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हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

तेजस्यहिमभासि, तामरसवनेष्वपि निगूढशिलीमुखालापेषु त्रासा- दिव संकुचत्सु, विहगगणेष्वपि समुपसंहृतनिजपक्षविक्षेपनिश्चलेषु भियेवाप्रकटीभवत्सु, भुवनव्यापिनीं संध्यां प्रतिज्ञामिव मानयति नतशिरसि घटिताञ्जलिवने जने सकले, स्वपदच्युतिचकितदिक्पा- लदीयमानाभ्रंलिहलोहप्राकारवलयकलितास्विव बहलतिमिरमालातिरो- धीयमानासु दिक्षु प्रदोषस्थाने नातिचिरं तस्थौ । नपन्नृपलो- कलोलांशुकपवनकम्पितशिखैर्दीपिकाचक्रवालैरपि प्रणम्यमान इव प्राहिणोल्लोकं प्रतिषिद्धपरिजनप्रवेशश्च शयनगृहं प्राविशत् । उत्ता- नश्च मुमोचाङ्गानि शयनतले । दीपद्वितीयं च तमभिसर इव लब्धावसरस्तरसा भ्रातृशोको जग्राह । जीवन्तमिव हृदये निमी- लितलोचनो ददर्शाग्रजम् । उपर्युपरि भ्रातृजीवितान्वेषिण इव प्रसस्रुः श्वासाः । धवलांशुकपटान्तेनेव चाश्रुजलप्लवेन मुखमा- च्छाद्य निःशब्दमतिचिरं रुरोद । चकार च चेतसि कथं नामाकृते- स्तादृश्या युक्तः परिणामोऽयमीदृशः । पृथुशिलासंघातकर्कशकाय- मुखाः । सहाया अपि पक्षाः । अभिसराश्चौराः । लगे । पक्षी भी मानों डर के मारे अपने डैने सिकोड़ कर निश्चल भाव से छिप गए । सब लोग भुवन में व्याप्त संध्या को ही प्रतिज्ञा के समान मान कर सिर झुकाकर और हाथ जोड़ कर प्रणाम करने लगे । चारों ओर अंधकार से दिशाएँ तिरोहित होने लगीं, मानों दिक्पालों ने अपनी पदच्युति होने के डर से लोहे के आकाशचुम्बी प्राकार खड़े कर दिए हों । देव हर्ष प्रदोषोत्थान में थोड़ी देर बैठे । पवन से कम्पित दीपशिखा के समान उन्हें प्रणाम करते हुए राजाओं के अंशुक चंचल हो उठे । सब लोगों को भेज कर स्वयं वे परिजनों का प्रवेश रोक कर शयनगृह में गए । वहाँ शयनतल पर उत्तान हो अङ्गों को ढीले छोड़ पड़ रहे । वहाँ एक दीप जल रहा था और दूसरे वे थे । उसी समय भाई के शोक ने अवसर पाकर चोर के समान उन्हें वेग से पकड़ लिया । आँखें बन्द करके उन्होंने अपने हृदय में मानों जीते हुए अपने बड़े भाई राज्यवर्धन को देखा । मानों भाई के प्राणों को ढूँढ़ने के लिए उनके श्वास ऊपर-ऊपर बढ़ने लगे । आँसू से डबडबाए अपने मुँह को सफेद अंशुक के अग्रभाग से ढंक कर बहुत देर तक बिना शब्द के सिसक-सिसक कर रोने लगे । मन में सोचने लगे कि उस तरह की आकृति का भी यह नतीजा ठीक कैसे है ? पिताजी के शरीर की बनावट शिलासंघात जैसी थी और जैसे पर्वत से लोहा २२ ह० च०

३३८ हर्षचरितम् बन्धात्तातादचलादिव लोहधातुः कठिनतर आसीदार्यः। कथं चास्य मे हतहृदयस्यार्यविरहे सकृदपि युक्तं समुच्छ्वसितुम्। इयं सा प्रीतिर्भक्तिरनुवृत्तिर्वा। बालिशोऽपि कः संभावयेदार्यमरणे मज्जी- वितम्। तत्तादृशमैक्यमेकपद् एव क्वापि गतम्। अयत्नेनैव हत- विधिना पृथक्कृतोऽस्मि। दग्धरोषान्तरितशुचा सुचिरं रुदितमपि न मुक्तकण्ठं गतघृणेन मया। सर्वथा लूतातन्तुच्छटाच्छिदुरास्तु- च्छाः प्रीतयः प्राणिनाम्। लोकयात्रामात्रनिबन्धना बान्धवता यत्रा- हमपि नाम पर इवार्ये स्वर्गस्थे स्वस्थ इवासे। किंच दैवहतकेन फल- मासादितमीदृशि परस्परप्रीतिबन्धनिर्वृतहृदये सुखभाजि भ्रातृमिथुने विघटिते। तथा च चन्द्रमया इव जगदाह्लादिनो लोकान्तरीभूतस्य लग्न- चिताग्नय इवार्यस्य त एव दहन्ति गुणाः। इत्येतानि चान्यानि च हृदयेन -पर्यदेवत्। प्रभातायां च शर्वर्यां प्रातरेव प्रतीहारमादिदेशाशेषगजसाधना- ऽधिकृतं स्कन्दगुप्तं द्रष्टुमिच्छामीति।

लूता तन्तुच्छटा जालकारसूत्रजालम्। लोकयात्रा लोकाचारः। किं फलमासा- दितम्, न किंचिदित्यर्थः। पर्यदेवत् शुशोच।

और भी कठोर उत्पन्न होता है उसी प्रकार आर्य थे। कैसे मेरे इस मुष्ट हृदय का आर्य के विरह में एक बार भी सांस लेना ठीक है? यह क्या प्रीति है या भक्ति है या अनुवर्तन है? मूर्ख भी कौन होगा जो आर्य के मरने पर मेरे जीवित रहने की सम्भावना करे? उस प्रकार का वह अभिन्न साथ तत्काल ही कहीं चला गया। दुष्ट विधाता ने भाई से मुझे अनायास ही अलग कर दिया। रोष के कारण शोक के दब जाने से निर्दय मैं देर तक मुक्तकंठ से रो भी न सका। सर्वथा मकड़ी के जाले के समान प्राणियों का तुच्छ प्रेम थोड़े ही में टूट जाता है। सचमुच भाई-बन्धु का नाता लोकव्यवहार मात्र के लिए है, जहाँ मैं भी आर्य के स्वर्ग चले जाने पर पराये की भाँति स्वस्थ होकर पड़ा हूँ। परस्पर प्रेम-भरे सुखपूर्वक रहने वाले दो भाइयों के अलग हो जाने से दुष्ट दैव को क्या लाभ हुआ? आर्य के ही गुण जो चन्द्र की ज्योत्स्ना के समान संसार को आह्लादित करते थे, अब उनके लोकान्तर में चले जाने से चिता में लगी हुई अग्नि के समान दाह उत्पन्न कर रहे हैं।' इस प्रकार हृदय से वे रुदन करते रहे। रात बीतने पर प्रातःकाल ही उन्होंने प्रतीहार को आज्ञा दी—'मैं गजसाधनाधिकृत स्कन्दगुप्त से मिलना चाहता हूँ।'

अथ युगपत्प्रधावितबहुपुरुषपरम्पराहूयमानः, स्वमन्दिरादप्रतिपालित- करेणुश्चरणाभ्यामेव संभ्रान्तः, ससंभ्रमैर्दण्डिभिरुत्सार्यमाणजनपदः, पदे पदे प्रणमतः प्रतिदिशमभिषग्वरान्वारणानां विभावरीवार्ताः पृच्छन्नु- च्छ्रितशिखिपिच्छलाञ्छितवंशलतावनगहनगृहीतदिगायामैर्विन्ध्यवनैरिव वारणबन्धविमर्दोद्योगागतैः, पुरःप्रधावद्भिरनायत्तमण्डलैराधोरणगणैश्च मरकतहरितघासमुष्टीश्च दर्शयद्भिर्नवग्रहगजपतींश्च प्रार्थयमानैश्च लब्धाभि- मतमत्तमातङ्गमुदितमानसैश्च सुदूरमुपसृत्य नमस्यद्भिरात्मीयमातङ्गमदा- गमांश्च निवेदयद्भिः, डिण्डिमाधिरोहणाय च विज्ञापयद्भिः, प्रमादपति- तापराधापहृतद्विरददुःखधृतदीर्घश्मश्रुभिरमतो गच्छद्भिः, अभिनवोप- सूतैश्च कर्पटिभिर्वारणाप्तिसुखप्रत्याशया धावमानैः, गणिकाधिकारिगणे- श्चिरलब्धान्तरैरुच्छ्रितकरैः, कर्मण्यकरेणुकासंकथनाकुलैरुल्लासितपल्लव- चिह्नाभिररण्यपालपङ्क्तिभिश्च, निष्पादितनवग्रहनागनिवहनिवेदनोद्यताभि- रुत्तम्भिततुङ्गतोत्रवनाभिर्महामात्रपेटकैश्च प्रकटितकरिकर्मचर्मपुटैः, अभि- अथत्यादौ। स्कन्दगुप्त एतैरेतैः क्रियमाणकोलाहलो राजकुलं विवेशेति संब- न्धः। भिषग्वरान्वैद्योत्तमान्। बन्धो रोधनमपि। अनायत्ता हस्तिपार्श्वरक्षिणः। आधोरणा गजारोहाः। डिण्डिमः पटहः। गणिका गजानां प्रतिलोभनार्था हस्तिनी। कर्मण्यकरेणुका करिग्रहकुशला करिणी। तुदन्त्यनेनेति तोत्रं प्रेषणकम्। महामात्राः प्रधानहस्त्यारोहाः। तेषां पेटकैः समूहैः। करिणां कर्मार्थं युद्ध- आज्ञा पाते ही अनेक युवक स्कन्दगुप्त को ताबड़तोड़ बुलाने पहुंचे। वह अपने भवन से निजी हथिनी की प्रतीक्षा किए बिना पैदल ही झटपट राजकुल के लिए चल पड़ा। घबराए हुए दण्डधारी सैनिक उसके सामने से लोगों की भीड़ हटाने लगे। पद-पद पर चारों ओर से प्रणाम करते हुए हाथियों के बारे में चिकित्सकों से पूछता जाता था कि पिछली रात उनका क्या हाल रहा ? उसके चारों ओर गजकटक का शोर हो रहा था। विन्ध्याचल के वनों के समान ऊंचे बांस के सिरे पर मोर के पंख बांधे दिशाओं में व्याप्त होने वाले, हाथियों को हांका देकर पकड़ने के लिए दूर-दूर से बुलाए गए, हाथियों के पार्श्व- रक्षी लोग और महावत, जो मरकत के समान हरी-हरी घास की मूठ देकर नए पकड़ कर लाए गए हाथियों को परचा रहे थे और मतवाले हाथियों के बात मान लेने पर प्रसन्न हो रहे थे, दूर से दौड़ कर उसे प्रणाम करने लगे, अपने अपने हाथियों के यौवन के कारण मद फूट कर बहने की सूचना देने लगे । बड़ी अवस्था के हाथियों के डिंडिमाधिरोहण के लिए निवेदन करने लगे। कुछ महावत गिर जाने के अपराध के कारण हाथी के छिन जाने के

३४० हर्षचरितम्

नवगजसाधनसंचरणवार्तानिवेदनबिसर्जितैश्च नागवनवीथीपालदूतवृन्दैः, प्रतिक्षणप्रत्यवेक्षितकरिकवलकूटैश्च, कटभङ्गसंग्रहं ग्रामनगरनिगमेषु निवे- दयमानैः, कटककदम्बकैः क्रियमाणकोलाहलः, स्वामिप्रसादसंभृतेन महा- धिकाराविष्कारेण स्वाभाविकेन चावष्टम्भाभोगोनोदासीनोऽप्यादिशन्निव, असंख्यकरिकर्णशङ्खसंपत्संपादनाय समुद्रानाज्ञापयन्निव, शृङ्गारगैरिकप- ङ्करागसंग्रहाय गिरीन्मुष्णन्निव, दिग्गजाधिकारं ककुभामैरावतमिवाप- हरन्हरेर्हरपदभरनमितकैलासगिरिगुरुभिः पादन्यासैर्गुरुभारग्रहणगर्वमु- र्व्याः संहरन्निव, गतवशविलोलस्य चाजानुलम्बस्य बाहुदण्डद्वयस्य विक्षे- पैरालानशिलास्तम्भमालामिवोभयतो निखनन्नीषत्सुङ्गुलम्बेनाघरबिम्बे-

शिक्षायै । चर्मपुटः चर्मकृतो हस्त्याकारः । कटभङ्गः प्रत्यग्रम् । गोधूमादियवसम्, घास इत्यर्थः । निगमा वणिकपथाः । कटका हस्तिपटनियुक्ताः, अग्रेसरा वेत्रिण इत्यन्ये । गुणाः शौर्याद्याः, मौर्वी च गुणः ।

दुःख से लम्बी दाढ़ी बढ़ाए उसके आगे आगे चल रहे थे । बाहर से नये पहुंचे हुए सिर पर चीरा बांधे हाथियों के परिचारक हाथियों की सेवा के काम मिलने की प्रत्याशा में खुशी से दौड़ रहे थे । हाथियों को फंसाने के काम में फुसलात्रा देने वाली गणिका संज्ञक हथि- नियौँ के अधिकारी बहुत दिनों से आकर प्रतीक्षा कर रहे थे और अवसर पाकर काम में सिद्ध हथिनियों के करतब हाथ उठा कर सुनाने लगे । पल्लव के चिह्न वाले अरण्यपाल लोग नये पकड़े हुए गजयूथों को लेकर हाथ में ऊँचे अंकुश लिए कटक में उपस्थित थे । महामात्र लोग चमड़े का मरा हुआ हाथी का पुतला तैयार करके उसके द्वारा हाथियों को युद्ध की शिक्षा देते थे । नागवीथीपालों के भेजे हुए दूत अभिनव गजयूथ के संचरण की खबर देने के लिए आए हुए थे । कटक में एक एक क्षण हाथियों के लिए चारे की बाट देखने में नियुक्त झुण्ड के झुण्ड प्यादे हर गांव, नगर, मंडी में चारा संग्रह करके सूचना देते थे । स्वामी के प्रसाद से प्राप्त गजसाधनाधिकृत के पद की प्रतिष्ठा से एवं स्वाभाविक गर्वजनित गम्भीरता से वह चुपचाप होने पर आदेश देता हुआ सा लग रहा था । मानों समुद्रों को यह आज्ञा दे रहा था कि संख्यातीत हाथियों के कान में अलंकार के रूप में लटकाने के लिए शंख उत्पन्न करो। हाथियों के शृङ्गार के लिए गैरिक पंक के अंगराग के संग्रह के लिए पर्वतों को मानों लूट रहा था। दिशाओं के दिग्गजों के पद पर प्रतिष्ठित ऐरावत के अधिकार को मानों छीन रहा था। शिव के पदभार से झुके हुए कैलास पर्वत के समान भारी अपने पादन्यासों से वराहरूपधारी विष्णु के पृथिवी को उठाने से उत्पन्न गर्व को मानों कम कर रहा था । जानुभाग तक लम्बे उसके दोनों हाथ चलने से हिल रहे

षष्ठ उच्छ्वासः ३४१ नामृतरसस्वादुना नवपल्लवकोमलेन कवलेनेव श्रीकरेणुकां विलोभयन्नि- जनृपवंशदीर्घं नासावंशं दधानः, अतिस्निग्धमधुरधवलविशालतया पीत- क्षीरोदेनेव पिबन्नेक्षणयुग्मायामेन दिशामयामं मेरुतटादपि विकटवि- पुलालिकः, सततमविच्छिन्नच्छत्रच्छायाप्ररूढिवशादिव नितान्तायतनी- लकोमलच्छविसुभगेन स्वभावभङ्गुरण कुन्तलबालवल्लरीवेष्टितविलासिना लुनन्निव, लुप्तालोकानर्ककरान्बर्बरकेणारिपक्षपरिक्षयपरित्यक्तकार्मुकक- र्मोपि सकलदिगन्तश्रूयमाणगुरुगुणध्वनिः, आत्मस्थसमस्तमत्तमातङ्गसा- थे, मानों अपने दोनों ओर हाथियों को मारने के लिए पत्थर के आलानस्तम्भ गाड़ रहा था। अमृत के समान स्वादु, नवपल्लवसदृश कोमल, कुछ ऊँचे और लटके हुए अपने अधर से मानों वह श्रीकरेणुका (सिंगार-पटार से सजाई हुई हथिनी) को लुभा रहा था। उसका नासिकावंश अपने राजा के वंश के समान ही लम्बा था। मानों क्षीरसमुद्र को ही पी लेने के कारण उसकी आंखें अत्यन्त स्निग्ध, मधुर, धवल एवं विशाल थीं, जिनसे दिशाओं के आयाम को भी मानों पान करता जा रहा था। उसका ललाट मेरु के तट से भी कहीं अधिक विकट और फैला हुआ था। उसकी बबरी हमेशा छत्र की छाया में ही बढ़ते रहने से मानों अत्यन्त नील और कोमल हो गई थी। बालों के गुच्छे मजरी के समान घुमावदार थे, मानों वह उनसे सूर्यकिरणों के आलोक को भी मलिन कर रहा था। वह शत्रुओं के विनाश के लिए धनुष धारण करने का कर्म छोड़ चुका था, फिर भी समस्त दिशाओं में उसके गुणों की गम्भीर ध्वनि सुन पड़ती थी¹। मतवाले हाथियों की सेना उसके अधीन थी, फिर भी उसे मद छू भी न सका था²। वह ऐश्वर्यसम्पन्न और स्नेह से भरा था³। वह पार्थिव (राजा) और गुणमय था⁴। दान से भरे हाथियों पर जैसे वह १. विरोध पक्ष यह कि धनुष कर्म छोड़ देने पर दिशाओं में गुणों अर्थात् धनुष के तन्तुओं की टंकार कैसे सुन पड़ेगी ? समाहार पक्ष यह है कि उसके विनय आदि गुणों की सर्वत्र प्रसिद्धि हो गई थी। २. विरोध—मदवाले हाथी को अपने अधीन रखने पर उनके मद का स्पर्श होना स्वाभाविक है। परिहार पक्ष—मद अर्थात् गर्व ने उसका स्पर्शन नहीं किया था। ३. विरोध—जो भूतिमान् अर्थात् भस्मयुक्त है वह स्नेहमय कैसे हो सकता है ? परिहार—भूतिमान् अर्थात् वह ऐश्वर्यसम्पन्न और स्नेह से भरा था। ४. विरोध—पार्थिव अर्थात् घट के समान पृथिवी से जो उत्पन्न हो वह पट के समान गुणमय अर्थात् तन्तु से बना कैसे हो सकता है ? परिहार—पार्थिव अर्थात् राजा एवं गुणमय अर्थात् गुणवान् था।

३४२ हर्षचरितम् धनोऽप्यस्पृष्टो मदेन भूतिमानपि स्नेहमयः पार्थिवोऽपि गुणमयः करिणा- मिव दानवतामुपरि स्थितः, स्वामितामिव स्पृहणीयां भृत्यतामप्यपरिभू- तामुद्वहन्नेकभर्तृभक्तिनिश्चलां कुलाङ्गनामिवानन्यगम्यां प्रभुप्रसादभूमिमा- रूढः, निष्कारणबान्धवो विदग्धानाम् , अभृतभृत्यो भजताम् , अक्रीत- दासो विदुषाम् , स्कन्दगुप्तो विवेश राजकुलम् । दूरादेव चोभयकरकम- लावलम्बितं स्पृशन्मौलिना महीतलं नमस्कारमकरोत् । उपविष्टं च नातिनिकटे तं तदा जगाद देवो हर्षः—'श्रुतो विस्तर एवास्यार्यव्यतिकरस्यास्माच्चिकीर्षितस्य च । अतः शीघ्रं प्रवेश्यन्तां पचा- रनिर्गतानि गजसाधनानि । न क्षाम्यत्यतिस्वल्पमप्यार्यपरिभवपीडापावकः प्रयाणविलम्बम् ।' इत्येवमभिहितश्च प्रणम्य व्यज्ञापयत्—'कृतमवधारयतु स्वामी समादिष्टं किंतु स्वल्पं विज्ञाप्यमस्ति भर्तृभक्तेः । तदाकर्णयतु देवः । देवेन हि पुष्यभूतिवंशसंभूतस्याभिजनस्याभिजात्यस्य सहजस्य तेजसो मदो गर्वोऽपि । भूतिः संपत्, भस्म च। पार्थिवो राजा, पृथिव्यारब्धश्च । गुणास्तन्त- वोऽपि । नहि घटः पटो भवतीति विरोधः । दानं मदः, वितरणं च । प्रचारो भक्षणम् । गजसाधनानि करिसैन्यानि । अभिषङ्गा अभिभवाः । शासन करता था उसी प्रकार दानियों में भी सबसे ऊपर रहने वाला था। अपनी स्वामिता के समान स्पृहणीय और कभी अभिभूत न होने वाली भृत्यता को धारण कर रहा था। कुलांगना के समान एक ही पति में निश्चल भक्ति रखने वाली और किसी दूसरे का गमन न करनेवाली अपने स्वामी की प्रसन्नता उसे उपलब्ध थी। वह विदग्ध लोगों का अकारण बन्धु था, सेवा करने वालों का अवैतनिक भृत्य था, और विद्वानों का भी बिना वेतन का दास था। उसने दूर ही से अपने दोनों कर-कमलों का अवलम्बन लेकर मस्तक से पृथिवी का स्पर्श करते हुए नमस्कार किया। स्कन्दगुप्त सम्राट् के कुछ दूर बैठ गया। तब देव हर्ष ने उससे कहा—'आर्य के हत्याकाण्ड के बारे में तथा हमने जो निश्चय किया है वह आपने विस्तार से सुन लिया होगा। अतः शीघ्र ही चरने के लिए बाहर गई हुई गजसेना को स्कन्धावार में लौटने की आज्ञा दी जाय। आर्य की हत्या से उत्पन्न कष्ट के कारण मैं क्षण भर भी शत्रु पर धावा बोलने में विलम्ब सह नहीं सकता।' हर्ष के ऐसा कहने पर स्कन्दगुप्त ने प्रणाम करके निवेदन किया—'देव, आपने जो आज्ञा दी है उसे पूरी ही समझें, किन्तु स्वामी के प्रति भक्ति के कारण थोड़ा-सा मेरा निवेदन है। कृपया देव उसे सुनें। देव ने जो यह

षष्ठ उच्छ्वासः ३४३ दिक्करिकरप्रलम्बस्य बाहुयुगलस्यासाधारणस्य च सोदरस्नेहस्य सर्वं सह- शमुपक्रान्तम्। काकोदराभिधानाः कृपणाः कृमयोऽपि न मृष्यन्ति निकारं किमुत भवादृशास्तेजसां राशयः। केवलं देवराज्यवर्धनोदन्तेन कियदपि दृष्टमेव देवेन दुर्जनदौरात्म्यम्। ईदृशाः खलु लोकस्वभावाः प्रतिग्रामं प्रतिनगरं प्रतिदेशं प्रतिद्वीपं प्रतिदिशं च भिन्ना वेशाश्चाकाराश्चाहाराश्च ठ्याहाराश्च व्यवहाराश्च जनपदानाम्। तदियमात्मदेशाचारोचिता स्वभा- वसरलहृदयजा त्यज्यतां सर्वविश्वसिता। प्रमाददोषाभिषङ्गेषु श्रुतबहुवार्त एव प्रतिदिनं देवः। यथा नागकुलजन्मनः सारिकाश्रावितमन्त्रस्यासीन्नाशो नागसेनस्य पद्मावत्याम्। शुकश्रुतरहस्यस्य च श्रीरशोर्यत श्रुतवर्मणः श्रावस्त्याम्। स्त्रप्रायमानस्य च मन्त्रभेदोऽभून्मृत्यवे मृत्तिकावत्यां सुवर्ण- चूडस्य। चूडामणिगलम्लेखप्रतिबिम्बवाचिताक्षरा च चारुचामीकरचामर- प्रियममिति। उपक्रान्तं निदर्शयितुमाह-यथेति। अत्र कथा-नागसेननामा पद्मावत्यां राजा मन्त्रिणमर्धराज्यहरमपाकतुं शारिकासमक्षं मन्त्रमकरोत्। स चापि मन्त्री शारिकामुखाद्विज्ञाय विस्रम्भपूर्वकं तं दण्डेनावधीदिति। श्रावस्त्यां च श्रुतवर्मा पूर्ववच्छुकश्रावितमन्त्रो राज्याच्च्युत्याव। अनेन च गूढमन्त्रेण यत्ना- द्वाव्यमित्युक्तम्। मृत्तिकावत्यां सुवर्णचूडो नाम राजा कंचिद्विस्रम्भपूर्वकं जिघृक्षन्मन्त्रितवांस्तदेव तस्मै विललास। ततस्तत्पूर्वं तत्प्रयुक्तेन विश्वासिना शिरो- रक्षकेण स्वस्वामिप्रयुक्तेन व्यापादित इति। अनेन च कुलस्वभावाद्यपरीक्ष्य न उपक्रम किया है वह पुष्पभूति के वंश में उत्पन्न होने वाले आपके और परम्परागत आपके तेज के एवं दिग्गज को सूँड के समान लम्बी आपकी भुजाओं और सहोदर भाई के प्रति आपके असाधारण स्नेह के सर्वथा अनुकूल है। बेचारे साँप जैसे कीड़े भी जब अपना परिभव नहीं सहन कर पाते तो आपके जैसे तेजस्वियों की बात क्या ? केवल आपने देव राज्यवर्धन के इस वृत्तान्त से दुर्जनों के अत्याचार को कुछ ही देखा। निश्चय ही अब के लोगों के ऐसे स्वभाव हैं जो कि प्रत्येक ग्राम, प्रत्येक नगर, प्रत्येक द्वीप और प्रत्येक दिशा में सारे जनपदों के भिन्न भिन्न आकार, भिन्न-भिन्न आहार, भिन्न- भिन्न बातचीत एवं व्यवहार हो गए हैं। अतः स्वभाव से ही सरल हृदय होने के कारण अपने देश के अनुकूल सब पर विश्वास कर लेने की भावना का परित्याग करें। प्रतिदिन देव ने प्रमाद दोष से राजाओं पर आने वाली विपत्तियों के सम्बन्ध में बहुत कुछ सुना ही है। जैसा कि पद्मावती नगरी के नागवंशी राजा का नाश सारिका के गुप्त विचार देने पर (उसी का आधा राज्य हड़प कर बैठे हुए मंत्री द्वारा) हो गया। श्रावस्ती के राजा

३४४ हर्षचरितम् ग्राहिणी यमतां ययौ यवनेश्वरस्य । लोभबहुलं च बहुलनिशि निधानमु- त्खनन्तमुत्खातखङ्गप्रमाथिनी ममन्थ माथुरं बृहद्रथं विदूरथवरूथिनी । नागवनविहारशीलं च मायामातङ्गाङ्गान्निर्गता महासेनसैनिका वत्सपतिं न्ययंसिषुः । अतिदयितलास्यस्य च शैलूषमध्यमध्यास्य मूर्धानमसिलतया मृणालमिवालुनादग्निमित्रात्मजस्य सुमित्रस्य मित्रदेवः । प्रियतन्त्रीवाद्य- स्यालाबुवीणाभ्यन्तरसुषिरनिहितनिशिततरवारयो गान्धर्वच्छलात्तच्छद्मानः कार्यों भृत्य इत्युक्तम् । यवनेश्वरः केनचिच्छत्रुणासाद्य व्यापादितुमिष्टः । स्वसुहृदा शत्रुप्रहितलेखेन बोधितः । लेखपृष्ठे च तेन लिखितम् 'स्वयं वाचयितव्यो लेख' इति । ततो यवनेश्वरस्य स्वयं वाचयतश्चूडामणिप्रतिबिम्बितान्यक्षराणि वाचयित्वा तत्प्रहिता चामरग्राहिणी प्रभवे निवेद्य तदाज्ञया तं जघानेति । अनेन सूक्ष्मोऽपि रहस्यभेदहेतू रक्षणीय इत्युक्तम् । विदूरथप्रयुक्तेन नरेन्द्रवृन्दप्रतारितो बृहद्रथो नाम राजा लोभवशात्खन्यवादे कृष्णनिशि प्रवृत्तस्तत्सेनया प्रहत इति । अतः प्रवर्तितव्यमित्युक्तम् । महासेनो नामोज्जयिनीपतिः स्वदुहितरं वासवदत्ता- ख्यामुदयनाय दित्सुः कपटजं नागं वीध्यां प्रसह्य छद्मप्रहितैः शरैर्नामगुणान्प्रख्या- श्रुतवर्मा का राज्य भी सुग्गे के द्वारा रहस्य की बात जान लेने पर हाथ से चला गया । मृत्तिकावती के राजा सुवर्णचूड़ का निद्रा की अवस्था में बड़बड़ाने से हुआ मंत्रभेद ही उसकी मृत्यु का कारण बना । शत्रु के द्वारा रहस्य जानने के लिए भेजी हुई चामरग्राहिणी बाचते समय चूड़ामणि में प्रतिबिम्बित मित्र का गुप्त लेख पढ़कर यम के रूप में यवनेश्वर की हत्या का कारण बन गई । राजाओं के बहकाने पर अँधेरी रात में जमीन से रत्न का खजाना उखाड़ते हुए अत्यन्त लोभी मथुरा के राजा बृहद्रथ को विदूरथ की सेना ने तलवार खींच कर मार डाला । उज्जयिनी के राजा महासेन के मायाहस्ती के शरीर में छिपे हुए सैनिकों ने वत्सराज को नागबन में बिहार के लिए छल से ले जाकर मार डाला । मित्रदेव ने नट का भेस बनाकर नृत्य के शौकीन अग्निमित्र के पुत्र सुमित्र का सिर मृणाल के समान कतर दिया । शत्रु के पुरुषों ने संगीत सीखने के बहाने कपट से शिष्य का भेस बनाकर संगीत के प्रेमी अश्मक के राजा शरभ का सिर वीणा के भीतर छिपाकर रखी हुई तलवारों से काट डाला । अनार्य सेनापति पुष्पमित्र ने सेना को देखने के बहाने सारे सैनिकों को मिलाकर प्रजा में दुर्बल अपने स्वामी मौर्य राजा बृहद्रथ को समाप्त कर डाला । नये आविष्कारों में कुतूहल रखने वाला चण्डीपति युद्ध में हारे यवनों के द्वारा निर्मित आकाश में उड़ने वाले यंत्रयान से जाने कहाँ पहुँचा दिया गया । अचरज की बातों में कुतूहल दिखाने वाला शिशु नागपुत्र काकवर्ण युद्ध में जीतकर आए हुए यवन से निर्मित

षष्ठ उच्छ्वासः ३४५ चिच्छिदुरश्मकेश्वरस्य शरभस्य शिरो रिपुपुरुषाः । प्रज्ञादुर्बलं च बल- दर्शनव्यपदेशदर्शिताशेषसैन्यः सेनानीरनार्यो मौर्यं बृहद्रथं पिपेष पुष्प- मित्रः स्वामिनम् । आश्चर्यकुतूहली च दण्डोपनतयवननिर्मितेन नभस्तलयायिना यन्त्रयानेनानीयत कापि काकवर्णः शैशुनागिश्च नगरो- पकण्ठे कण्ठे निचकृते निस्त्रिंशेन । अतिस्त्रीसङ्गरतमङ्गपरवशं शुङ्गम- मात्यो वसुदेवो देवभूतिदासीदुहित्रा देवीव्यञ्जनया वीतजीवितमकारयत् । असुरविवरव्यसनिनं चापजहुरपरिमितरमणीमणिनूपुरझणझणाह्लादरम्य- या मागधं गोधनगिरिसुरुङ्गया स्वविषयं मेकलाधिपमन्त्रिणः । महाकाल- महे च महामांसविक्रयवादवातूलं वेतालस्तालजङ्घो जघान जघन्यजं प्योदयनं लोभितवान्। सोऽप्यविचार्यैव गजग्रहग्राहिकया कतिपयाप्तपरिवारो घोषवतीं वीणामादाय तत्र गतः कपटकुञ्जरान्तर्गतैर्महासेन सैनिकैः संहृत इति । अतो नाल्पपरिवारैः संवीथ्य च विस्रब्धैर्भाव्यमित्युक्तम् । सुमित्रो राजा मित्र- व्यसनी स्त्रीजनपरिवार इव नटजने विस्रब्धो मित्रदेवेन नटत्वमाश्रित्य हतः । स च योगचूर्णार्वाच्चूर्णितस्तिरोहितो बभूवेति । अतो व्यसनिभिः प्रकृतलोक- विश्वासिभिश्च न भाव्यमित्युक्तम् । शरभोऽतिशयितान्वाद्यवतः प्रवेशमदादिति गुहायुद्धै रिपुपुरुषैर्हत इति । अतो मनागपि व्यसनं वर्जनीयमित्युक्तम् । अका- र्यमत्र परदारागमनादि । तरवारिरेकधारः खड्गः । प्रज्ञेत्यादि स्पष्टा कथा । अनेन च भृत्यबलदर्शनमसंनद्धैर्न कार्यमित्युक्तम् । मौर्यमिति गोत्रनाम । काकवर्णो यवनान्विजित्य तैश्च स्वपुरुषानुपायनीकृत्य यन्त्रयानैस्तद्दत्तैः परदारादीनाच्छुन्न्य- वनैरात्मदेशं प्रापय्य निहत इति । अतः शत्रुप्रामृतेषु भृत्येषु न विश्वसनीयमि- त्युक्तम् । देवीव्यञ्जनया महिषीव्याजया । मेकलाधिपमन्त्रिभिर्वांतिकच्छद्मभिरहि- विवरं साधितम् । तपसास्माभिरित्युक्त्वा मागधो गुहाद्वारप्रतिद्वारैर्बद्धोऽभूत् । गोधनगिरिः सूर्याख्यः पर्वतः । सुरुङ्गा विवरम् । मेकलो विन्ध्याद्रिः । मह आकाशगामी यंत्रयान में उड़ाकर कहीं दूर किसा नगर नामक राजधानी के बाहर ले जाया गया और वहाँ तलवार से उसका कंठ काट दिया गया । अमात्य वसुदेव ने स्त्रियों के साथ दिन-रात रहने वाले कामी राजा शुंग को देवभूत की दासी की पुत्री को रानी के भेष में भेजकर मरवा डाला । मेकलाधिप के सचिव पातालदर्शन के प्रेमी मगधराज को अनेक सुन्दरियों के मणिनूपुर की आवाज से गूंजते हुए गोवर्धन पर्वत के सुरंग मार्ग से अपने देश में हरकर ले गए । पुणिक के पुत्र प्रद्योत के छोटे भाई कुमारसेन को जब वह महाकाल के उत्सव में महामांस विक्रय के सम्बन्ध में वाद विवाद कर रहा था,

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षष्ठ उच्छ्वासः ३४७ चन्द्रगुप्तः शकपतिमशातयदिति । प्रमत्तानां च प्रमदाकृता अपि प्रमादाः श्रुतिविषयमागता एव देवस्य । यथा मधुमोचितमधुरकसंलिप्तैर्लाजैः सुप्रभा पुत्रराज्यार्थं महासेनं काशिराजं जघान । व्याजजनितकंदर्पदर्पा च दर्प- णेन क्षुरधारापर्यन्तेनायोध्याधिपतिं परंतपं रत्नवती जारूध्यम् , विष- चूर्णचुम्बितमकरन्देन च कर्णेन्दीवरेण देवकी देवरानुरक्ता देवसेनं सौह्मथम्, योगपरागविरसवर्षिणा च मणिनूपुरेण वल्लभा सपत्नीरुषा वैरन्त्या रन्तिदेवम्, वेणीविनिगूढेन च शस्त्रेण बिन्दुमती वृष्णिं विदूर- थम्, रसदिग्धमध्येन च मेखलामणिना हंसवती सौवीरं वीरसेनम्, अदृश्यागदविलिप्तवदना च विषवारुणीगण्डूषपायनेन पौरवी पौरवेश्वरं सोमकम् ।' इत्युक्त्वा विरराम स्वाम्यादेशसंपादनाय च निर्जगाम । देवोऽपि हर्षः सकलराज्यस्थितीश्चकार । ततश्च तथा कृतप्रतिज्ञे प्रयाणं विजयाय दिशां समादिशति देवे हर्षे गतायुषां प्रतिसामन्ताना- इति । मधुरकं विषम् । परंतपं प्रतापवन्तम् । जारूध्यमिति जघानेति प्राक्तन्येव क्रियोत्तरत्र च । चूर्णो विषक्षोदः । मकरन्दः पुष्परसः । देवरः कनीयान्भ्राता भर्तुः । योगपरागोऽभिचारचूर्णम् । वैरन्ती नाम नगरी । रसदिग्धं विषोपलिप्तम् । अगदो विषहरद्रव्यसमूहः । वारुणी सुरा । उत्पन्न विपत्तियों के विषय में सुना ही है। जैसा कि सुप्रभा ने पुत्र को राज्य प्राप्त होने के लिए काशिराज महासेन को मध के साथ लावा में विष मिलाकर मार डाला। रत्नवती ने छल से कामवेग को उत्पन्न करके अयोध्या के प्रतापी राजा जारूध्य को छुरे की धार के समान चोखे दर्पण से मार डाला। देवर से फँसी हुई देवकी ने सुह्म के राजा देवसेन को कर्णोत्पल में मकरन्द के रूप में विष का चूर्ण मिलाकर मार डाला। वैरन्त के राजा रन्तिदेव को उसकी रानी ने सौत डाह के कारण अपने मणिनूपुर में जादू-टोना का चूर्ण मिलाकर प्रयोग करके समाप्त कर दिया । बिन्दुमती ने अपने केशपाश में छिपाए शस्त्र के द्वारा वृष्णि विदूरथ की हत्या की। सौवीर के राजा वीरसेन को रानी हंसवती ने मेखला की मणियों में विष का लेप करके मार डाला। पौरव राजा सोमक को उसकी रानी ने पहले अपने मुँह में विष के प्रभाव को हर लेने वाले औषध को मुँह में लगाकर फिर अपने मदिरा के जहरीले गण्डूष से मार डाला।' यह कहकर स्कन्दगुप्त स्वामी के आदेश का विधिवत् सम्पादन करने के लिए उठकर बाहर चला गया। इधर देव हर्ष ने भी राज्य की सारी स्थिति ठीक की। जब देव हर्ष ने उस प्रकार कृतप्रतिज्ञ होकर फिर दिग्विजय के लिए सैनिक प्रयाण करने की आज्ञा दी, तभी काल से घिरे शत्रु-सामन्तों के घरों में दुर्निमित्त होने लगे। यमराज के दूतों की दृष्टि की तरह

३४८ हर्षचरितम्

मुदवसितेषु बहुरूपाण्युपलिङ्गानि बितेनिरे । तथा ह्यविप्रकृष्टाः कालदूतदृ- ष्टय इवेतस्ततश्चेरुश्चटुलाः कृष्णशारश्रेणयः । प्रचलितलक्ष्मीनूपुरप्रणाद- प्रतिमा मधुसरघासंघातझंकारा जह्लादिरे । चिरं विवृतविकृतवदनविव- रविनिःसृतवह्नित्रिसरा वासरेऽपि विरसं विरेसुश्चिरमशिवार्यमशिवाः शिवाः । शवपिशितप्ररूढप्रसरा इव कपिपोतकपोलकपिलपक्षतयः कानन- कपोताः पेतुः । आमन्त्र्यमाणा इव दधुरकालकुसुमानि सममुपवनतरवः । तरलकरतलप्रहारप्रहतपयोधरा रुरुदुः प्रसभं सभाशालभञ्जिकाः । ददृशु- रासन्नकचग्रहभयोद्भ्रान्तोत्तमाङ्गभिवात्मानं कबन्धमात्रशोदर्येषु योधाः । चूडामणिषु चक्रशङ्खकमललक्ष्मणः प्रादुरभवन्पादन्यासा राजमहिषी- णाम् । चेटीचामराण्यकस्मादधावन्त पाणिपल्लवात् । प्रणयकलहेऽपि दत्तपृष्ठाश्चिरमभवन्भटाः पराङ्मुखा मानिनीनाम्, करिकपोलेषु व्यघ- टन्त मधुलिहां मधुमदिरापानगोष्ठ्यः । समाघ्रातयममहिषगन्धा इव ताम्यन्तः स्तम्बकरिमपि हरयो हरितं नवयवसं न चेरुः । चलवलयावली- वाचालबालिकातालिकातोद्यलालिता अपि न ननृतुर्मन्दा मन्दिरमयूराः । निशि निशि रजनिकरहरिणनिहितनयन इवोन्मुखस्तारमुपतोरणमकारण-

उदवसितेषु गृहेषु । उपलिङ्गान्यनिमित्तानि । सरघा मधुमक्षिकाः । कानन- कपोता गृध्राः । व्यघटन्त आसन् । स्तम्बकरिं बद्धस्तम्बम्, पक्वं वा । हरयो

काले-काले चंचल हिरन कुछ ही दूर पर इधर उधर मँडराने लगे । मधु मक्खियों चलती हुई लक्ष्मी के नूपुर की आवाज के समान भनभनाने लगीं। देर तक दिन में भी अमंगल सियारियों जिनके मुँह के फाड़ने से आग की चिनगारी निकलती रहती है, अशुभ और कटु आवाज में चिल्कारने लगीं। बन्दर के कपोल की तरह लाल पंखों वाले जंगली कबूतर मुर्दे के मांस की चाह से घरों पर बैठने लगे। उपवन के वृक्ष मानों परस्पर विचार करके असमय में पुष्प से भरने लगे। सभास्थान के खम्भों पर बनी हुई साल- भंजिकाएँ स्तनों पर हाथ पीट-पीटकर जोर से रोने लगीं। योद्धा लोग हर्ष के सैनिकों द्वारा निकट भविष्य में होने वाले कचग्रह के भय से सिर में उत्पन्न चक्कर के कारण दर्पण में अपना ही सिर धड़ से अलग होते हुए देखने लगे। राजमहिषियों की चूड़ामणि में हर्ष के शंख, चक्र और कमल के चिह्नों वाले पैर के निशान प्रकट होने लगे । चेटियों के हाथ से अकस्मात् चँवर छूट कर गिरने लगे। भट लोग प्रणय के कलह में भी मानिनियों के सामने पीठ दिखाकर देर तक पराङ्मुख हो गए। हाथियों के गण्डस्थल में भौरों का मदपान बन्द हो गया। घोड़ों ने मानों यमराज के महिष की गन्ध से हरे धान का खाना छोड़ दिया। झन-झन कंकण पहने हुए बालिकाओं के ताल देकर नाचने पर भी

षष्ठ उच्छ्वासः ३४६ मकार्णीत्कौलेयकगणः । गणयन्तीव गतायुषस्तर्जनतरलया तर्जन्या दिव- समाटवाटकेषु कोटवी । कुट्टिमेषु कुटिलहरिणखुरवेणीतरङ्गिण्यश्च शष्प- राजयोऽजायन्त । जनितवेणीबन्धामि निरञ्जनरोचनारोचींषि चषकमधुनि मुखकमलप्रतिबिम्बान्यदृश्यन्त भटीनाम् । समासन्नात्मापहारचकिता इव चकम्पिरे भूमयः । वध्यालंकाररक्तचन्दनरसच्छटा इवालक्ष्यन्त शूराणां पतिताः शरीरेषु विकसितबन्धूककुसुमशोणितशोचिषः शोणितवृष्टयः । पर्यग्नीकुर्वाणा इव विनश्वरीं श्रियमविरलस्फुरत्स्फुलिङ्गाङ्गारोद्गारदग्धतारा- गणा गणशः पतन्तः प्रज्वलन्तो न व्यरंसिषुरुल्कादण्डाः । प्रथममेव प्रति- हारीवापहरन्ती प्रतिभवनं चामरातपत्रव्यजनानि परुषा बभ्राम वात्येति । इति श्रीबाणभट्टकृतौ हर्षचरिते राजप्रतिज्ञावर्णनं नाम षष्ठ उच्छ्वासः । हयाः । अकार्णीद्ध्वान । कौलेयकाः श्वानः । आट बभ्राम । कोटवी नग्ना स्त्री । शष्पं बालतृणम् । बन्धूकं बन्धुजीवः । अपरिगताग्निं परिगताग्निं कुर्वाणाः । अग्नौ समन्तात्क्षिपन्तः । व्यरंसिपुर्निववृतिरे ॥ इति श्रीशंकरकविरचिते हर्षचरितसंकेते षष्ठ उच्छ्वासः । मन्दिरमयूरों ने नाचना छोड़ दिया। हर रात में मुंह उठाकर मानों चन्द्रमा के हिरन की ओर आँख लगाए कुत्ते तोरण के समीप बिना कारण ही जोर से रोने लगे। मार्गों में नंगी स्त्रो चंचल तर्जनी से मरने वालों की मानों गणना करती हुई चक्कर लगाती दिखाई पड़ी। राज भवन के कुट्टिमों में टेढ़े हरिण के खुर के समान तरङ्ग मरी घास लहराने लगी। योद्धाओं की स्त्रियों के मुख का जो प्रतिबिम्ब मधुपात्र में पड़ता था उसमें विधवाओं जैसी एक वेणी और अञ्जन से रहित गोगोचना के समान पीली आँखें दिखाई पड़ने लगीं। निकट में होने वाले अपने हरण से मानों चकित होकर भूमि काँपने लगी। वीरों के शरीर पर पड़े हुए खिले बन्धूकपुष्प के समान लाल खून के छींटे वधदण्ड प्राप्त होने पर लगाए गए चन्दन के समान दिखाई पड़ने लगे। दिशाओं में चारों ओर मानों नाशावस्था को प्राप्त श्री को घेर कर निरन्तर निकलती हुई चिनगारियों से तारों को जलाती हुई उल्काएँ बार-बार गिरने लगीं। भयंकर हवा प्रतीहारी के समान सबके चँवर, छत्र और व्यजन का अपहरण करती हुई प्रत्येक घर को झकझोरने लगी। हर्षचरित षष्ठ उच्छ्वास समाप्त।

सप्तम उच्छ्वासः अङ्गनवेदी वसुधा कुल्या जलधिः स्थली च पातालम् । वल्मीकश्च सुमेरुः कृतप्रतिज्ञस्य वीरस्य ॥१॥ धृतधनुषि बाहुशालिनि शैला न नमन्ति यत्तदाश्चर्यम् । रिपुसंज्ञकेषु गणना कैव वराकेषु काकेषु ॥२॥ अथ व्यतीतेषु च केषुचिद्दिवसेषु मौहूर्तिकमण्डलेन शतशः सुगणिते सुप्रशस्तेऽहनि दत्ते चतसृणामपि दिशां विजययोग्ये दण्डयात्रालग्ने, सलिलमोक्षविशारदैः शारदैरिवाम्भोधरैः कालधौतैः शातकौम्भैश्च कुम्भैः स्नात्वा विरचय्य परमया भक्त्या भगवतो नीललोहितस्यार्चामुदर्चिषं हुत्वा प्रदक्षिणावर्तशिखाकलापमाशुशुक्षणिं, दत्त्वा द्विजेभ्यो रत्नवन्ति अङ्गनेत्यादिनोद्योगितां सूचयति । शूरा हि स्वशौर्यमात्रेणावर्जितत्रिभुवनाधि- पत्याः, नतु तेषां सामग्र्यन्तरप्रयोजनम् । तथा चाह—‘कृतप्रयत्नस्य वीरस्य सर्वा भूरङ्गनवेदी’त्यनःयासेनाक्रमणादनेनेदमपि प्रतिज्ञितम् । कदाचित्कश्चिद्ब्रूयादभि- मानान्मोहाद्वेत्यं हर्षेण प्रतिज्ञातम् । अन्यथा गिरिगुहादौ पलायितं हर्षः कथं परिभवेत् । कथं च बहुपालितामुर्वीमेको जयेदिति । तन्न । यतोऽङ्गनवेदीत्यादि । नन्वेवमपि तत्तुल्यो वीरो न भवेदित्याह—धृतेत्यादि । अथत्यादौ । भवनान्निर्जगामेति संबन्धः । मौहूर्तिका गणकाः । दण्डश्चतुरङ्ग- बलम् । तस्य यात्रा गमनम् । तत्र लग्नो मेषादिस्तस्मिन् । विशारदैः प्रवीणैः, शुक्लैश्र्व । कालधौतैः, कालवशेन धौतैश्च । शातकौम्भैः सौवर्णैः । नीललोहितोऽसि- जब वीर पुरुष प्रतिज्ञा कर लेता है तब उसके सामने पृथिवी क्या है ? आँगन की एक वेदी है, समुद्र क्या है ? एक पनाला मात्र है, पाताल क्या है ? एक स्थली है और सुमेरु क्या है ? मिट्टी का ( कीटनिर्मित ) एक टीला मात्र है । बाहुवीर्यशाली वीर के धनुष उठा लेने पर पर्वत जो नहीं झुक जाते यही आश्चर्य होता है, अन्यथा शत्रु नामधारी वराक कौवों की गणना ही क्या ? कुछ दिन बीत गए । हर्ष के ज्योतिषियों ने बड़ी मेहनत से गणना करके शुभ मुहूर्त निकाला और चारों दिशाओं की विजय के लिए दण्डयात्रा के योग्य लगन दे दिया । तब हर्ष ने शरत्कालीन मेघों के समान जल बरसाने वाले चाँदी और सोने के कुम्भों से स्नान किया । भगवान् शंकर की परम भक्ति से पूजा की । दक्षिणावर्त शिखाओं की प्रज्वलित अग्नि में हवन किया । रत्न से भरे हजारों चाँदी और सोने से भरे हजारों

सप्तम उच्छ्वासः ३५१ राजतानि जातरूपमयानि च सहस्रशस्तिलपात्राणि कनकपत्रलतालंकृत- शफशृङ्गशिखरा गाश्चार्बुदशः, समुपविश्य विततव्याघ्रचर्मणि भद्रासने विलिप्य प्रथमविलिप्तायुधो निजयशोधवलेनाचरणनश्चन्दनेन शरीरं, परिधाय राजहंसमिथुनलक्ष्मणी सदृशे दुकूले, परमेश्वरचिह्नभूतां शशि- कलामिव कल्पयित्वा सितकुसुममुण्डमालिकां शिरसि नीत्वा, कर्णाभरण- मरकतमयूखमिव कर्णगोचरतां गोरोचनाच्छुरितमभिनवं दूर्वापल्लवं विन्यस्य सह शासनवलयेन गमनमङ्गलप्रतिसरं प्रकोष्ठे परिपूजितप्रहृष्ट- पुरोहितकरप्रकीर्यमाणशान्तिसलिलसीकरनिकराभ्युक्षितशिराः संप्रेष्य म- हार्हाणि वाहनानि बहलरत्नालोककलितककुम्भि च भूषणानि भूभुजां संवि- भज्य क्लिष्टकार्पटिककुलपुत्रकलोकमोचितैः प्रसाददानैश्च विमुच्य बन्ध- नानि सकलानि नियुज्य तत्कालस्मरणस्फुरणेन कथितात्मानमिव चाष्टा- तरङ्गः । आशुशुक्षणिमग्निम् । राजतानि रौप्यानि । जातरूपं सुवर्णम् । पत्रलता पत्रभङ्गः । शफाः खुराः । अर्बुदं दशकोटयः । नृपासनं भद्रासनम् । उक्तं च— 'नृपासनं भद्रासनं, सिंहासनं तु तद्धैम'मिति । परमेश्वरो राजा, हरश्च । शासन- वलयेन मुद्राकटकेन । प्रतिसरं कङ्कणम् । तिलपात्र और सोने के पत्तरों में मढ़े खुर और सींगों वाला असंख्य गायें ब्राह्मणों को दान में दिया । व्याघ्रचर्म पर भद्रासन बिछा कर विराजमान हुए । पहले अपने आयुध में यश के समान धवल चन्दन लगाया और फिर अपने सिर से पैर तक उसका लेप किया । फिर कोनों पर छपे हंसमिथुन वाले दुकूल वस्त्रों का जोड़ा धारण किया । शिव के चिह्न के रूप में चन्द्रकला के समान श्वेत फूलों की मुण्डमालिका को सिर पर रखा । कानों में मरकत के कर्णाभरण सदृश, गोरोचनों से युक्त सुन्दर दूब का पल्लव धारण किया । हाथ के प्रकोष्ठ में मंगलप्रद कंकण पहना और मुद्राकटक (राजकीय मुद्रा से युक्त कड़ा) भी धारण किया । पूजा पाये पुरोहित ने उनके सिर पर शान्ति का जल छिड़का । तब उन्होंने सहयोगी राजाओं को कीमती सवारियाँ भेजीं और दिशाओं में आलोक फैलाने वाले रत्नजटित आभूषण बाँटे । राज्य में कार्पटिक (सिर पर चीरा बाँधने के अधिकारी राजकीय कर्मचारी) राजघरानों के सम्बन्धी कुलपुत्र और साधारण जन जो बन्दी थे वे छोड़ दिए गए और जो किसी कारणवश दण्डित या कृपा से वंचित हो गए थे वे फिर से सम्राट् के प्रसादपात्र बनाए गए । उसी समय अपने दाहिने भुजस्तम्भ को जो फरक कर अपने स्वरूप को व्यक्त कर रहा था, अट्ठारह द्वीपों पर विजय पाने के योग्य अधिकार में नियुक्त किया । सेवकों के समान सुनिमित्त एक पर एक सामने

३५२ हर्षचरितम् दशद्वीपजेतव्याधिकारे दक्षिणं भुजस्तम्भमहमहमिकया सेबकैरिव सनि- मित्तैरपि समग्रैरग्रतो भवद्भिः प्रमुदितप्रजाजन्यमानजयशब्दकोलाहलो हिरण्यगर्भ इव ब्रह्माण्डात्कृतयुगकरणाय भवनान्निर्जगाम। नातिदूरे च नगरादुपसरस्वति निर्मिते महति तृणमये, समुत्तम्भि- ततुङ्गतोरणे, वेदीविनिहितपल्लवलालामहेमकलशे, बद्धवनमालादाम्नि, धवलध्वजमालिनी, भ्रमच्छुक्लवाससि, पठद्द्विजन्मनि मन्दिरे प्रस्थानम- करोत्। तत्रस्थस्य चास्य ग्रामाक्षपटलिकः सकलकरणिपरिकरः 'करोतु देवो दिवसग्रहणमद्यैवाबन्ध्यशासनः शासनानाम्' इत्यभिधाय वृषाङ्काम- भिनवघटितां हाटकमयीं मुद्रां समुपनिन्थे। जग्राह च तां राजा। समु- पस्थापिते च प्रथमत एव मृत्पिण्डे परिभ्रश्य करकमलादधोमुखी महीतले पपात मुद्रा। मन्दाश्यानपङ्कपडले मृदुमृदि सरस्वतीतीरे परिस्फुटं व्यरा- जन्त राजयो वर्णानाम्। अमङ्गलाशङ्किनि च विषीदति परिजने नरपति- ललामं चिह्नम्। 'ललामं पुच्छपुण्ड्राश्वभूषाप्राधान्यकेतुषु'। वनमाला पुष्प- पत्रप्रतियोजिता स्रक्। अक्षाणां भूतानां। पटले समूहे नियुक्तोऽक्षपटलिकः। ग्रामा- णामक्षपटलिकः ग्रामाक्षपटलिकः। करणिर्लेख्यम्। कायस्थ इत्यन्ये। मुद्रा वालिका। मन्दार्यानमीषच्छुष्कम्। आने लगे। प्रजा के लोग प्रसन्न होकर उनका जयजयकार करने लगे। सतयुग की स्थापना के लिए ब्राह्मण से निकले हुए ब्रह्मा के समान हर्ष राजभवन से बाहर आए। नगर से थोड़ी दूर सरस्वती के किनारे घास-फूस छाकर एक बड़ा राजमन्दिर तैयार किया गया था। उसमें ऊँचा तोरण खड़ा किया गया था। वेदी पर पल्लवसहित हेमकलश रखा हुआ था, वनमालाएँ लटकाई गई थीं, श्वेत ध्वजाएं फहराई गई थीं। श्वेत वस्त्रों से चेलोत्क्षेप हो रहा था और ब्राह्मण लोग मंगलपाठ कर रहे थे। ऐसे मन्दिर में हर्ष ने प्रस्थान किया। वहाँ उनके ग्रामाक्षपटलिक (गाँव का मुख्य अर्थ-अधिकारी, पटवारो) ने अपने समस्त लेखकों के साथ निवेदन किया—'देव आपका शासन अव्यर्थ है, अत एव आज ही शासनदान का आरम्भ करें।' यह कह कर उसने नई बनी हुई एक सोने की मुद्रा जिस पर बैल का चिह्न बना था, हर्ष के हाथ में दी। राजा ने जैसे मुद्रा हाथ में ले ली और पहले से सामने रखे हुए मिट्टी के पिण्डे पर उसे लगाना चाहा कि वह हाथ से छूट कर गिर गई और सरस्वती के किनारे की गीली मुलायम मिट्टी पर उसके अक्षर स्पष्ट छप गए। परिजन लोग अमंगल की आशंका से खिन्न होने लगे, तब हर्ष ने मन में यह कहा—'सीधे-सादे लोगों की बुद्धि तत्त्व को नहीं समझ पाती। 'यह पृथिवी आपके

सप्तम उच्छ्वासः ३५३ रकरोन्मनस्येतत्—'अतत्त्वदर्शिन्यो हि भवन्त्यविदग्धानां धियः । तथा हि-एकशासनमुद्राङ्का भूर्भवतो भविष्यतीति निवेदितमपि निमित्तेनान्यथा गृह्णन्ति ग्राम्याः ।' इत्यभिनन्द्य मनसा महानिमित्त तत्सीरसहस्रसंमित- सीम्नां ग्रामाणां शतमदाद्द्विजेभ्यः । निनाय च तत्र तं दिवसम् । प्रतिप- न्नायां शर्वर्यां समानितसर्वराजलोकः सुष्वाप । अथ गलति तृतीये यामे सुप्तसमस्तसत्त्वनिःशब्दे दिक्कुञ्जरजृम्भमाण- गम्भीरध्वनिरताड्यत प्रयाणपटहः । अग्रतः स्थित्वा च मुहूर्तमिव पुनः प्रयाणक्रोशसंख्यापकाः स्पष्टमष्टावदीयन्त प्रहाराः पटहे पटीयांसः । ततो रटत्पटहे, नन्दन्नान्दीके, गुञ्जत्गुञ्जे, कूजत्काहले, शब्दायमान- शङ्खे, क्रमोपचीयमानकटककलकले, परिजनोत्थापनव्यापृतव्यवहारिणि, द्रुतद्रुघणघातघट्यमानकोणिकाकीलकोलाहलकलितककुभि, बलाधिकृत- एकशासनमुद्रैवाङ्को यस्याः सा । सीरं हलम् । संमितं परिच्छिन्नम् । अष्टक्रोशा अद्य गन्तव्यमिति प्रायेण क्रोशसंख्यापकाः । तत इत्यादौ । एवंविधे प्रयाणसमये राजभिरापुपूरे राजद्वारमिति संबन्धः । नान्दी मङ्गलपटहः । गुञ्जासंज्ञः शङ्खभेदो यत्पृष्ठे जतु परिकलितं भवति । 'सन्ना' इति यस्य प्रसिद्धिः । शङ्खश्च मुण्डशङ्ख इति प्रसिद्धः । द्रुघणोऽयस्ताडनभाण्डम् । एक छत्र शासन की मुद्रा से अंकित होगी' इस प्रकार का निमित्त सूचित होने पर भी ये नासमझ कुछ और अर्थ लगा रहे हैं।' इस महानिमित्त का हर्ष ने मन में अभिनन्दन किया और सौ गाँव, जिनमें प्रत्येक का क्षेत्रफल एक सहस्र हल भूमि था, ब्राह्मणों को दान में दिए। वे दिन भर वहीं रहे। रात होने पर सब राजाओं के सम्मान के बाद शयन किया। जब रात का तीसरा याम समाप्त हो रहा था और सबके सो जाने से चारों ओर निसबद हो रहा था, तभी दिग्गज की जंभाई की तरह गम्भीर ध्वनि से कूच का नगाड़ा बजाया गया । कुछ ठहर कर आगे पहुँचे हुए सेना के ठहराव के लिए कोसों की सूचना देने वाले पुरुषों ने जोर-जोर से डंके की आठ चोटे मारीं। सैनिक प्रयाण के अवसर में नगाड़े बजने लगे। नान्दीक की आवाज होने लगी। गुंजा गूंजने लगा और काहल भी बजने लगे । शंखों के शब्द होने लगे । क्रम से पूरे कटक का शोरगुल बढ़ने लगा । झाडू देने वाले जमादार आकर नौकरों को जगाने लगे। मुंगरी की तड़ातड़ चोटों का (घड़ियाल पर उत्पन्न शब्द से) वृद्धि को प्राप्त होता हुआ नुकीले पतले डंडों से बजाए जाते हुए नक्कारों का शब्द दिशाओं में भर गया। सैनिक २३ ह० च०

३५४ हर्षचरितम् बध्यमानपाटीपतिपेटके, जनज्वलितोल्कासहस्रालोकलुप्यमानत्रियामात- मसि, यामचेटीचरणचलनोत्थाप्यमानकामिमिथुने, कटुककटुकनिर्देशन- श्यन्निद्रोन्मिषन्निषादिनि, प्रबुद्धहास्तिकशून्यीक्रियमाणशय्यागृहे, सुप्तोत्थि- ताश्वीयविधूयमानसटे, रटकटकमुखरखनित्रखन्यमानक्षोणीपाशे, समु- त्कील्यमानकीलशिञ्जानशिञ्जीरे, उपनीयमाननिगडतालकलरवोत्तालतुरङ्ग- तरङ्गयमाणखुरपुटे, लेशिकमुच्यमानमदस्यन्दिदन्तिसंदानशृङ्खलाखनख- ननिनादनिर्भरभरितदशदिशि, घासपूलकप्रहारप्रमृष्टपांसुलकरिपृष्ठप्रसार्य- माणप्रस्फोटितप्रमृष्टचर्मणि, गृहचिन्तकचेटकसंवेष्ट्यमानपटकूटिकाण्डप- कोणिकाः पटहकुट्यादिकेषु याः कीलिकाः । पाटी बहुपरिवारपुरुषगृहीतो निवास- भूभागः, कुलपुत्रकसमूह इत्यन्ये । पेटकं तत्समूहः, 'पाठीपति' इति पाठे पाटीपतयः प्रतिनियतस्वस्थानपरिच्छिन्नः । उल्का दीपिका । यामचेटी प्रहरजागरणनियुक्ता । तत्क्षणं चरणचलनं पादेषु स्पर्शः । कटुकानां हस्तिपकयोक्त्राणाम् । यः कटुको रूक्षः । निर्देश आज्ञा । निषादिनां हस्त्यारोहाणाम् । हास्तिकं हस्तिसमूहः । अश्वी- यमश्ववृन्दम् । क्षोणीपाशो भूम्या निवन्धनम् । समुत्कील्यमानान्युत्खन्यमानानि । शिञ्जीरं लौही शृङ्खला । निगडार्थं तालकं तालपत्रं निगडतालकम् । लौह एवाध- बन्धनविशेष इत्यन्ये । तरङ्ग्यमाणाः कुटिलीक्रियमाणाः । लेशिकाः घासिकाः । संदानशृङ्खला बन्धनाद्याः । प्रस्फोटितं विस्फारितम् । प्रमृष्टं शोधितम् । पटकुट्यादयः स्कन्धावारसरणिप्रभेदाः । तथा च पटैः कुटी सूक्ष्मगृहम् । काण्डपटकं काण्डैः संगठन करने वाले बलाधिकृतों ने पाटीपतियों (सेना के निरीक्षकों) को इकट्ठा किया। चारों ओर मशालें जल उठीं और अन्धकार दूर हो गया। चौथे पहर पर आने वाली चेटियाँ पहुँच गईं और उनके पैरों की आहट से साथ सोए हुए स्त्री-पुरुष उठ बैठे। हाथीवान् प्यादों की कड़ी डांट से उठ कर आँखें मलने लगे। जगे हुए हाथी शयनगृह के बाहर आ गए। घोड़े भी उठकर अयाल झाड़ने लगे। हाँफने की आवाज करते हुए प्यादे कुदालों से तम्बुओं के धरती में गड़े फाँसेदार भाँकुड़ों को खोदने लगे। कीलों के उखाड़ने से लोहे की सींकदें आवाज करने लगीं। घोड़ों के पैरों में पड़े हुए खटकेदार कड़े जब खोले जाने लगे तो इन्होंने अपने खुर टेढ़े कर दिए। जब मतवाले हाथियों के पैरों में पड़ी बन्धनशृङ्खलाओं को लेशिक (चारा देने वाले घसियारे) खोलने लगे तो खनखन का शोर चारों ओर भर गया। धूल से भरी हाथियों की पीठें घास के लम्बे मुट्ठों से झाड़कर साफ की गईं और उन पर कमाये हुए चमड़े की खालें डाल दी गईं। डेरों के बनने- उखाड़ने की चिन्ता रखने वाले (गृहचिन्तक) नौकर-चाकर तम्बू, बड़े डेरे, कनात और

सप्तम उच्छ्वासः ३५५ ऽमण्डपपरिवस्त्रावितानके, कीलकलापापूर्यमाणचिपिटचर्मपुटे, संभाण्डाय- मानभाण्डागारिणि, भाण्डागारवहनसंवाह्यमानबहुनालीवाहिके, निषादिनि- श्चलानेकानेकपारोप्यमाणकोशकलशपीडापीडसंकटायमानसामन्तौकसि, दूरगतदक्षदासेरकक्षिप्तप्रक्षिप्यमाणोपकरणसंभारभ्रियमाणदुष्टदन्तिनि, ति- र्यगानमज्जाघनिककरकृच्छ्राकृष्टलम्बमानपरतन्त्रतुन्दिलचुन्दीजनजनितज- नहासे, पीड्यमानशारशारिवरत्रागुणप्राहितगात्रविहारबृंहद्बृहद्बृहदुन्मदक- रिणि, करिघटाघटमानघण्टाटंकारक्रियमाणकर्णज्वरे, पृष्ठप्रतिष्ठाप्यमानक- ण्ठालककदर्शितकूजत्करभे, अभिजातराजबुत्रप्रेष्यमाणकुप्ययुक्त्याकुलकुली- नकुलपुत्रकलत्रवाहने, गमनवेलाविप्रलब्धवारणाधोरणान्विष्यमाणवसे- पटैश्च गृहम् । परिवस्त्रा तिरस्करिणी । वितानको रक्तकः । चिपिटो ह्रस्वः । चर्म- पुटश्चर्मप्रसेवकः । संभाण्डायमानो भाण्डानि समाचिन्वन् । 'भाण्डात्समात्र्यने' इति णिच् । संवाह्यमानाः प्राप्यमाणाः । नालीवाहिकः करिणां घासग्रहण- नियुक्तो हस्तिपको मेण्ठाख्यः । चुन्दी कुट्टनी । शारिमञ्जरी । हस्तिपर्याणमित्यर्थः । त्त्सत्थैः पीड्यमानदामभिग्र्राहितेन गात्रविहारेण देहकम्पेन बृंहन्तः शब्दायमानाः शामियाने लपेटने में लग गए और खूँटों को चपटे चमड़े के थैलों में भरने लगे । भण्डारी बर्तनों को बटोरने लगे । हथियों के घसियारे भण्डार ढोने के लिए बुलाए जाने लगं । हाथीवानों ने सीधे हाथियों को लाकर चुपचाप खड़ा कर दिया और उन पर सामन्तों के डेरों में भरा हुआ सामान, प्याले और कलशों की पेटियों के समूह लादने लगे । जो दुष्ट हाथी थे उन पर सझे हुए ऊँट काठ-कबाड़, खाट-पीढ़े आदि उपकरण-सम्भार दूर से फेंक कर लदवाने लगे । दूसरे लोग मुटल्ली दासियों को, जो चल नहीं पा रही थीं, टेढ़ा झुक कर जोर से घसीटते ले जा रहे थे, यह देख कर कुछ लोग हँस रहे थे । रंग-बिरंगी मोटी रस्सियों के कसे जाने के कारण जिनके झूमने में बाधा पड़ रही थी, ऐसे विशालकाय मन-मौजी हाथी चिग्घाड़ रहे थे । हाथियों के घण्टे की टंकार से कान फटने लगे । पीठ पर लादी जाती हुई कंडालों के कष्ट से ऊँट बलबला रहे थे । अभिजात राजपुत्रों के द्वारा भेजे गए पीतल जड़े वाहनों में कुलीन राजपुत्रों के द्वारा भेजे गए पीतल-जड़े वाहनों में कुलीन कुलपुत्रों की आकुल स्त्रियां जा रही थीं । चलते समय इधर-उधर भटके हुए नये सेवकों को हाथियों के आधोरण ढूँढ़ रहे थे । प्रसाद पाये हुए पैदल राजवल्लभ घोड़ों को पकड़ कर ले चल रहे थे । सजी-धजी १. इस वाक्य में श्री अग्रवाल जी के अनुसार 'कुप्रयुक्त' के स्थान पर 'कुप्ययुक्त'- पाठ स्वीकृत है । (ह० सां० १४२-१४३) ।

३५६ हर्षचरितम् वके, प्रसादवित्तपत्तिनीयमाननरपतिवल्लभवारवाजिनि, चारुचाटभटसैन्य- न्यस्यमाननासीरमण्डलाडम्बरस्थूलस्थासके, स्थानपालपर्याणलम्बमान- लवणकलायीकिङ्किणीनालीसनाथसंकलिततलसारके, कुण्डलीकृतावरक्षणी- जालजटिलवल्लभपालाश्वघटानिवेश्यमानशाखामृगे, परिवर्धकाकृष्यमाणा- र्धजग्धप्राभातिकयोग्याशनप्रारोहके, व्याक्रोशीविजृम्भमाणघासिकघोषे, गमनसंभ्रमभ्रष्टभ्रमदुत्तुण्डतरुणतुरङ्गतन्यमानानेकमन्दुराविमर्दे, सज्जी- करिणो यत्र तस्मिन् । प्रसादेन वित्ताः पत्तयः । वारोऽवसरः । 'निवहावसरौ वारः' इत्यमरसिंहः । तत्र वाजिनो ये सेवकानां प्रत्यवसरं विसृज्यन्ते । 'वर' इति पाठः । चारुचारभटसैन्येन त्रस्यमाना आत्मन एव क्रियमाणाः । नासीरेन कूर्परेण । मण्डलाडम्बरार्थाः स्थूलाः स्थासकाश्चन्द्रका यत्र । अन्ये नासीरमग्रेसरमाहुः । स्थानपालानां पर्याणेषु लम्बमाना लवणकलायी किङ्किणी । नालीसनाथा संकलिता तलसारिका यत्र । स्थानपाला अश्वपालाः । अश्वभाण्डागारिका इत्यन्ये । लवण- कलायी मृगाकृतिरश्वानां दाहमयी क्रियते । किङ्किण्यः सूक्ष्मघण्टाः । नाली प्रधानार्थं वेणवी नाडिरुच्यते । तलसारकोऽश्वमुखपट्टिकोर्णादिसूत्रमयी । उरः- पट्टिकेत्यन्ये । कुण्डलीकृतैरवरक्षणीजालैर्जटिला वल्लभपाला यासु तास्वश्वघटासु निवेश्यमानाः शाखामृगा यासु । अवरक्षण्यश्वबन्धनरज्जुः । वल्लभपालोऽश्वपालः । अन्ये तु यो बलवान् । महाकारो ह्योपकरणम् । यवससण्डुलादि वहति स वल्लभपालोऽश्वपाल इत्याहुः । शाखामृगो वानरः । रक्षार्थमश्वानां परिवर्धकोऽश्व- पालः । प्रौढिको योग्याशनार्थं प्रसेवको यो 'बुकण' इति प्रसिद्धः । व्याक्रोशी चाटभट सेना के हरावल दस्ते चौड़े छोपे हुए निशानों वाले वेष से सजे थे । स्थानपालों के घोड़ों की प्लानें लटकती हुई लवणकलायीं, किंकिणी और नाली से सुशोभित थीं एवं ज़ेरबंद (तलसारक) से बंधी हुई थीं । राजवल्लभ घोटों के परिचारक घोड़ों के बांधने की अवरक्षणी रस्सी लपेट कर लिए हुए थे और साथ में (घोड़ों को रोग और छूत से बचाने के लिए) बन्दर ले चल रहे थे । सवारों के घोड़े प्रभातकालीन भोजन अभी आधा ही समाप्त कर चुके थे कि परिचारकों ने उनके तोबड़े उतार लिये । घसियारे परस्पर चिल्ला- चिल्ला कर शोर मचा रहे थे । चलने की हड़बड़ी में छूट कर भागे हुए तरुण घोड़े मुँह उठाकर दौड़ मारने लगे जिससे घुड़साल में खलबली मच गई । हथिनियाँ इधर-उधर सवारी के लिए सजकर तैयार हो गईं तो परिचारकों के पुकारने पर जल्दी से सुन्दरियों १. 'चारभट' के स्थान पर चाटभट किया गया है (हर्ष० सां० १४२-१४३)