हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
३०८ हर्षचरितम् दिग्धरोपहतेव हरिणी मुह्यति मतिः, पुरुषद्वेषिणीव दूरत एव भ्रमति परिहरन्ती स्मृतिः, अम्बेव तातेनैव सह गता धृतिः, वार्धुषिकप्रयुक्तानीव धनानीव प्रतिदिवसं वर्धन्ते दुःखानि, शोकानलधूमसंभारसंभूताम्भोघर- भरितमिव वर्षति नयनवारिधाराविसरं शरीरम्। सर्वः पञ्चजनः पञ्चत्व- मुपगतः प्रयाति। वितथमेतद्वदति बालो लोकः। तातो हुताशनतामेव केवलामापन्नोऽपि नैवं दहति माम्। अन्तस्तदेवमिदमसांपरायिकमिव हृदयमवष्टभ्य व्युत्थितः शोको दुर्निवारो वाडव इव वारिराशिम्, पविरिव पर्वतम्, क्षय इव क्षपाकरम्, राहुरिव रविम्, दहति दारयति तनूकरोति कवलयति च माम्। कामं न शक्नोति मे हृदयं तादृशस्य सुमेरुकल्पस्य कल्पमहापुरुषस्य विनिपातमश्रुबिन्दुभिरेव केवलैरतिवाहयितुम्। राज्ये पदे शब्दे, क्रमे च। दिग्धो विप्रलिप्तः शरः। उक्तं च—‘बाणे विषाक्ते दिग्धलिसकौ’ इति। मेरुर्महीधरवद्रोपशब्दः प्रशंसार्थः। वृद्ध्या जीवति वार्धुषिकः वणिक्। वृद्वेर्वृधुषीभावः। पञ्चजनः पञ्चमहाभूतानि, मनुष्यश्च। उक्तं च—‘स्युः पुमांसः पञ्चजनाः पुरुषाः पूरुषा नराः’ इति। पञ्चत्वं मरणम्। वितथमिति। पञ्चसु पृथिव्या- दिषु लयात्पुरुषस्ताद्रूप्यं प्रतिपद्यत इत्यलीकम्। यतस्तत इत्याद्यग्रिमाञप्रतिबद्ध- कार्यदर्शनादित्यर्थः। आपत्कष्टम्। क्लेश इत्यर्थः। संपरायः सङ्ग्रामः। तस्मै यन्न भवति तदसांपरायिकम्। सभयं यः किल भीतः स कथं व्युत्थितं निवारयेत्। वाडव इत्यादयो दहतीत्यादिभिर्यथाक्रमं योज्याः। पविर्वज्रः। कल्पतेऽस्मादभीष्टार्थ हो रही है। मेरी स्मृति मुझे छोड़ कर दूर ही दूर चक्कर मार रही है मानो पुरुष से उसका द्वेष हो। अम्बा के समान मेरी धृति पिता के साथ ही चली गई। बनिया के धन के समान मेरे दुःख बढ़ते ही जा रहे हैं। शोक की अग्नि का धूमसम्भार मेघ के रूप में शरीर में भर गया है और आंखों से जलधारा बरस रही है। सारे महाभूत अपने-अपने भाग में मिलते जारहे हैं। यह बालप्रकृति के लोग मिथ्या बोलते हैं। तात केवल अग्नि में मिल कर ही मुझे नहीं जला रहे हैं। भीतर ही भीतर लड़ने में असमर्थ के समान मेरे हृदय को दबा कर उठा हुआ दुर्निवार शोक उस प्रकार जला रहा है जैसे वडवानल समुद्र को, उस प्रकार विदीर्ण कर रहा है जैसे वज्र पर्वत को, उस प्रकार कृश कर रहा है जैसे क्षय चन्द्रमा को, उस प्रकार निगल रहा है जैसे राहु सूर्य को। निश्चय ही सुमेरुसदृश उस प्रकार के युगपुरुष के विनाशजन्य शोक को मेरा हृदय केवल आँसू की बूँदों से कम नहीं कर सकता। चकोर के समान मेरी आँखें विष- तुल्य राज्य से विरक्त हो गईं। राज्यलक्ष्मी को उस प्रकार त्याग देने का मन करता है
षष्ठ उच्छ्वासः ३०६ विष इव चकोरस्य मे विरक्तं चक्षुः । बहुमृतपटावगुण्ठनां रङ्गितरङ्गां जनंगमानामिव वंशबाह्यामनार्या श्रियं त्यक्तुमभिलषति मे मनः । क्षणमपि दग्धगृहे शकुनिरिव न पारयामि स्थातुम् । सोऽहमिच्छामि मनसि वाससीव सुलग्नं स्नेहमलमिदममलैः शिखरिशिखरप्रस्रवणैः स्वच्छस्रो- तोम्बुभिः प्रक्षालयितुमाश्रमपदे । यतस्त्वमन्तरितयौवनसुखामनभिमता- मपि जरामिव पुरुराज्ञया गुरोर्गृहाण मे राज्यचिन्ताम् । त्यक्तसकलवाल- क्रीडेन हरियेव दीयतामुरो लक्ष्म्यै । परित्यक्तं मया शस्त्रम् ।' इत्यभिधाय च खङ्गग्राहिणो हस्तादादाय निजं निस्त्रिंशमुत्ससर्ज धरण्याम् । अथ तच्छ्रुत्वा निशितशिखेन शूलेनेवाहतः प्रविदीर्णहृदयो देवो इति कल्पः । चकोरः क्रकचः । तस्य विषे दृष्टे अक्षिणी विरज्येते । मृतस्य पटः । अवगुण्ठनं मस्तकाच्छादनम् । रङ्गः समाजः । जनंगमश्चण्डालः । उक्तं च— 'चण्डालप्लवमातङ्गदिवाकीर्तिजनंगमाः । निषादश्वपचान्तेवासिचण्डालपुक्कसाः ॥' इति । वंशोऽभिजननं प्रबन्धो वेणुश्च । बाह्या बहिर्भूता, वहनीया च । शकुनिर्गृह- चटिका । गृहशारिकेत्यन्ये । स्नेहः प्रेम, तैलादिश्च । यतस्त्वमिति । पुरा ययातिः शुक्रदुहितरं देवयानीमवमन्य देवयान्या दासीभूतां शर्मिष्ठामसकृन्मिथ्याकामयानेन शुक्रेण जरां यास्यसीति शप्तः, प्राप्तजरादुःखो विषयलम्पटोऽन्यपुत्रैरगृहीतां जरां पुरौ स्वपुत्रे कृताभ्युपगमे संक्रामयांबभूवेति वार्ता । जराप्यन्तरितयौवनसुखा- ऽनभिमता च । गुरोर्ययातेरपि । मामन्तरेण मां विना, मय्यसंनिहित इत्यर्थः । जैसे बहुत से मरे लोगों के रंग-बिरंगे कफन के घूंघट से सजाई हुई, लोगों का मन बहलाने वाली, बाँस के ऊपर लगी हुई टेसू को पुतली को डोम लोग फेंक देते हैं । इस जले हुए घर में पक्षी के समान मैं क्षण भर भी नहीं रह सकता । आश्रम में रह कर मैं मन के वस्त्र में लगे हुए स्नेह जैसे इस मल को पर्वतों के शिखर से प्रवाहित होते हुए निर्मल झरनों के जल से धो देना चहता हूं। जैसे पुरु ने पिता की आज्ञा से यौवनसुख से रहित और अप्रिय वार्धक्य को स्वीकार किया उसी प्रकार तुम मेरी राज्यचिन्ता ग्रहण कर लो । कृष्ण के समान सारी बालकीड़ाओं को अब छोड़ कर दाबने के लिए लक्ष्मी को अपनी जाँघ दो। मैने शस्त्र का अब परित्याग ही कर दिया ।' यह कह कर उन्होंने दाहिने हाथ से उठाकर अपनी तलवार जमीन पर रख दी । यह सुनते ही चोखे शूल से आहत हुए की तरह देवहर्ष का हृदय विदीर्ण हो गया । उनके मन में अनेक प्रकार के विचारों का तूफान उठ खड़ा हुआ—'क्या मेरी अनुपस्थिति में डाह के कारण देख न पाने वाले किसी खल ने आर्य से मेरे प्रति कुछ कह दिया, जिससे कुपित हों । या इस प्रकार मेरी परीक्षा ले रहे हैं । या तात के शोक से उत्पन्न
३१० हर्षचरितम् हर्षः समचिन्तयत्—'किं नु खलु मामन्तरेणार्यः केनचिदसहिष्णुना किंचिद्ग्राहितः कुपितः स्यात् । उतानया दिशा परीक्षितुकामो माम् । उत तातशोकजन्मा चेतसः समाक्षेपोऽयमस्य । आहोस्विदार्य एवायं न भवति, किं वार्येणान्यदेवाभिहितमन्यदेवाश्रावि मया शोकशून्येन श्रवणेन्द्रियेण । आर्यस्य चान्यद्विवक्षितमन्यदेवापतितं मुखेन । अथवा सकलवंशविनाशाय निपातनोपायोऽयं विधेः । मम वा निखिलपुण्यपरिक्ष- योपक्षेपः । कर्मणामनुकूलसमग्रग्रहचक्रवालविलसितं वा । अथवा तातविनाशनिःशङ्ककलिकालक्रीडितं येनायं यः कश्चिदिव यत्किंचनकारिणं मामपुष्यभूतिवंशसंभूतमिव, अताततनयमिव, अनात्मानुजमिव, अभक्त- मिव, अदृष्टदोषमपि श्रोत्रियमिव सुरापाने, सद्भूत्यमिव स्वामिद्रोहे, सज्जनमिव नीचोपसर्पणे, सुकलत्रमिव व्यभिचारे, अतिदुष्करे कर्मणि समादिष्टवान् । तदेतत्तावदनुरूपं यच्छौर्योन्मादमदिरोन्मत्तसमस्तसाम- न्तमण्डलसमुद्रमथनमंदरे तादृशि पितरि मृते तपोवनं वा गम्यते वल्कलानि वा गृह्यन्ते तपांसि वा सेव्यन्ते । या तु मयि राजाज्ञा सा श्रोत्रियो वेदपारगः । धन्वनि मरौ । धन्वन्यपि दग्धे राजाज्ञापि दाहकारिणी । यह इनके चित्त की व्याकुलता है । या आर्य यह नहीं हो सकते, क्या यही बात है कि आर्य ने कुछ दूसरा ही कहा और शोक के कारण शब्दग्रहण की क्षमता से रहित कर्णेन्द्रिय से रहित मैंने कुछ दूसरा ही सुना । आर्य ने कुछ दूसरी बात कहना चाहा और मुँह से कुछ दूसरी बात निकल गई । अथवा विधिने सारे वंश के विनाश के लिए ध्वंस का उपाय रचा है । या मेरे सारे पुण्यों के क्षीण हो जाने का यह प्रसंग है ? या प्रतिकूल होकर एकत्र हुए सारे ग्रहों के ये काम हैं । या तात के अब न रहने से कलिकाल निःशंक होकर क्रीड़ा कर रहा है जिससे किसी किसी के समान आर्य ने स्वेच्छा से आचरण करने वाले मुझे अत्यन्त दुष्कर कार्य करने के लिए उस प्रकार आदेश दिया है जैसे मैं पुष्यभूति के वंश में उत्पन्न ही नहीं, तात का पुत्र ही नहीं, अपना भाई ही नहीं, या सेवक ही नहीं । बिना किसी दोष के ही श्रोत्रिय के समान सुरापान में, सद्भूत्य के समान स्वामिद्रोह में, सज्जन के समान नीच के पास जाने में, कुलकलत्र के समान व्यभिचार में जैसे मुझे लगा दिया है । यह तो अच्छा ही है जो शौर्य के उन्माद की मदिरा से उन्मत्त समस्त सामन्तमण्डल का मंदर के समान मंथन करने वाले तात की मृत्यु के बाद तपोवन में रहा जाय, या वल्कल धारण किया जाय, या तपस्या की जाय ।
षष्ठ उच्छ्वासः ३११ दग्धेऽपि दाहकारिणी मय्यवप्रहग्लपिते धन्वनीवाङ्गारवृष्टिः । तदसद्दश- मिदमार्यस्य । यद्यपि च विभुरनभिमानः, द्विजातिरनेषणः, मुनिररोषणः, कपिरचपलः कविरमत्सरः, वणिगतस्करः, प्रियजानिरकुहनः, साधुर- दरिद्रः, द्रविणवानखलः, कीनाशोऽनक्षितगतः, मृगयुरहिंस्रः, पाराशरी ब्राह्मण्यः, सेवकः सुखी, कितवः कृतज्ञः, परिव्राडबुभुक्षुः, नृशंसः प्रिय- वाक्, अमात्यः सत्यवादी, राजसूनुरदुर्विनीतश्च जगति दुर्लभः, तथापि ममार्य एवाचार्यः । को हि नाम तद्विधे निपतिते राजगन्धकुञ्जरे जनयि- तरि चेदृशे विफलीकृतविशालशिलास्तम्भोरुभुजे भूपुजि भ्रातरि त्यक्त- राज्ये ज्यायसि नववयसि तपोवनं गच्छति सकललोकलोचनजलपाता- पवित्रं मृद्रोलकं वसुधाभिधानं धनमदखेलनिखिलखलमुखविकारलक्षणा- ख्यायमाननीचाचरणां श्रीसंज्ञिकां सुभटकुटुम्बकर्मकुम्भदासीं चण्डालोऽपि अनेषणो निरभिलाषः । प्रिया जाया यस्य । 'जायाया निङ्' । कुहना ईर्ष्या, शङ्का वा । कीनाशः क्षुद्रः । उक्तं च—'कृतान्ते पुंसि कीनाशः क्षुद्रकार्षिकयोस्त्रिषु' । अ- नक्षितगतः प्रियः । मृगयुर्व्याधः । पाराशरी भिक्षुः । कितवो द्यूतकृत् । गोप्यो दासः । जो राज्य करने की मुझ पर आज्ञा है वह अनावृष्टिसे सूखा पड़े हुए मरु के समान स्वयं दग्ध और विघ्नों से क्षीण मुझ पर दाह करने वाली अङ्गार की वर्षा है। तो यह कथन आर्य के सदृश न था। यद्यपि जिसमें अभिमान न हो ऐसा अधिकारी, जिसमें एषणा न हो ऐसा द्विजाति, जिसमें रोष न हो ऐसा मुनि, जिसमें चपलता न हो ऐसा कपि, जिसमें मत्सर न हो ऐसा कवि, जो बेईमानी न करे ऐसा वणिक्, जो छलिया न हो ऐसा प्रिय, जो दरिद्र न हो ऐसा सज्जन, जो खल न हो ऐसा धनी, जो द्वेष न करता हो ऐसा क्षुद्र, जो हिंसा न करता हो ऐसा शिकारी, जो ब्राह्मणद्वेषी न हो ऐसा पाराशरी भिक्षु, जो सेवक हो ऐसा सुखी, जो धूर्त हो ऐसा कृतज्ञ, जो भीख मांगता न हो ऐसा परिव्राट्, जो प्रिय बोलता हो ऐसा क्रूर, जो सत्यवादी हो ऐसा कूटनीतिज्ञ मंत्री, और जो दुर्विनीत न हो ऐसा राजपुत्र संसार में दुर्लभ है। मेरे उपदेशक आचार्य तो आर्य ही हैं। कौन ऐसा है जो उन गन्धहस्ती के समान महाराज पिता श्री के चले जाने पर और शिलास्तम्भ के समान विशाल भुज को विफल करके राज्य छोड़ कर बड़े भाई के तपोवन चले जाते समय लोगों के आँसू से अपवित्र पृथिवी नामक मिट्टी के गोले को एवं धनमद की क्रीड़ा में निखिल दुष्टजनों के मुख को विकृत कर देने से विख्यात नीच आचरण वाली लक्ष्मीसंज्ञक सुभटों के काम करने वाली कुम्भदासी (पनभरिन) की चाण्डाल होकर
कामयेत । कथमिव संभावितमत्यन्तमनुचितमिदमार्येण । किमुपलक्षित- मनवदातमिदं मयि । किं वास्य चेतसश्च्युतः सौमित्रिर्विस्मृता वा वृकोदरप्रभृतयः । अनपेक्षितभक्तजना स्वार्थैकनिष्पादननिष्ठा नासीदि- यमार्यस्येदृशी प्रभाविष्णुता । अपि चार्ये तपोवनं गते जिजीविषुः को मनसापि महीं ध्यायेत् । कुलिशशिखरखरनखरप्रचयप्रचण्डचपेटापाटित- मत्तमातङ्गोत्तमाङ्गमदच्छटाच्छुरितचारुकेसरभारभास्वरमुखे केसरिणि वनविहाराय विनिर्गते निवासं गिरिगुहां कः पाति पृष्ठतः । प्रतापसहाया हि सत्त्ववन्तः । कश्चपलां राजलक्ष्मीं प्रत्यनुरोधोऽयमार्यस्य यदियमपि न चीवरान्तरितकुचा कुशकुसुमसमित्पलाशपूलिकां वहन्ती तत्रैव तपोवने वनमृगीव नीयते जराजालिनी । किंवा ममानेन वृथा बहुधा विकल्पितेन तूष्णीमेवार्यमनुगमिष्यामि । गुरुवचनातिक्रमकृतं च किल्विषमेतत्तपोवने तप एवापास्यति ।' इत्यवधार्य मनसा प्रथमतनं गतस्तपोवनमधोमुख- स्तूष्णीमवातिष्ठत् । राजसूनुर्दुर्विनीतश्चेत्येतत्प्रस्तावेन तदुक्तम् । खेलाः सविलासाः । अनवदातं निर्म- लम् । सौमित्रिर्लक्ष्मणः । वृकोदरो भीमसेनः । प्रचयः समूहः । चपेटा करतला- घातः । वनमृग्यपि कुशादि वहति । जालिनी मायिनी । कामना करे ? कैसे इस अत्यन्त अनुचित विचार को आर्य ने स्वीकार कर लिया ? क्या उनके मन में लक्ष्मण नहीं रहे, या भीम आदि छोटे भाई विस्मृत हो गए ? अपने भक्तजनों की परवाह न करने वाली, अपने ही स्वार्थ के निष्पादन करने में निष्ठुर आर्य की यह प्रभुता पहले न थी । अगर आर्य तपोवन में चले जाते हैं तब जीने की इच्छा रखने वाला कौन मन से भी पृथिवी की चिन्ता रखे ! वज्र के समान अपने नखों के प्रचण्ड चाँटे से मतवाले हाथी के मस्तक को विदीर्ण कर देने से उत्पन्न मदधारा से भींग हुए केसर के कारण भास्वर मुख वाले सिंह के वन-विहार के लिए निकल जाने पर पीछे कौन उसके निवासस्थान कन्दरा की रक्षा करे ? महानुभाव लोग प्रताप की सहायता लेते हैं । चंचल स्वभाव वाली राजलक्ष्मी के प्रति आर्य का कैसा यह आग्रह है कि चीवर से ढंके स्तनों वाली और कुश, कुसुम, समिधा एवं पलाश की पूली ढोने वाली वन- मृगी के समान अति जर्जर इसे वहीं तपोवन में साथ नहीं ले जाते ? इस तरह के मेरे बहुत संकल्प-विकल्प से क्या मतलब ? मैं तो चुपचाप आर्य के पीछे चल दूँगा । गुरु- वचनों के पालन न करने से उत्पन्न पाप को तपोवन में तप ही दूर करेगा ।' ऐसा निश्चय करके मन से तपोवन में पहले ही पहुँचे हुए हर्ष मुँह नीचा किए चुपचाप बैठे रहे ।
षष्ठ उच्छ्वासः ३१३ अत्रान्तरे पूर्वादिष्टेनेव रुदता वस्त्रकर्मान्तिकेन समुपस्थापितेषु वल्क- लेषु, निर्दयकरतलताडनभियेव कापि गते हृदये, रटति राजस्त्रैणे, तारम- ब्रह्मह्ययमूर्ध्वदोषिण विरुदति विप्रजने, पादप्रणतिपरे फूत्कुर्वति पौरवृन्दे, विद्राति विद्रुतचेतसि चिरंतने परिजने, परिजनाव लम्बिते, गते वर्षीयसि, वेपमानवपुषि, पर्याकुलवाससि, शोकगद्गदवचसि, विगलितनयनपयसि, निवारणोद्यतमनसि, विशति बन्धुवर्गे, निराशेषु नखलिखितमणिकुट्टि- मेष्ववाङ्मुखेषु निःश्वसत्सु सामन्तेषु, सबालवृद्धासु तपोवनाय प्रस्थितासु सर्वासु प्रजासु सहसैव प्रविश्य शोकविक्लवः प्रक्षरन्नयनसलिलो राज्यश्रियः परिचारकः संवादको नाम प्रज्ञाततमो विमुक्ताक्रन्दः सदस्या- त्मानमपातयत् । अथ संभ्रान्तो भ्रात्रा सह स्वयं देवो राज्यवर्धनस्तं पर्यपृच्छत्—'भद्र ! भण भग किमस्मद्व्यसनव्यवसायवर्धनबद्धधृतिः, अवनिपतिमरणमुदित- अत्रेत्यादौ । संवादको नाम सदस्यात्मानमपातयदि ति संबन्धः । कर्मान्तिको- ऽधिकृतः । करतलताडनेति । करतलताडनं हृदये वा । स्त्रैणे स्त्रीसमूहे । 'अब्रह्मण्यम- वध्योक्तौ ।' फूत्करणमुद्दामरोदध्वनिः । विद्रातिः कुत्सितः । गते प्राप्ते । वर्षीयसि वृद्धतरे । इसी बीच पहले ही संहजे हुए वस्त्रकर्मान्तिक ( सरकारी तोशेखाने का अधिकारी ) ने रोते हुए वल्कल हाजिर किया । हृदय मानों हाथों के निर्दय ताड़न के डर से कहीं चला गया । महल की स्त्रियाँ चिल्लाने लगीं । ब्राह्मण लोग हाथ उठा कर जोर से 'हमारा त्याग न करो' इस प्रकार पुकारने लगे । नागरिक लोग पैर पर बार-बार गिर-गिर कर घिघियाने लगे । पुराने सेवक विचलित मन से दौड़ पड़े । बड़े-बूढ़े बाँधव लोगों ने भीतर प्रवेश किया, उन्हें परिजनों ने सम्हाल रखा था, उनके शरीर कांप रहे थे, वस्त्र भी इधर-उधर गिर रहा था, शोक से उनकी वाणी गद्गद थी, नेत्रों से आँसू ढल रहे थे, राज्य- वर्धन को रोकने के लिए उनके मन में व्यग्रता थी । सामन्त लोग निराश होकर मुँह नीचा किए नख से मणिकुट्टिम पर कुछ लिख रहे थे और आह भर रहे थे । लड़के से बूढ़े तक सारी प्रजा तपोवन में जाने के लिए प्रस्थान करने लगी । उसी समय सहसा शोक से व्याकुल, नेत्र से आँसू ढालता हुआ राज्यश्री का संवादक नाम का अत्यन्त परिचित परिचारक रोता-पीटता सभा में आकर गिर पड़ा । तब भाई के साथ घबड़ा कर देव राज्यवर्धन ने उससे पूछा—'हमारे दुःख के व्यापार को बढ़ाने में निश्चल धैर्यवाला, राजा की मृत्यु से प्रसन्न विधि अधीर बना देने वाला
३१४ हर्षचरितम् मतिः, अद्युतिकरमपरमधिकतरमितो दुःखातिशयं समुपनेति विधिः' इति । स कथं कथमप्यकथयत्—'देव ! पिशाचानामिव नीचात्मनां चरितानि छिद्रप्रहारीणि प्रायशो भवन्ति । यतो यस्मिन्नहन्यवनिपति- रुपरत इत्यभूद्वार्त्ता तस्मिन्नेव देवो ग्रहवर्मा दुरात्मना मालवराजेन जीव- लोकमात्मनः सुकृतेन सह त्याजितः । भर्तृदारिकापि राज्यश्रीः कालायस- निगडयुगलचुम्बितचरणा चोराङ्गनेव संयता कान्यकुब्जे कारायां निक्षिप्ता । किंवदन्ती च यथा किलाऽनायकं साधनं मत्वा जिघृक्षुः सुदुर्मतिरेतामपि भुवमाजिगमिषति । इति विज्ञापिते' प्रभुः प्रभवतीति । ततश्च तादृशमनुपेक्षणीयमसंभावितमाकस्मिकमुपरि व्यतिकरमाकर्ण्या- श्रुतपूर्वत्वात्परिभवस्य, परपरिभवासहिष्णुत्या च स्वभावस्य, दर्पबहुलत- या च नवयौवनस्य, वीरक्षेत्रसंभवाच्च जन्मनः, कृपाभूमिभूतायाश्च स्वसुः स्नेहात्स तादृशोऽपि बद्धमूलोऽप्यत्यन्तगुरुनेकपद एवास्य ननाश शोकावेगः । विवेश च सहसा केसरीव गिरिगुहागृहं गभीरहृदयं भयंकरः कोपावेगः । केशिनिषूदनशङ्काकुलकालियकुलभङ्गुरभ्रूभङ्गत रङ्गिणी श्यामायमाना यम- कारायां बन्धने । किंवदन्ती लोकवार्ता । केशिनिषूदनः कृष्णः । यमस्वसा यमुना । सापि कालियाकुला सतरङ्गा, इससे बढ़ कर भी क्या दुःखातिशय उपस्थित कर रहा है ?' उसने किसी प्रकार कहा— 'देव, नीच आत्मा वाले व्यक्ति पिशाचों की तरह छिद्र देख कर प्रहार करते हैं। इसी कारण जिस दिन 'महाराज शान्त हुए' यह समाचार फैला उसी दिन दुरात्मा मालवराज ने देव गृहवर्मा को अपने पुण्य के साथ जीवलोक से हटा दिया। भर्तृदारिका राज्यश्री को भी लोहे की बेड़ियों में जकड़ कर चोर स्त्री के समान कान्यकुब्ज के कारावास में डाल दिया है। यह खबर उड़ रही है कि सेना को नायकहीन जानकर वह दुर्बुद्धि आक्रमण करने के लिए इस ओर भी आना चाहता है। मेरे इस निवेदन में अब आप ही समर्थ हैं।' तब उस प्रकार के अपने ऊपर उपेक्षा न करने योग्य, जिसकी कोई सम्भावना न थी ऐसे आकस्मिक व्यसन को सुन कर अपना परिभव पहले पहल सुनने के कारण, दूसरे द्वारा किया गया अपना परिभव न सहन करने वाले स्वभाव के कारण, कृपा के पात्र बहन के स्नेह से राज्यवर्धन का बद्धमूल भी अत्यन्त गुरुभूत उस प्रकार का शोकावेग एक ही क्षण में नष्ट हो गया। जैसे सिंह पर्वत की कन्दरा में प्रवेश करता है उसी प्रकार उनके हृदय में भयंकर कोप का आवेग प्रविष्ट हुआ। कृष्ण के भय से व्याकुल कालियनाग
षष्ठ उच्छ्वासः ३१५
स्वस्रेव प्रथीयसी ललाटपट्टे भीषणा भ्रुकुटिरुदभिद्यत । दर्पात्परामृशन्नख- किरणसलिलनिर्झरैः समरभारसंभावनामभिषेकमिव चकार दिक्नागकुम्भ- कूटविकटस्य बाहुशिखरकोशस्य वामः पाणिरुल्लवः । संगलत्स्वेदसलिल- पूरितोदरो निर्मूलं मालवोन्मूलनाय गृहीतकेश इव दुर्मदश्रीकचग्रहोत्क- ण्ठयेव च कम्पमानः पुनरपि समुत्ससर्प भीषणं कृपाणं पाणिरपरः शस्र- ग्रहणमुदितराजलक्ष्मीक्रियमाणदिष्टवृद्धिविधुतसिन्दूरधूलिरिव कपिलः कपो- लयोरदृश्यत रोषरागः । समाासन्नसकलमहीपालचूडामणिचक्राक्रमणजाता- हंकार इव च समारुरोह वाममूरुदण्डमुत्तानितश्चरणो दक्षिणः । निष्ठुरा-
श्यामायमाना च । परामृशन्नित्यर्थाद्बाहुशिखरमेव । कोशो दिव्यम् । उक्तं च— 'कोशोऽस्त्री कुड्मले खङ्गपिधानेऽर्थौघदिव्ययोः' इति कोशकारः । पाणिः सलिलपू- रितोदरो भवति । कचाः केशाः । यश्च कामी कामिनीकचग्रहणं प्रत्युत्कण्ठते स
के रूप में भङ्गुर अभ्रङ्ग रूपी तरङ्गों वाली श्यामवर्ण यमुना नदी के समान भीषण भ्रुकुटि उद्भिन्न हो गई । उनका बायाँ पाणिपल्लव दिग्गज के कुम्भ कूट के समान विकट स्कन्ध- देश के खड्ग कोश का स्पर्श करता हुआ युद्धभार के ग्रहण से पूर्व नखकिरणों की जल- धार से मानों अभिषेक करने लगा¹ । उसका दाहिना हाथ पसीने से भर गया और मालव के निर्मूल विनाश के लिए मानों दुर्मद श्री के बालों को पकड़ने की उत्कंठा से काँपता हुआ भीषण कृपाण की ओर बार-बार बढ़ने लगा । उनके कपोलों पर कपिल वर्ण का रोषराग इस प्रकार दिखाई पड़ने लगा मानों उसके शस्त्रग्रहण से प्रसन्न राज्यलक्ष्मी अपनी भाग्यवृद्धि मान कर सिन्दूर की धूल उड़ाने लगी हो । उसका दाहिना चरण पास में बैठे हुए समस्त राजाओं की चूड़ामणियों पर प्रतिबिम्ब के रूप में आक्रमण करने से
१. श्री अग्रवाल जी ने इस कूटश्लेष के तीन अर्थ किए हैं—(१) म्यान के पक्ष में- राज्यवर्धन का बायाँ हाथ दाहिनी ओर कमर में खोंसी हुई भुजाली की मूठ पर गया जो गजमस्तक के अलंकरण से सुशोभित थी । यों उस हाथ की नखकिरणों ने युद्ध का बोझा उठाने में समर्थ उस म्यानबंद भुजाली का मानों जलधाराओं से सम्मानपूर्ण अभिषेक किया । (२) दिव्यपरीक्षा के पक्ष में—गजमस्तक की तरह विकट मुट्ठा बँधा हुआ बायाँ हाथ दिव्यपरीक्षा के समय दाहिना मुट्ठा को अपनी नखकिरणों से मानों मरणपर्यन्त दंड की सम्भावना का अभिषेक करा रहा था । (३) अभिधर्मकोशग्रन्थ के पक्ष में—दिक्नाग के मस्तक की कूटकल्पनाओं से विकट बना हुआ जो वसुबन्धु का अभिधर्मकोश ग्रन्थ का भावनामय (विचारों के द्वारा) ऐसा ज्ञान कराता था जिससे शास्त्रार्थरूपी युद्धों के मचने से रसहीनता आ जाती थी । (पृ. १२१-१२३ हर्ष. सां. अ.)
३१६ हर्षचरितम् क्षुब्धकर्षणनिष्ठ्यूतधूमलेखो निर्वीरोर्वीकरणाय विमुक्तशिख इव लिलेख मणिकुट्टिममितरः पादपद्मः । दर्पस्फुटितसरसव्रणोच्छलितरुधिरच्छटाव- सेकैः शोकविषप्रसुप्तं प्रबोधयन्निव पराक्रममनुजमवादीत्—'आयुष्मन् ! इदं राजकुलम्, अमी बान्धवाः, परिजनोऽयम्, इयं भूमिः, भूपतिभुज- परिघपालिताश्चैताः प्रजाः, गतोऽहमद्यैव मालवराजकुलप्रलयाय । इदमेव तावद्वल्कलग्रहणमिदमेव तपः शोकापगमोपायश्चायमेव यदत्यन्ताविनीता- रिनिग्रहः । सोऽयं कुरङ्गकैः कचग्रहः केसरिणः, भेकैः करपातः कालस- र्पस्य, वत्सकैर्बन्दिग्रहो व्याघ्रस्य, अलगर्देर्गलग्रहो गरुडस्य, दारुभिर्दाहा- देशो दहनस्य, तिमिरैस्तिरस्कारो रवेः, यो मौरवराणां मालवैः परिभवः पुष्यभूतिवंशस्य । अन्तरितस्तापो मे महीयसा मन्युना । तिष्ठन्तु सर्वे एव राजानः करिणश्च त्वयैव सार्धम् । अयमेको भण्डिरयुतमात्रेण तुरङ्ग- माणामनुयातु माम् ।' इत्यभिधाय चानन्तरमेव प्रयाणपटहमादिदेश । कम्पते स्वेदवांश्च भवति । दिष्टमानन्दः । विमुक्तेति । धीराः किल रोषेण केशसंयम- नमाऽरातिपरिभवप्रतीकारं न कुर्वंते । भेको मण्डूकः । करपातश्चपेटादानम् । अलगर्दैर्जलसर्पैः । मानों उत्पन्न अहंकार के कारण बायें ऊरुदण्ड पर उत्तान होकर चढ़ गया । बायें पैर के अंगूठे को कस के दबा कर रगड़ने से मानों पृथिवी को वीरविहीन करने के लिए धूम- शिखा उत्पन्न करता हुआ मणिकुट्टिम को कुरेदने लगा । शोक के कारण विष से मूर्च्छित होकर पड़े हुए अपने पराक्रम को मानों दर्प के स्फोट से उत्पन्न उछाल मारते हुए रुधिर के छींटे डाल कर जगाते हुए छोटे भाई हर्ष से बोल उठे—'आयुष्मन्, यह राजकुल है, ये भाई-बन्धु हैं, ये परिजन हैं, यह पृथिवी है, महाराज के भुजदण्ड से पालित ये प्रजाएँ हैं, इन्हें सम्हालो, अब मैं मालवराज के वंश का नाश करने के लिए आज ही चला । मेरे लिए यही वल्कल का धारण और यही तप है और यही शोक को दूर करने का उपाय भी है कि अत्यन्त अविनीत इस शत्रु का दमन करूँ । हिरन शेर की मूंछ मरोड़ना चाहता है, मेढ़क काले सांप को तमाचा लगाना चाहता है, बछड़ा बाघ को बंदी बनाना चाहता है, डोडबा सांप गरुड़ की गर्दन टीपना चाहता है, ईंधन स्वयं अग्नि को जलाना चाहता है, अन्धकार सूर्य का तिरस्कार करना चाहता है—यह जो मालवों ने पुष्यभूति- वंश का अपमान किया है । इस महान् क्रोध के कारण अब मेरा ताप मिट गया है । समस्त राजगण और हाथी तुम्हारे साथ ही रहें । अकेला यह भंडी दश हजार घोड़ों
षष्ठ उच्छ्वासः ३१७ तं च तथा समादिशन्तमाकर्ण्य जामिजामातृवृत्तान्तविज्ञानप्रकोपा- धानदूयमाने मनसि निर्वर्तनादेशेन दूरप्ररूढप्रणयपीड इव प्रोवाच देवो हर्षः—‘कमिव हि दोषं पश्यत्यार्यो ममानुगमनेन ? यदि बाल इति नितरां तर्हि न परित्याज्योऽस्मि । रक्षणीय इति भवद्भुजपञ्जरो रक्षास्था- नम्, अशक्त इति क परीक्षितोऽस्मि, संवर्धनोय इति वियोगस्तनूकरोति, अक्लेशसह इति स्त्रीपक्षे निक्षिप्तोऽस्मि, सुखमनुभवत्विति त्वयैव सह तत्प्रयाति, महानध्वनः क्लेश इति विरहाग्निरविषह्यतरः, कलत्रं रक्षत्विति श्रीस्ते निस्त्रिंशेऽधिवसति, पृष्ठतः शून्यमिति तिष्ठत्येव प्रतापः, राजकमन- धिप्रितमिति तत्सुबद्धमार्यगुणैः, न बाह्यः सहायो महत इति व्यतिरिक्त- मेव मां गणयति, प्रलघुपारकरः प्रयामीति पादरजसि कोऽतिभारः, द्वयो- र्गमनमसांप्रतमिति मामनुगृहाण गमनाज्ञया, कातरो भ्रातृस्नेह इति जामिर्भगिनी । न बाह्य इति । किल य एव त्वं स एवाहमिति । कोऽसौ सहायो- ऽस्य । आत्मंभरिता स्वार्थमात्रपरता । की सेना लेकर मेरे साथ चलेगा।' यह कह कर उन्होंने तुरत ही कूच का डंका बजाने का हुक्म दिया । इस प्रकार राज्यवर्धन के आदेश को सुन कर बहन और बहनोई के वृत्तान्त से प्रचण्ड प्रकोप द्वारा आविष्ट, अपने रुक जाने के आदेश से बढ़ी हुई प्रणय की पीड़ा से मानो युक्त देव हर्ष ने कहा—'मेरे अनुगमन से आर्य कौन-सा दोष देखते हैं ? यदि मैं नाबालिग हूँ तो मैं परित्याग के योग्य नहीं । यदि रक्षणीय हूँ तो आर्य का भुजपंजर ही मेरी रक्षा का स्थान है । यदि मुझे असमर्थ कहें तो आर्य ने मेरी कहाँ परीक्षा ली ? संवर्धन के योग्य हूँ तो आपका वियोग मुझे क्षीण कर डालता है। क्लेश को सह नहीं पाता हूँ तो यह कह कर मुझे स्त्रियों की श्रेणी में रख रहे हैं। 'सुख से रहो' यह यदि आपकी आज्ञा है तो मेरा सुख आप ही के साथ जाने के लिए तत्पर है । 'मार्ग का कष्ट महान् है' यह कहें तो आपके विरह की अग्नि ही मेरे लिए असह्य है । 'स्त्रियों की रक्षा करो' यह कहें तो आपके ही खड्ग् में वह श्री निवास करती है जिससे उनकी रक्षा हो । 'पीछे कुछ नहीं' यह कहें तो आप का प्रताप पीछे-पीछे है ही । 'राजसमूह नायकहीन है' यह कहें तो आर्य के गुणों से ही वह अपने अधीन बना रहेगा । 'वीरों का सहायक कोई बाहरी नहीं होता' यदि यह कहें तो आप मुझे अलग समझ रहे हैं। 'कुछ थोड़े से ही लोगों को साथ लेकर जा रहा हूँ' अगर यह बात है तो पैर की धूल का क्या बोझ है ? 'दो भाइयों का साथ जाना ठीक नहीं' तो मुझे ही जाने की आज्ञा देकर अनुगृहीत करें । 'भाई
३१८ हर्षचरितम् सहशो दोषः । का चेयमात्मंभरिता भुजस्य ते यदेकाकी क्षीरोदफेनपट- लपाण्डुरममृतमिव यशः पिपासति । अवञ्चितपूर्वोऽस्मि प्रसादेषु । तत्प्रसीदत्वार्यो नयतु मामपि' इत्यभिधाय क्षितितलविनिहितमौलिः पादयोरपतत् । तमुत्थाप्य पुनरग्रजो जगाद—'तात ! किमेवमतिमहारम्भपरिग्रहेण गरिमाणमारोप्यते बलादतिलघीयानप्यहितः । हरिणार्थमतिहेपणः सिंह- संभारः । तृणानामुपरि कति कवचयन्त्याशुशुक्षणयः । अपि च तवाष्टा- दशद्वीपराष्ट्रमङ्गलकमालिनी मेदिन्यस्त्येव विक्रमस्य विषयः । नहि कुल- शैलनिवहवाहिनो वायवः संनह्यन्त्यतितरले तूलराशौ । न सुमेरुवप्रप्रणय- प्रगल्भा वा दिक्करिणः परिणमन्त्यणीयसि वल्मीके । ग्रहीष्यसि सकल- पृथ्वीपतिप्रलयोत्पातमहाधूमकेतुं मांधातेव चारुचामीकरपङ्कपत्रलतालं- काराङ्ककायं कार्मुकं ककुभां विजये । मम तु दुर्निवारायामस्यां विपक्ष- क्षपणक्षुधि क्षुभितायां क्षम्यतामयमेकाकिनः कोपकवल एकः । तिष्ठतु अतिहेपणोऽत्यन्तलज्जाकारी । कवचयन्ति संनह्यन्ति । आशुशुक्षणयोऽग्नयः । अष्टमङ्गलं कङ्कणमित्यन्ये । तूलं कार्पासः । परिणमन्ति तटाघातक्रीडां न कुर्वन्ति । का स्नेह भय उत्पन्न कर रहा है' यह तो हम दोनों के लिए बराबर है। आपके भुजदण्ड की यह कौन सी स्वार्थपरता है जो अकेले ही क्षीरसमुद्र के फेनपटल के समान उज्ज्वल अमृत रूप यश को पी जाना चाहता है। पहले कभी भी आपने अपने प्रसाद से मुझे वञ्चित नहीं किया। अतः आर्य प्रसन्न हों और मुझे भी साथ ले चलें।' यह कहकर पृथिवी पर सिर टेकते हुए उनके चरणों पर गिर गए । बड़े भाई ने उनको उठाकर फिर कहा—'तात, इस प्रकार बहुत बड़ी तैयारी करके बल की दृष्टि से अत्यन्त हीन उस शत्रु को बड़ाई क्यों दे रहे हो ? हिरन मारने के लिए शेरों का झुण्ड ले जाना लज्जास्पद है। तिनकों को जलाने के लिए कितनी अग्नियों कवच धारण करेंगी। और फिर, तुम्हारे पराक्रम के लिए अठारह द्विपों की अष्टमङ्गलक माला पहनने वाली पृथिवी उपयुक्त विषय है। कुलपर्वतों को उड़ा ले जाने वाले मारुत थोड़ी सी रूई की ढेर में कमर नहीं कसते । सुमेरु से टक्कर लेने वाले दिग्गज कभी बाम्बी से नहीं भिड़ते । मान्धाता के समान दिशाओं की विजय में समस्त राजाओं के विनाश के लिये उत्पात की सम्भावना करने वाला धूमकेतु रूप और सुवर्ण की पत्रलताओं से रचित धनुष अपने हाथ से पकड़ोगे । शत्रु के विनाश को तड़फड़ा देने वाले अकेले मेरी दुर्निवार
षष्ठ उच्छ्वासः ३१६ भवान्।' इत्यभिधाय च तस्मिन्नेव वासरे निर्जगामाभ्यमित्रम् । अथ तथागते भ्रातरि, उपरते च पितरि, प्रोषितजीविते च जामातरि, मृतायां च मातरि, संयतायां च स्वसरि, स्वयूथभ्रष्ट इव वन्यः करी देवो हर्षः कथं कथमप्येकाकी कालं तमनेषीत् । अतिक्रान्तेषु बहुषु वासरेषु कदाचित्तयैव भ्रातृगमनदुःखासिकाया दत्तप्रजागरस्त्रिभागशेषायां त्रिया- मायां यामिकेन गीयमानामिमामार्यां शुश्राव— द्वीपोपगीतगुणमपि समुपार्जितरत्नराशिसारमपि । पोतं पवन इव विधिः पुरुषमकाण्डे निपातयति ॥ ३ ॥ तां च श्रुत्वा सुतरामनित्यताभावनया दूयमानहृदयः प्रक्षीणभूयिष्ठायां क्षपायां क्षणमिव निद्रामलभत । स्वप्ने चाभ्रंलिहं लोहस्तम्भं भज्यमान- मपश्यत् । उत्कम्पमानहृदयश्च पुनः प्रत्यबुध्यत । अचिन्तयच्च—'किं नु खलु मामेवममी सततमनुबध्नन्ति दुःस्वप्नाः । स्फुरति च दिवानिश- अणीयस्यतिस्वल्पे । वल्मीके पिपीलिकोत्खाते मृत्स्थले । अभ्यमित्रं शत्रुसंमुखम् । यामिकेन जागरणियुक्तेन । रत्नराशीर्मणिसमूहः, अधिध्यक्ष । तस्य साराः श्रेष्ठरत्नानि । पोतं यानपात्रम् । निपातयति व्यापादयति । अत्युन्नतमभ्रंलिहं इस भूल में क्रोध के केवल एक ग्रास के लिए क्षमा करो, रुक जाओ ।' यह कहकर राज्यवर्धन उसी दिन शत्रु की ओर निकल पड़े । इस प्रकार भाई चले गये, पिताजी की मृत्यु हो गई, बहनोई ग्रहवर्मा भी न बच रहे, माता मृत्यु को प्राप्त हुई, बहन कैद में पड़ गई तो देव हर्ष ने अपने यूथ से भटके हुए बनैले गज की भाँति किसी किसी प्रकार वह समय व्यतीत किया । बहुत दिनों के बाद किसी समय भाई के चले जाने के दुःख की चिन्ता में मग्न होकर जगे-जगे उन्होंने रात के तीसरे पहर में पहरुवे द्वारा गाई हुई इस आर्या को सुना— 'सारे द्वीपों में जिसके गुणों की प्रशंसा होतो है, रत्नसमूह का जो उपार्जन कर लेता है ऐसे पुरुष को विधि असमय में उस प्रकार पटक देता है जैसे वायु जहाज को ।' यह सुनकर उनका हृदय अनित्यता की भावना से दुखी होने लगा । अभी रात कुछ बच रही थी कि क्षण भर उन्हें नींद आ गई । स्वप्न में बहुत लम्बे एक लौहस्तम्भ को टूटते हुए देखा । उनका हृदय काँपने लगा और फिर नींद टूट गई—'क्यों ये दुःस्वप्न हमेशा मेरे ही पीछे लगे हैं ! अशुभ की सूचना देने वाली मेरी बायीं आँख दिन-रात फरकती रहती है । किसी बड़े राजा के नाश को सूचित करने वाले ये दारुण उत्पात
३२० हर्षचरितम्
मकल्याणाख्यानविचक्षणमदक्षिणमक्षि। सुदारुणाश्चाक्षुद्रक्षितिपक्षयमाच- क्षाणाः क्षणमपि न शाम्यन्ति पुनरुत्पाताः। प्रत्यहं राहुरविकलकायबन्ध इव कबन्धवति ब्रध्नबिम्बे घटमानो विभाव्यते। तपःकरणकालकवलि- तानिव धूसरितसमग्रग्रहानुद्विरन्ति धूमोद्गारान्सप्तर्षयः। दिने दिने दारुणा दिशां दाहा दृश्यन्ते। दिग्दाहभस्मकणनिकर इव निपतति नभस्तलात्तारागणः। तारापातशुचेव निष्प्रभः शशी। निशि निशि इतस्ततः प्रज्वलिताभिरुल्काभिरुग्रं ग्रहयुद्धमिव वियति विलोकयन्ति विलोलतारकाः ककुभः। राज्यसंचारसूचकः संचारयतीव क्ष्मां क्वापि वहद्बहलरजःपटलकलिलशर्कराशकलसूत्कारी मारुतः। न कुशलमिव पश्यामि लग्नस्य। अस्मिन्नसमद्वंशे करीण इव करीरं कोमलमपि कलयतः कृतान्तस्य कः परिपन्थी ? सर्वथा स्वस्ति भवत्वार्याय।' इति चिन्त- यित्वा च अन्तर्भिन्नं भ्रातृस्नेहकातरं द्रवदिव हृदयं कथं कथमपि संस्त- भ्योत्थाय यथाक्रियमाणं क्रियाकलापमकरोत्।
नभःस्पृशम्। अक्षुद्रः प्रधानभूतः। राहोरविकलकायबन्धनं कबन्धयोगात्। कव- न्धदर्शनं चोत्पातसूचकम्। विलोलतारका इति। स्त्रीणां च, युद्धदर्शनवशादक्ष्णोश्च लोलत्वं भवति। कलिलानि व्याप्तानि। वंशो वेणुरपि। करीरो वंशाङ्कुरः। अपिशब्दः कृतान्तस्येत्यतः परं योज्यः। परिपन्थी रोधकः। परिपूर्व्यपर्यायः परि- पन्थशब्दोऽस्तीति ज्ञापितम्।
अब भी शान्त नहीं हो रहे हैं। प्रतिदिन सूर्य में कबन्ध दिखाई पड़ता है। सशरीर के समान होकर राहु सूर्य पर झपटता हुआ लगता है। सप्तर्षि तारे तपस्या करने के अवसर में किए धूम्रपान को अब मुँह से उगलते हैं जिससे आकाश के समस्त तारे धुँधले लग रहे हैं। प्रतिदिन दारुण दिग्दाह दिखाई पड़ते हैं। दिग्दाहों के भस्मकण के रूप में तारे आकाश से गिरते नजर आते हैं। तारों के गिरने के मानों शोक से चन्द्रमा निष्प्रभ लगता है। प्रत्येक रात में उग्र रूप में इधर-उधर उल्कायें जलती रहती हैं, चञ्चल तारों वाली दिशाएँ आकाश में मानों ग्रहयुद्ध देखा करती हैं। धूल और आँकड़-पाथर से भरा हुआ, साँय-साँय की ध्वनि से युक्त एवं राज्य के विलयन की सूचना देने वाला पवन पृथिवी को मानों कहीं उड़ाकर ले जाने की कोशिश करता है। शुभ लग्न को भी उपस्थित नहीं देखता हूँ। हाथी के लिये जैसे कोमल बाँस का कौपल होता है उसी प्रकार हमारे इस वंश में यमराज का अब कौन शत्रु है। सब प्रकार से आर्य का कल्याण हो।' यह सोच
षष्ठ उच्छ्वासः ३२१ आस्थानगतश्च सहसैव प्रविशन्तम्, अनुप्रविशता विषण्णवदनेन लोकेनानुगम्यमानम्, असह्यदुःखोष्णनिःश्वासधूमरक्ततन्तुनेव मलिनेन पटेन प्रावृतवपुषम्, जीवितधारणलज्जयेवावनतमुखम्, नासावंशस्याग्रे ग्रथितदृष्टिम्, दुःखदूरप्ररूढरोम्णा मूकेनापि मुखेन स्वामिव्यसनमवि- च्छिन्नैरश्रुबिन्दुभिर्विज्ञापयन्तं कुन्तलं नाम बृहदश्ववारम्, राज्यवर्धनस्य प्रसादभूमिमभिज्ञाततमं ददर्श। दृष्ट्वा च जाताशङ्कश्चक्षुषि सलिलेन, मुख- शशिनि श्वसितेन, हृदये हुताशनेन, उत्सङ्गे भुवा, दारुणाप्रियश्रवणसमये सममिव सर्वेष्वङ्गेष्वगृह्यत लोकपालैः। तस्माच्च हेलानिर्जितमालवानीक- मपि गौडाधिपेन मिथ्योपचारोपचितविश्वासं मुक्तशस्त्रमेकाकिनं विश्रब्धं स्वभवन एव भ्रातरं व्यापादितमश्रौषीत्। श्रुत्वा च महातेजस्वी प्रचण्डकोपावकप्रसरपरिचीयमानशोकावेगः सहसैव प्रजज्वाल। ततश्चामर्षविधुतशिरःशीर्यमाणशिखामणिशकलाङ्गार- अप्रियंने। अप्रियग्रहणकाले च दुःखं सर्वाङ्गेषु गृह्यते। तत इत्यादौ। परां भीषणतामयामीदिति संबन्धः। कर भाई के स्नेह से कातर हो मानों द्रवीभूत होते हुए अपने हृदय को किसी प्रकार रोककर हर्ष ने अपने नित्य कार्य किए। आस्थानमण्डप में पहुँचते ही उन्होंने राज्यवर्धन का प्रसाद-पात्र और अपने भी अति परिचित कुन्तल नामक प्रधान सवार को प्रवेश करते हुए देखा। उसके पीछे पीछे विषाद से मरे लोग प्रवेश कर रहे थे। उसके शरीर का वस्त्र मलिन हो गया था मानों असह्य दुःख के कारण निकला हुआ उष्ण निःश्वास का धुँवा लग गया था। प्राण धारण की लज्जा से मानों वह मुँह नीचा किए था। नाक के अग्रभाग में उसकी दृष्टि लगी हुई थी। दुःख के कारण रोमाञ्च से भरे हुए उसके मुख से आवाज नहीं निकल रही थी, फिर भी अपने स्वामी के आकस्मिक व्यसन को बेरोक-टोक ढलते हुए आँसुओं से सूचित कर रहा था। उसे देखकर वे शंकित हो गये, तभी उनको आँख में जल (जल देवता वरुण), मुख में श्वास (वायु देवता), हृदय में अग्नि (अग्नि देवता), उत्सङ्ग में पृथिवी (भूदेवता), आदि लोकपाल देवताओं ने दुसह अप्रिय समाचार के सुनने के अवसर में उन्हें मिलकर सम्हाल लिया। उसने खबर दी कि राज्यवर्धन ने मालव की सेना को खेल ही खेल में जीत लिया था, किन्तु गौड़ाधिपति की दिखावटी आवभगत का विश्वास करके वह अकेला शस्त्रहीन दशा में अपने ही भवन में मारा गया। यह सुनते ही महातेजस्वी हर्ष का शोकावेग प्रचण्ड कोपाग्नि के धधकने से और भी बढ़ गया और वे सहसा प्रज्वलित हो उठे। क्रोध से काँपते हुए उनके मस्तक की २१ ह० च०
३२२ हर्षचरितम् किताङ्कमिव रोषाग्निमुद्वमन्ननवरतस्फुरितेन पिबन्निव सर्वतेजस्विनामा- यूंषि, रोषनिर्भुग्नेन दशनच्छदेन लोहितायमानलोचनालोकविक्षेपैर्दिग्दा- हानिव दर्शयन्, रोषानलेनाप्यसह्यसहजशौर्योष्मदहनदह्यमानेनेव वित- न्यमानस्वेदसलिलशीकरासारदुर्दिनः, स्वावयवैरप्यदृष्टपूर्वप्रकोपभीतैरिव कम्पमानैरुपेतः, हर इव कृतभैरवाकारः, हरिरिव प्रकटितनरसिंहरूपः, सूर्यकान्तशैल इवापरतेजःप्रसरदर्शनप्रज्वलितः, क्षयदिवस इवोदितद्वादश- दिनकरदुर्निरीक्ष्यमूर्तिः, महोत्पातमरुत इव सकलभूभृत्प्रकम्पकारी, विन्ध्य इव वर्धमानविग्रहोत्सेधः, महाशीविष इव दुर्नरेन्द्राभिभवरोषितः, निर्भुग्नेन वक्रीकृतेन । दह्यमानेनेति । दाहभीतेन च सलिलकणा वितन्यन्ते । भैरवो भीषणोऽपि । प्रशस्तो नरो नरसिंहः । इत्थं च—'स्युरुत्तरपदे व्याघ्रपुंगवर्षभ- कुंजराः । सिंहशार्दूलनागाद्याः पुंसि श्रेष्ठार्थवाचकाः ॥' इति । नृसिंहरूपी च हरिरिति । तेजो क्षमता, आतपश्च, दिनकरवत्तैश्च दुर्निरीक्षणः । भूभृतो राजानोऽ- पि, गिरयश्च । वर्धमानेन देहेन उत्सेध औन्नत्यं यस्य । नरेन्द्रो मन्त्रज्ञः, राजापि । परीक्षिति दग्धे जनमेजयः पितृपरिभवेन सर्पसत्रे भोगिनां क्षयार्थं ययाजेति वार्ता । शिखामणियाँ टुकड़े-टुकड़े होकर अङ्गार के रूप में छटकने लगीं, मानों वे रोष की अग्नि को उगल रहे हों । उनके ओठ इस तरह लगातार फड़फड़ा रहे थे मानों समस्त तेजस्वियों की आयु पी रहे हों । रोष के कारण ओठ कट जाने से आँखों की किरणें लाल होकर फैल रही थीं मानों दिग्दाह के दृश्य उत्पन्न कर रहे हों । उनके अपने क्रोधानल से भी कहीं अधिक ताप वाला स्वाभाविक शौर्य इस प्रकार उद्दीप्त हो उठा कि उनके शरीर से स्वेद जल की वर्षा होने लगी । मानों उनके अपने ही अङ्गों ने पहले कभी ऐसा कोप नहीं देखा था इसलिए काँपने लगे । उनकी आकृति शिव के समान भैरव (भीषण) हो गई । विष्णु के समान उन्होंने नरसिंह का रूप धारण कर लिया । सूर्यकान्त मणि के पर्वत के समान दूसरे का तेज देखते ही प्रज्वलित हो उठे । महोत्पात के समय पर्वतों को कम्पित करने वाले वायु के समान समस्त राजाओं को उन्होंने कँपा दिया । विन्ध्यपर्वत के समान उनका विग्रहमद बढ़ने लगा (विन्ध्य का विग्रह अर्थात् शरीर बढ़ा था) । दुष्ट सपेरे (नरेन्द्र) द्वारा कोपित महासर्प के समान दुष्ट राजा के द्वारा किए गए अपने अभिभव से कुपित थे । परीक्षित राजा के पुत्र जनमेजय के समान समस्त भोगियों (धनवानों, सर्पों) को जला डालने के लिये तैयार हो गए । भीम के समान शत्रु के खून के प्यासे हो गये । शत्रुहाथी को देखकर दौड़ पड़ने वाले ऐरावत के समान शत्रु के
षष्ठ उच्छ्वासः ३२३ पारीक्षित इव सर्वभोगिदहनोद्यतः, वृकोदर इव रिपुरुधिरतृषितः, सुरगज इव प्रतिपक्षवारणप्रधावितः, पूर्वागम इव पौरुषस्य, उन्माद इव मदस्य, आवेग इत्रावलेपस्य, तारुण्यावतार इव तेजसः, सर्वोद्योग इव दर्पस्य, युगागम इव यौवनोष्मणः, राज्याभिषेक इव रणरसस्य, नीराजनदिवस इवासहिष्णुतायाः परां भीषणतामयासीत् । अवादीच्च गौडाधिपाधममपहाय कस्तादृशं महापुरुषं तत्क्षण एव निर्व्याजभुजवीर्येनिर्जितसमस्तराजकं मुक्तशस्त्रं कलशयोनिमिव कृष्णव- र्मप्रसूतिरीदृशेन सर्ववीरलोकविगर्हितेन मृत्युना शमयेद्देवमार्यम् । अनार्यं च तं मुक्त्वा भागीरथीफेनपटलपाण्डुराः केषां मनःसु सरःसु राजहंसा इव परशुरामपराक्रमस्मृतिकृतो न कुर्युरायंशौर्यगुणाः पक्षपातम् । कथ- मिवात्युग्रस्यास्यार्यजीवितहरणे निदाघखेरिव कमलाकरसलिलशोषणेऽ- भोगिनो राजानः । वृकोदरो भीमसेनः । वारणं निषेधः, हस्ती च वारणः । अव- लेपस्य दर्पस्य । नीराजनं शान्तिकर्मविशेषः । कलशयोनिं द्रोणाचार्यम् । कृष्णवर्त्मप्रसूतिः पापमार्गप्रवर्तकः । धृष्टद्युम्नश्चा- भिजातः, कृष्णवर्त्मा वह्निः । भागीरथीत्यादि परशुराम इत्यादि च हंसानामपि विशेषणम् । रामेण हि हंसमार्गः कैलासे कृत इति हंसास्तत्कीर्ति स्मारयन्ति । पक्षपातं स्नेहम्, पक्षैर्गमनं च । अत्युग्रस्यातिक्रूरस्य, अतिचण्डस्य च । अत्रार्यस्य विनाश के लिये चल पड़े । मानो पराक्रम इस रूप में पहली बार उपस्थित हुआ । मद के उन्माद के समान, अवलेप के आवेग के समान, तेज के चढ़ते हुए यौवन के समान, दर्प के समस्त उद्योग के समान, यौवन ताप के युगागम के समान, युद्ध रस के राज्याभिषेक के समान, असहनशीलता के नीराजन के समान वे अत्यन्त भयङ्कर हो गये । वे बोले—'गौड़ाधिपति को छोड़कर कौन है जो बिना किसी छल-कपट के समस्त राजाओं को पराजित करने वाले वैसे महापुरुष को शस्त्रहीन अवस्था में ऐसी मृत्यु से मारे जिसे वीर लोग निन्दा की दृष्टि से देखते हैं । जिस प्रकार धृष्टद्युम्न ने द्रोणाचार्य को शस्त्रहीन देखकर मार डाला था । उस अनार्य को छोड़कर गंगा के फेनपटल के समान उज्ज्वल और परशुराम के पराक्रम की स्मृति उत्पन्न करने वाले आर्य के शौर्यगुण सरोवर में राज-हंसो के समान किसके मन में पक्षपात नहीं करते ? जैसे ग्रीष्मकाल में प्रखर तेज वाले सूर्य की किरणें सरोवर का जल सोख लेती हैं उसी प्रकार अत्यन्त उग्र स्वभाव वाले उस गौडाधिप की प्रीति की बिलकुल अपेक्षा न रखने वाले हाथ आर्य के प्राण हरने के लिये कैसे फैल गए ? उसकी क्या गति होगी ? किस योनि में प्रवेश
३२४ हर्षचरितम्
नपेक्षितप्रीतयः प्रसृताः कराः । कां तु गतिं गमिष्यति, कां वा योनिं प्रवे- द्यति, कस्मिन्वा नरके निपत्तिष्यति । श्वपाकोऽपि क इदमाचरेत् । नामापि च गृह्णतोऽस्य पापकारिणः पापमलेन लिप्यत इव मे जिह्वा । किं वाङ्गीकृत्य कार्यमार्यस्तेन क्षुद्रेणानुप्रविश्य विगतघृणेन घुणेनेव सक- लभुवनाह्लादनचतुरश्चन्दनस्तम्भः क्षयमुपनीतः । नूनं नानेन मूढेन मधु- रसास्वादलुब्धेन मध्विवार्यजीवितमाकर्षता भावी दृष्टः शिलीमुखसंपातो- पद्व्रवः । निजगृहदूषणं जालमार्गप्रदीपकेन कज्जलमिवातिमलिनं केवल- मयशः संचितं गौडाधमेन । नत्वाश्वेवास्तमुपगतवत्यपि त्रिभुवनचूडामणौ सवितरि वेधसादिष्टः सत्पथशत्रोरन्धकारस्य निग्रहाय ग्रहषण्डविहारैक- हरिणाधिपः शशी । विनयविधायिनि भग्नेऽपि चाङ्कुशे विद्यत एव व्याल- वारणस्य विनयाय सकलमत्तमातङ्गकुम्भस्थलस्थिरशिरोभागभिदुरः खर- कमलाकरेणोपमा । लक्ष्म्यायानादिगुणयुक्तत्वात् । करा हस्ताः, रश्मयश्च । क्षुद्रेण क्रूरेण, परिचितपरिपणेन च । अनुप्रविश्य विश्वासं नीत्वान्तर्भूय च । घुणेन काष्ठ- कृमिणा । शिलीमुखाः शराः, भ्रमराश्च । जालस्य कुसृतेर्मार्गं दीपयति यस्तेन गवाक्षमार्गेण यः प्रदीपः स यथा कजलं संचिनुते नत्वाशु इत्यप्रस्तुतप्रशंसा बोद्धव्या । विशेषेण हरणं विहारो, विच्छायीकरणं गमनं च । षण्डे हि सिंहो गमनं करोति । व्यालवारणस्य दुष्टदन्तिनः । स्थिरो दृढः शिरोभागो यस्य । यं प्राप्तवैव करेगा ? या किस नरक में गिरेगा ? चाण्डाल भी कौन है जो ऐसा करे ? उस पापी के नाम लेने से भी मेरी जिह्वा में पाप जैसे लिपट जाता है । क्या सोचकर उसने ऐसा किया ? जैसे छोटा सा घुन प्रवेश करके चन्दन के स्तम्भ को समाप्त कर डालता है उसी प्रकार उस घृणाहीन क्षुद्र ने सारे जगत् को आह्लादित करने वाले आर्य को उनके भवन में प्रवेश करके मार डाला । निश्चय ही मधुरस के चखने के लोलुप उस मूर्ख ने मधु के समान आर्य के प्राणों को चूसते हुए यह नहीं सोचा कि शिलीमुख ( बाण या भौंरे ) मुझ पर टूट पड़ेंगे । जैसे किसी झरोखे में रखा हुआ दीपक कालिख से घर को दूषित कर देता है उसी प्रकार अपने ही दोष के रूप में उस गौड़ाधम ने अत्यन्त मलिन अपने अयश को केवल सञ्चित किया । इस प्रकार शीघ्र त्रिभुवन के चूड़ामणि सूर्य ( राज्यवर्धन ) के अस्त हो जाने पर क्या विधाता ने सन्मार्ग के शत्रु अन्धकार ( गौड़ाधिप ) के निग्रह के लिये ग्रहों के वनखण्ड में विचरण करने वाले सिंह के रूप में चन्द्र ( हर्षवर्धन ) को आदेश नहीं दिया है ? दुष्ट हाथी को विनय की सीख देने वाले अङ्कुश के टूट जाने पर भी समस्त मतवाले हाथियों के कुम्भस्थल के भेदन में समर्थ और अत्यन्त तीक्ष्ण सिंह
षष्ठ उच्छ्वासः ३२५ त्तरः केसरिनखरः । तादृशाः कुवैकटिका इव तेजस्विरत्नविनाशकाः कस्य न वध्याः । केदानीं यास्यति दुर्बुद्धिः ?' इत्येवमभिदधत एवास्य पितुरपि मित्रं सेनापतिः समग्रविग्रहप्राग्रहरो हरितालशैलावदातदेहः परिणतप्रगु- णसालप्रकाण्डप्रकाशः प्रांशुः, अतिशौर्योष्मणेव परिपाकमागतो गतभूयिष्ठे वयसि वर्तमानः, बहुशरशयनसुप्रोत्थितोऽपि हसन्निव शान्तनवमतिदी- र्घेणायुषा, दुरभिभवशरीरतया जरयापि भीतभीतयेव प्रकटितप्रकम्पया परामृष्टः कथमपि सारमयेषु शिरोरुहेषु शशिकरनिकरसितसरलशिरो- रुहसटालां सैंहीमिव निष्कपटपराक्रमरसरचितां संक्रान्तो जीवन्नेव जातिम्, अपरामपरस्वामिमुखदर्शनमहापातकपरिजहीर्षयैव भ्रूयुगलेन वलितशिथिलप्रलम्बचर्मणा स्थगितदृष्टिः, धवलस्थूलगुञ्जापिच्छप्रच्छा- दितकपोलभागभास्वरेण वमन्निव विक्रमकालमकालेऽपि विकाशिकाश- तस्य स्वयं विदारणं भवतीत्यर्थः । वैकटिको रत्नबन्धकः । इत्येवमादौ । सेनापतिः सिंहनादनामा संनिधावेव समुपविष्टो विज्ञापितवानिति संबन्धः । विग्रहाः संङ्ग्रामास्तेषु प्राग्रहरोऽग्रेसरः । प्रगुणं स्पष्टम् । काण्डं स्कन्धः । शान्तनवं भीष्मम् । वलयोऽस्य सन्ति वलिनम् । गुञ्जोत्तरोष्ठोपरि रोमराजिः । विक्रमकालमिति । शरदारम्भविशेषणम् । तत्र शत्रुपु जययात्रा विधेयेति । का नख तो विद्यमान ही है। उसी प्रकार से रत्न के निकृष्ट पारखो जो तेजस्वी रत्नों को नष्ट कर डालते हैं किसके वध्य नहीं ? वह दुर्बुद्धि गौड़ाधिप अब बच कर कहाँ जायगा ?" प्रभाकरवर्धन का मित्र सिंहनाद नाम का सेनापति पास में बैठा हुआ था । युद्ध के अवसरों में वह सबसे आगे रहने वाला था । हरिताल के समान उसकी देह उज्ज्वलवर्ण की और बढ़े हुए सालवृक्ष के समान लम्बी थी । शौर्य की अधिक गर्मी से मानों वह पक गया था, जिससे उसकी आयु का अधिक अंश बीत चुका था । मानों वह भी अनेक बाणों के बने हुये शयन पर सोकर उठा था और अपनी आयु से भीष्म को भी हँस रहा था । उसके कष्ट से अभिभव प्राप्त करने के कारण वृद्धावस्था भी डर कर मानों शरीर में कम्प उत्पन्न करती हुई उसका स्पर्श किए थी । चन्द्र की किरणों के समान सफेद और सीधे सादे एवं दृढ़ उसके बाल ऐसे प्रतीत होते थे कि मानों वह अपने निष्कपट पराक्रम रस के कारण जीते जी ही सिंह की जाति को प्राप्त कर चुका था । उसकी आँख पर चमड़ी शिथिल होकर इस प्रकार नीचे झूल रही थी कि भौंहों से उसकी आँखें ढँक गई थीं । उसके भीमाकृति मुख के सफेद गलगुच्छे गालों पर छाये हुए थे, मानों असमय में भी युद्ध के लिये उचित, फूले हुये काश वनों से उज्ज्वल शरत्काल के आरम्भ को उगल रहा
काननविशदं शरदारम्भं भीमेन मुखेन, मृतमपि हृदयस्थितं स्वामिनमिव सितचामरेण वीजयन्नाभिलम्बेन कूर्चकलापेन, परिणामेऽपि धौतासिधा- राजलपानतृषितैरिव विवृतवदनैर्बृहद्भिर्व्रणविदारैर्विषमितविशालवक्षाः, नि- शितशस्त्रटङ्ककोटिकुट्टितबहुबृहद्वर्णाक्षरपङ्क्तिनिरन्तरतया च सकलसमर- विजयपर्वगणनाभिव कुर्वन्पूर्वपर्वत इव पादचारी, विविधवीररसवृत्तान्त- रामणीयेकन महाभारतर्माप लघयन्निव, प्रतिपक्षक्षपणातिनिबन्धेन पर- शुराममपि शिक्षयन्निव, अब्धिश्रमणेनानादरश्रीसमाकर्षणविभ्रमेण मन्दर- मपि मन्दयन्निव, वाहिनीनायकमर्यादानुवर्तनेनाम्भोधिमप्यभिभवन्निव, स्थैर्यकार्कश्योन्नतिभिरचलानपि हेपयन्निव, सहजप्रचण्डतेजःप्रसरपरि- स्फुरणेन सवितारमपि तृणीकुर्वन्निव, ईश्वरभारोद्वहनघृष्टपृष्ठतया हरवृष- कूर्चकलापः श्मश्रुः। परिणामे वृद्धत्वे । तृषितोऽपि जलं पातुं विवृतवदनो भवति । विदारैः स्फोटैः । शस्त्राण्येव टङ्काः छेदनभाण्डानि कुट्टितानि छिन्नानि । पूर्ववृत्तान्तः पूर्वप्रशस्तिः । अब्धिश्रमणं समुद्रयात्रा, जले परिवर्तनमपि । ताभ्योऽनादरेण यल्लक्ष्मीसमाकर्षणं तदर्थं यो विविधो भ्रमस्तेन । वाहिनी सेना, नदी च । स्थैर्य व्यवसायादचलनमपि। कार्कश्यं परविषयं निर्दयत्वमपि । उन्नतिरभिमानोऽपि । तेज उन्नतिः, क्षमा, घर्मश्च । ईश्वरो देवो हरोऽपि । कार्येषु क्षुण्णो लोकेषु धृष्टपृष्ठ हो। सफेद झालदार दाढ़ो नाभि तक इस प्रकार लटक रही थी मानों मरने पर भी हृदय में स्थित अपने स्वामी (प्रभाकर वर्धन) को उज्ज्वल चँवर से झल रहा हो। उसकी ऊबड़खाबड़ चौड़ी छाती पर मुँह बाये घावों के बड़े बड़े निशान इस प्रकार थे मानों वृद्धावस्था में भी तलवार के धाराजल के लिये तृषित हो रहे थे। उसके शरीर पर शस्त्र की तीक्ष्ण टाँकियों से व्रण राश्मियाँ टङ्कित थीं मानों समस्त युद्धों के विजय पर्व की गणना करता हो। उदयाचल के समान पृथिवी को चरणों से आक्रान्त करके बैठा था। वीररस के अनेक वृत्तान्तों के कारण महाभारत से भी बढ़कर वह रमणीय हो रहा था। शत्रुओं के संहार की प्रवृत्ति से वह परशुराम को भी मानों सीख दे रहा था। समुद्रभ्रमण के द्वारा श्री (लक्ष्मी या वैभव सम्पत्ति) को खींच लाने की अद्भुत सामर्थ्य से अपने सामने मन्दराचल को भी कम कर रहा था। वाहिनीनायक (सेनापति) की मर्यादा का अनुसरण करने से (वाहिनी नायक अर्थात् सरित्पति) समुद्र को भी अभिभूत कर रहा था। स्थिरता, कर्कशता और ऊँचाई से पर्वतों को भी लज्जित कर रहा था। स्वाभाविक प्रचण्ड तेजके स्फुरित होने से अपने सामने सूर्य को भी तृण के समान मान रहा था। पीठ पर स्वामी (ईश्वर) का बोझ ढोने से ईश्वर को भी हँस रहा था। क्रोधरूपी अग्नि की
षष्ठ उच्छ्वासः ३२७ भमपि हसन्निव, अरणिरमर्षाग्नेः, ऐश्वर्यं शौर्यस्य, मदो मदस्य, विसर्पो दर्पस्य, हृदयं हठस्य, जीवितं जिगीषुतायाः, समुच्छ्वसितमुत्साहस्य, अङ्कुशो दुर्मदानाम्, नागदमनो दुष्टभोगिनाम्, विरामो वरमनुष्यतायाः, कुल- गुरुर्वीरगोष्ठीनाम्, तुला शौर्यशालिनाम्, सीमान्तदृश्वा शास्त्रग्रामस्य, निर्वोढा प्रौढवादानाम्, संस्तम्भयिता भग्नानाम्, पारगः प्रतिज्ञायाः, मर्मज्ञो महाविग्रहाणाम्, आघोषणापटहः समरार्थिनाम्, संनिधावेव समुपविष्टः सिंहनादनामा स्वरेणैव दुन्दुभिघोषगम्भीरेण सुभटानां सम- ररसमानयन्विज्ञापितवान्— 'देव ! न क्वचित्कृताश्रयया मलिनया मलिनतराः कोकिलया काका इव कापुरुषा हतलक्ष्म्या विप्रलभ्यमानमात्मानं न चेतयन्ते । श्रियो हि दोषा अन्धतादयः कामलाविकाराः । छत्रच्छायान्तरितरवयो विस्मर- उच्यते । नागदमनो गजमर्दनः, गरुडश्च । भोगिनो राजानः, सर्पाश्च । यथा आघोषणापटहः समरार्थिनामुत्साहं जनयति तथाऽसावपीत्यर्थः । देवेत्यादौ । कापुरुषाः हतलक्ष्म्या विप्रलभ्यमानं वञ्च्यमानमात्मानं न चेतयन्ते इति योजना । न क्वचित्कृताश्रयया सर्वत्र चाञ्चल्यात्कस्मान्तान्हतलक्ष्मीर्विप्रलभत इत्याह—श्रियो हि दोषा अन्धतादयः । कामलाविकारा इति । हि यस्माच्छ्रियो ये वह अरणि, शौर्य का ऐश्वर्य, मद का मद, दर्प का प्रसर, हठ का हृदय, विजय की इच्छा का जीवन, उत्साह का उच्छ्वसित, दुर्मदों का अंकुश, दुष्ट राजाओं का दमन करने वाला, श्रेष्ठ मनुष्यता का विराम, वीर गोष्ठियों का कुलगुरु, शौर्यशील लोगों की उपमा, शास्त्रों का पारदर्शी, उद्धत विवादों का समुचित उत्तर देने वाला, शत्रु के भय से भागने वालों को रोक रखने वाला, महासमरों का मर्मज्ञ, एवं युद्ध को चाहने वालों के लिए घोषणा पटह था । दुन्दुभि के घोष के समान गम्भीर आवाज में योद्धाओं के मन में युद्ध का कुतूहल उत्पन्न करते हुए उसने निवेदन किया । 'देव, कोयल के समान किसी स्थान पर स्थिर होकर न रहने वाली और मलिन दुष्ट लक्ष्मी के द्वारा प्रतारित होते हुए अपने आपको कौवे के समान मलिन प्रकृति के कायर पुरुष नहीं समझ पाते । कामला आदि आँखों के विकार के समान अन्धता आदि श्री के दोष हैं । छत्र की छाया में सूर्य को व्यवहित कर देने वाले मूढ़ लोग दूसरे तेजस्वी को बिल्कुल भूल जाते हैं। वह वराक गौड़ाधिप क्या करे ? अत्यन्त डरपोक स्वभाव के कारण हमेशा मुँह फेरे रहने वाले उसने सबको अभिभूत कर देने वाले शौर्यातिशय के