हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०२ हर्षचरितम् कृशैरवयवैरावेद्यमानदुःखभारम्, अपगतचूडामणिनि मलिनाकुलकुन्तले शेखरशून्ये शिरसि शुचमारूढां मूर्तिमतीमिव दधानम्, आतपगलितस्वे- दराजिना रुदतेव पितृपादपतनोत्कण्ठितेन ललाटपट्टेन लक्ष्यमाणम्, प्रथीयसा बाष्पपयःप्रवाहेणाभिमतपतिमरणमूर्च्छितामिव महीमनवरतं सिञ्चन्तम्, अनन्तसंतताश्रुप्रवाहनिपतननिश्रीकृताविव दुःखक्षामौ कपो- लावुद्वहन्तम्, अत्युष्णमुखमारुतमार्गगतेन द्रवतेव गलितताम्बूलरागेणा- धरबिम्बेनोपलक्षितम्, पवित्रिकामात्रावशेषेन्द्रनीलिकांशुश्यामायमानमचि- रश्रुतपितृमरणजन्यमहाशोकाग्निदग्धमिव श्रवणप्रदेशमुद्वहन्तम्, अस्फुटा- भिव्यक्तव्यञ्जनेनाप्यधोमुखस्तिमितनयननीलतारकमयूखमालाखचितेन शोकप्ररूढश्मश्रुश्यामलेनेव मुखशशिना लक्ष्यमाणम्, केसरिणमिव महाभूभृद्विनिपातविह्वलनिरवलम्बनम्, दिवसमिव तेजःपतिपतनपरिम्ला- नश्रियं श्यामीभूतम्, नन्दनमिव भग्नकल्पपादपं विच्छायम्, दिग्भागमिव प्रोषितदिङ्कुञ्जरशून्यम्, गिरिमिव गुरुवज्रपातदारितं प्रकम्पमानम्, क्रीत- शेखर आपीडः। अधरबिम्बेनापीतीत्थंभूतलक्षणे तृतीया। अभिव्यञ्जनं श्मश्रु। अस्तव्यस्त थे, शेखरस्रज भा न था, इस प्रकार माना मूर्तिमान् हो कर सिर पर बैठे शोक को धारण कर रहे थे। घाम की गर्मी से पसीने की बूँदें उनके ललाट पर छा गई थीं, मानों पिता के पैर पड़ने की उत्कंठा से रो रहे हों। अपने अभिमत स्वामी की मृत्यु से मानों मूर्च्छित पृथिवी को अपने बढ़े हुए बाष्प के प्रवाह से निरन्तर सींच रहे थे। उनके कपोल दुःख से इस प्रकार क्षीण हो रहे थे मानों निरन्तर बहते हुए अश्रुप्रवाह से घिचिक गए हों। उनके मुँह से अत्यन्त उष्ण श्वास के साथ द्रवित हो कर मानों उनके अधर का ताम्बूल-राग निकल रहा था। उनका कर्णदेश विशुद्ध एक मात्र बची हुई इन्द्रनीलमणि की किरण से श्यामवर्ण हो रहा था मानों कुछ क्षण पूर्व सुने हुए पिता की मृत्यु के समाचार से उत्पन्न महाशोक की अग्नि में जल गया हो। उनके मुखचन्द्र में श्मश्रु के रूप में अभी पाम्ही पड़ ही रही थी, फिर मुंह नीचा करने से उनकी आँखों की नीली किरणें नीचे की ओर फैल रही थीं, मानों शोक के कारण क्षौर कर्म न कराने से उनकी दाढ़ी बढ़ आई हो। राजा के विनाश से व्याकुल और बिना किसी आश्रय के बने वे उस सिंह के समान लग रहे थे जो पर्वत के गिरने से उद्विग्न और आश्रयरहित हो गया हो। सूर्य के अस्त होने से दिन के समान तेजस्वी राजा की मृत्यु से मुर्शान हुए अंगों से प्रतीत हो रहे थे। कल्पवृक्ष के भग्न हो जाने से नन्दनवन के समान छायारहित (कान्तिहीन) हो रहे थे। दिग्गज के चले जाने से दिग्भाग की तरह सूने-सूने लग रहे