस्थाने नातिचिरं तस्थौ । नपन्नृपलो- कलोलांशुकपवनकम्पितशिखैर्दीपिकाचक्रवालैरपि प्रणम्यमान इव प्राहिणोल्लोकं प्रतिषिद्धपरिजनप्रवेशश्च शयनगृहं प्राविशत् । उत्ता- नश्च मुमोचाङ्गानि शयनतले । दीपद्वितीयं च तमभिसर इव लब्धावसरस्तरसा भ्रातृशोको जग्राह । जीवन्तमिव हृदये निमी- लितलोचनो ददर्शाग्रजम् । उपर्युपरि भ्रातृजीवितान्वेषिण इव प्रसस्रुः श्वासाः । धवलांशुकपटान्तेनेव चाश्रुजलप्लवेन मुखमा- च्छाद्य निःशब्दमतिचिरं रुरोद । चकार च चेतसि कथं नामाकृते- स्तादृश्या युक्तः परिणामोऽयमीदृशः । पृथुशिलासंघातकर्कशकाय- मुखाः । सहाया अपि पक्षाः । अभिसराश्चौराः । लगे । पक्षी भी मानों डर के मारे अपने डैने सिकोड़ कर निश्चल भाव से छिप गए । सब लोग भुवन में व्याप्त संध्या को ही प्रतिज्ञा के समान मान कर सिर झुकाकर और हाथ जोड़ कर प्रणाम करने लगे । चारों ओर अंधकार से दिशाएँ तिरोहित होने लगीं, मानों दिक्पालों ने अपनी पदच्युति होने के डर से लोहे के आकाशचुम्बी प्राकार खड़े कर दिए हों । देव हर्ष प्रदोषोत्थान में थोड़ी देर बैठे । पवन से कम्पित दीपशिखा के समान उन्हें प्रणाम करते हुए राजाओं के अंशुक चंचल हो उठे । सब लोगों को भेज कर स्वयं वे परिजनों का प्रवेश रोक कर शयनगृह में गए । वहाँ शयनतल पर उत्तान हो अङ्गों को ढीले छोड़ पड़ रहे । वहाँ एक दीप जल रहा था और दूसरे वे थे । उसी समय भाई के शोक ने अवसर पाकर चोर के समान उन्हें वेग से पकड़ लिया । आँखें बन्द करके उन्होंने अपने हृदय में मानों जीते हुए अपने बड़े भाई राज्यवर्धन को देखा । मानों भाई के प्राणों को ढूँढ़ने के लिए उनके श्वास ऊपर-ऊपर बढ़ने लगे । आँसू से डबडबाए अपने मुँह को सफेद अंशुक के अग्रभाग से ढंक कर बहुत देर तक बिना शब्द के सिसक-सिसक कर रोने लगे । मन में सोचने लगे कि उस तरह की आकृति का भी यह नतीजा ठीक कैसे है ? पिताजी के शरीर की बनावट शिलासंघात जैसी थी और जैसे पर्वत से लोहा २२ ह० च०