हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 350, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ उच्छ्वासः ३०३ मिव कृशिम्ना, किंकरीकृतमिव कारुण्येन, दासीकृतमिव दौर्मनस्येन, शिष्यीकृतमिव शोचितव्येन, अन्धीकृतमिवाधिना, मूकीकृतमिव मौनेन, पिष्टमिव पीडया, स्विन्नमिव संतापेन, उषितमिव चिन्तया, विलुप्तमिव विलापेन, धृतमिव वैराग्येण, प्रत्याख्यातमिव प्रतिसंख्यानेन, अवज्ञातमिव प्रज्ञया, दूरीकृतमिव दुरभिभवत्वेन, अबोध्येन वृद्धबुद्धीनाम्, असाध्येन साधुभाषितानाम्, अगम्येन गुरुगिराम्, अशक्येन शास्त्रशक्तीनाम्, अप- थेन प्रजाप्रयत्नानाम्, अगोचरेण सुहृदनुरोधानाम्, अविषयेण विषयोपभो- गानाम्, अभूमिभूतेन कालक्रमोपचयानां शोकेन कवलीकृतं ज्येष्ठं भ्रात- रमपश्यत् । आवेगोद्गतकृतस्नेहोत्कलिकाकलापोत्क्षिप्यमाणकाय इव च परवशः समुदगात् । अथ तं दूरादेव दृष्ट्वा देवो राज्यवर्धनश्चिरकालकलितं बाष्पावेगं मुमुक्षुः सुदूरप्रसारितेन संकल्पयन्निव सर्वदुःखानि दीर्घेण दोर्दण्डद्वयेन गृहीत्वा भूभृद्राजा, गिरिश्च । तेजःपतिर्नृपतिः, सूर्यश्च । श्यामः कृष्णः, श्यामा च रात्रिः । कल्पपादपो राजापि । छाया कान्तिः, आतपाभावश्च । प्रत्याख्यातं त्यक्तम् । प्रतिसंख्यानेन विवेककुशल्या बुद्ध्या । कलितं धृतम् । बन्धनं लाभम् । पर्जन्य इन्द्रः । थे। विशाल वज्रपात से फटे हुए पर्वत के समान जोर से कांप रहे थे। कृशता ने मानों उन्हें खरीद लिया था । कारुण्य ने अपना किंकर बना लिया था। दौर्मनस्य ने अपना उन्हें दास बना लिया था। शोक ने शिष्य कर रखा था। मानसिक व्यथा ने अंधा बना दिया था । मौन ने उन्हें चुप कर दिया था । पीड़ा ने पीस दिया था । संताप ने पका डाला था । चिन्ता ने पकड़ लिया था। विलाप ने विलुप्त कर दिया था । वैराग्य ने उन्हें थाम लिया था । बुद्धि ने उन्हें छोड़ दिया था । प्रज्ञा ने उनका तिरस्कार कर दिया था । अब उनमें दुरभिभव होने की बात न रही । बड़े-बूढ़े लोग भी उनके शोक को हटा न सके । सज्जनों के उपदेश भी उन पर काम न करते, गुरुओं की बातें भी न चलतीं, शास्त्रों की शक्ति भी असमर्थ थी, प्रजा के प्रयत्न भी उनका हरण न कर सके, सामयिक उपचार भी कोई असर नहीं कर सके । वह शोक मानों उन्हें खाये जा रहा था । आवेग से उत्पन्न स्नेह की उत्कंठा ने हर्ष के शरीर को मानों झकझोर दिया और वे परवश हो कर उठ खड़े हुए । कुमार हर्ष को देव राज्यवर्धन ने दूर ही से देखा और बहुत पहले से रोके हुए बाष्पावेग को छोड़ने की इच्छा से सारे दुःख का चिन्तन करके दूर तक अपनी लम्बी