हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ उच्छ्वासः ३०१ श्रुत्वा च सोदर्यस्नेहनिहितनिरतिशयमन्युमृदूकृतमनाः कथमपि न ववाम बाष्पवारिप्रवाहोत्पीडेन सह जीवितम्। अनन्तरं च द्वारपालप्रमुक्तेन प्रथमप्रविष्टेन परिजनेनेवाक्रन्देन कथ्य- मानम्, दूरद्रुतागमनमुषितबाहुल्येन विच्छिन्नच्छत्रधारेण लम्बिताम्बर- वाहिना भ्रष्टभृङ्गारग्राहिणा च्युताचमनधारिणा ताम्यत्ताम्बूलिकेन खञ्ज- त्खड्गग्राहिणा कतिपयप्रकाशदासेरकप्रायेण बहुवासरान्तरितस्नानभोजन- शयनश्यामक्षामवपुषा परिजनेन परिवृतम्, अविरलमार्गधूलिधूसरितश- रीरतया शरणीकृतमित्राशरण्या क्रमागतया वसुंधरया, हूणनिर्जयसमर- शरव्रणबद्धपट्टकैर्दीर्घधवलैः समासन्नराज्यलक्ष्मीकटाक्षपातैरिव शबलीकृ- तकायम्, अवनिपतिप्राणपरित्राणार्थमिव च शोकहुतभुजि हुतमांसैरति- च्त्तरो जनसमूहः । मन्युः शोकः । अनन्तरमित्यादौ प्रविशन्तं ज्येष्ठं भ्रातरमद्राक्षीदिति संबन्धः । परिजनेनापि प्रथमप्रविष्टेन द्वारपालप्रमुक्तेन च । आचमनं पतद्ग्रहः । प्रकाशा आतुरङ्गत्वाच्छि- श्रीयमानाः। दासेरका दासीसुताः। यह सुन कर सहोदर भाइ के स्नेह से अधिक रूप में उत्पन्न पिता जी की मृत्यु के शोक से आर्द्र मन वाले कुमार ने अश्रुधार की पीड़ा के साथ किसी प्रकार प्राण को रोक रखा। तत्पश्चात् उन्होंने अपने जेठे भाई राज्यवर्धन को देखा। द्वारपाल से छूट पाकर परिजन की भाँति पहले ही घुसे हुए आर्तनाद ने उनकी खबर दे दी। उनके चारों ओर कई दिनों से स्नान, भोजन, शयन न होने के कारण मुर्झाये हुए और कृश शरीर वाले लोग थे जिन्होंने शीघ्रता से दूर का रास्ता तय करने के लिए बहुतों का साथ छोड़ दिया था। उनके छत्रधारी पुरुष भी पीछे रह गए थे। वेग से चलने के कारण उनके कपड़े खिसक कर लम्बे हो गए थे। भृङ्गार नामक पात्र लेकर चलने वाले पुरुष भी दूर रह गए थे। आचमन का जल लेकर चलने वाले भी जाने कहाँ रह गए थे। खड्गग्राही पुरुष लँगड़ा कर चल रहे थे। कुछ ऊँट भी दिखाई दे रहे थे। हमेशा मार्ग में चलते ही रहने से उनकी देह धूल से धूसरित हो गई थी, मानों अशरण हो कर क्रम से आई हुई वसुन्धरा को उन्होंने अपनी शरण में रख लिया हो। हूणों को पछाड़ देने के समर में बाणों से लगे हुए उनके शरीर के घावों पर लम्बी सफेद पट्टियाँ बँधी थीं, मानों समीप में पहुँची हुई राज्यलक्ष्मी के दीर्घ धवल कटाक्ष पात उन पर पड़ रहे हों। राजा के प्राणों की रक्षा के लिए मानों उनके अंग-अंग अपने आपको शोक की अग्नि में स्वाहा कर रहे थे जिससे उनका दुःखभार व्यक्त हो रहा था। उनके सिर पर चूड़ामणि न थी, बाल गंदे और