भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 385, कुल 506 में से

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पृष्ठ 385

३३८ हर्षचरितम् बन्धात्तातादचलादिव लोहधातुः कठिनतर आसीदार्यः। कथं चास्य मे हतहृदयस्यार्यविरहे सकृदपि युक्तं समुच्छ्वसितुम्। इयं सा प्रीतिर्भक्तिरनुवृत्तिर्वा। बालिशोऽपि कः संभावयेदार्यमरणे मज्जी- वितम्। तत्तादृशमैक्यमेकपद् एव क्वापि गतम्। अयत्नेनैव हत- विधिना पृथक्कृतोऽस्मि। दग्धरोषान्तरितशुचा सुचिरं रुदितमपि न मुक्तकण्ठं गतघृणेन मया। सर्वथा लूतातन्तुच्छटाच्छिदुरास्तु- च्छाः प्रीतयः प्राणिनाम्। लोकयात्रामात्रनिबन्धना बान्धवता यत्रा- हमपि नाम पर इवार्ये स्वर्गस्थे स्वस्थ इवासे। किंच दैवहतकेन फल- मासादितमीदृशि परस्परप्रीतिबन्धनिर्वृतहृदये सुखभाजि भ्रातृमिथुने विघटिते। तथा च चन्द्रमया इव जगदाह्लादिनो लोकान्तरीभूतस्य लग्न- चिताग्नय इवार्यस्य त एव दहन्ति गुणाः। इत्येतानि चान्यानि च हृदयेन -पर्यदेवत्। प्रभातायां च शर्वर्यां प्रातरेव प्रतीहारमादिदेशाशेषगजसाधना- ऽधिकृतं स्कन्दगुप्तं द्रष्टुमिच्छामीति।

लूता तन्तुच्छटा जालकारसूत्रजालम्। लोकयात्रा लोकाचारः। किं फलमासा- दितम्, न किंचिदित्यर्थः। पर्यदेवत् शुशोच।

और भी कठोर उत्पन्न होता है उसी प्रकार आर्य थे। कैसे मेरे इस मुष्ट हृदय का आर्य के विरह में एक बार भी सांस लेना ठीक है? यह क्या प्रीति है या भक्ति है या अनुवर्तन है? मूर्ख भी कौन होगा जो आर्य के मरने पर मेरे जीवित रहने की सम्भावना करे? उस प्रकार का वह अभिन्न साथ तत्काल ही कहीं चला गया। दुष्ट विधाता ने भाई से मुझे अनायास ही अलग कर दिया। रोष के कारण शोक के दब जाने से निर्दय मैं देर तक मुक्तकंठ से रो भी न सका। सर्वथा मकड़ी के जाले के समान प्राणियों का तुच्छ प्रेम थोड़े ही में टूट जाता है। सचमुच भाई-बन्धु का नाता लोकव्यवहार मात्र के लिए है, जहाँ मैं भी आर्य के स्वर्ग चले जाने पर पराये की भाँति स्वस्थ होकर पड़ा हूँ। परस्पर प्रेम-भरे सुखपूर्वक रहने वाले दो भाइयों के अलग हो जाने से दुष्ट दैव को क्या लाभ हुआ? आर्य के ही गुण जो चन्द्र की ज्योत्स्ना के समान संसार को आह्लादित करते थे, अब उनके लोकान्तर में चले जाने से चिता में लगी हुई अग्नि के समान दाह उत्पन्न कर रहे हैं।' इस प्रकार हृदय से वे रुदन करते रहे। रात बीतने पर प्रातःकाल ही उन्होंने प्रतीहार को आज्ञा दी—'मैं गजसाधनाधिकृत स्कन्दगुप्त से मिलना चाहता हूँ।'

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