भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 347, कुल 506 में से

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पृष्ठ 347

३०० हर्षचरितम् कीकसेषु, कल्पितशोकशल्ये सुधानिचयचिते चिताचैत्यचिह्ने, वनाय विसर्जिते महाजिजिति राजगजेन्द्रे, क्रमेण च मन्देष्वाक्रन्देषु, विरली- भवत्सु च विलापेषु, विश्राम्यत्यश्रुणि, शिथिलीभवत्सु श्वसितेषु, अवि- स्पष्टेषु हाकष्टाक्षरेषु, उत्सार्यमाणासु च व्यसनशय्यासु, उपदेशश्रवण- क्षमेषु श्रोत्रेषु, अनुरुधावधानयोग्येषु हृदयेषु, गणनीयेषु नृपगुणेषु, प्रदे- शवृत्तित्तामाश्रयति शोके, कृतेषु कविरुदितकेषु, जाते च स्वप्नावशेषदर्शने हृदयावशेपावस्थाने चित्रावशेषाकृतौ काव्यावशेषनाम्नि नरनाथे देवो हर्षः कदाचिदुत्सृष्टव्यापारः पुञ्जीभूतवृद्धबन्धुवर्गाग्रेसरेणावनतमूकमुखेन महा- जनेन मौलेनाकाल आत्मानं वेष्ट्यमानमद्राक्षीत् । दृष्ट्वा चाकरोन्मनसि— ‘किमन्यदार्यमागतमावेदयत्ययं शोकपराभूतो लोकाकरः’ इति । वेपमान- हृदयश्च पप्रच्छ प्रविशन्तमधिकतरप्रचारमन्यतमं पुरुषम् 'अङ्ग ! कथय । किमार्य प्राप्तः' इति । स मन्दमब्रवीत्—'देव ! यथादिशसि द्वारि' इति वेष्ट्यमानमद्राक्षीदिति संबन्धः । भोजनं भुक्तं तदस्यास्तीति । 'अर्शआदिभ्योऽच्' । अमत्राणि पात्राणि । पत्राणि वाहनानि । कीकसेष्वस्थिषु । चितायां चैत्यचिह्न- स्तदाकारं चिह्नम्, श्मशानदेवगृहं वा । कविरुदितकेषु दुःखोद्दीपनकालेषु । लोको- पर शोक के शल्य को उत्पन्न करने वाला चैत्यचिह्न स्थापित किया गया जो सुधा या गचकारी से बनाया गया था । महासमर में जीतने वाला राजा का निजी हाथी वन में छोड़ दिया गया । क्रम से आर्तनाद कम पड़ गए । विलाप की आवाज भी विरल हो गई । आँसुओं का बहना भी बंद हो गया । साँसें शिथिल पड़ गई । हाय-हाय के दर्दभरे शब्द अस्पष्ट हो गए । शोक के अवसर पर पड़े रहने के लिए जो शय्याएँ बिछाई गई थीं अब हटा दी गई । कान अब उपदेश की बात सुनने लगे । राजा के गुण गिने जाने लगे । अब शोक वस्तु-वस्तु पर ही आश्रित हो गया (अर्थात् राजा की किसी-किसी वस्तु को देख या सुन कर शोक उत्पन्न होता न कि हमेशा) । कवियों ने राजा के शोक में विलाप- पूर्ण काव्य रचे । राजा का दर्शन स्वप्न के रूप में अवशिष्ट रह गया, हृदय के रूप में वे अब बच रहे और उनका नाम काव्य के रूप में रह गया । तब किसी समय काम-धाम से विरत हो कर बैठे हर्ष ने वृद्ध बन्धुवर्ग, झुके हुए चुपचाप महाजन और मौल (वंश- परम्परागत) मन्त्रियों से घिरते हुए अपने आप को देखा । देख कर उन्होंने मन में सोचा—'शोक से पराभूत ये लोग भाई के आने के समाचार के अतिरिक्त क्या निवेदन करेंगे ?' काँपते हुए हृदय से उन्होंने भीतर प्रवेश कर दौड़ते आते हुए एक व्यक्ति से पूछा—'अङ्ग, कहो क्या आर्य पधार चुके ?' वह धीरे से बोला—'देव, हाँ, द्वार पर हैं।'