हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चम उच्छ्वासः २६७ प्रचुरमित्रानुनीयमानश्च सनाभिभिः कथं कथमप्याहारादिकासु क्रियास्वा- भिमुख्यमभजत । भ्रातृगतहृदयश्चाचिन्तयत्—'अपि नाम तातस्य मरणं महाप्रलयसदृशमिदमुपश्रुत्य आर्यो बाष्पजलस्नातो न गृह्णीयाद्वल्कले । नाश्रयेद्वा राजर्षिराश्रमपदम् । न विशेद्वा पुरुषसिंहो गिरिगृहाम् । अश्रु- सलिलनिर्भरभरितनयननलिनयुगलो वा पश्येदनाथां पृथिवीम् । प्रथम- व्यसनविषमविह्वलः स्मरेदात्मानं वा पुरुषोत्तमः । अनित्यतया जनित- वैराग्यो वा न निराकुर्यादुपसर्पन्तीं राज्यलक्ष्मीम् । दारुणदुःखदहनप्र- ज्वलितदेहो वा प्रतिपद्येताभिषेकम् । इहागतो वा राजभिरभिधीयमानो न पराचीनतामाचरेदिति । अतिपितृपक्षपाती खल्वार्यः । सर्वदा तात- श्लाघया मामभिधत्ते—तात हर्ष ! कस्यचिदभूद्भविष्यति वा पुनः काञ्च- सनाभयः सगोत्राः । शौचानुप्रवणं शरीरबाधादि । बाष्पजलस्नातो न गृह्णी- याद्वल्कले इति प्रतीयमानता बोद्धव्या । अत्र च सर्वत्र नेत्याशङ्कायाम् । पुरुषोत्तमो हर्षः, हरिरपि । पराचीनता पराङ्मुखत्वम्, अनानुकूल्यं वा । करने का अवसर नहीं प्राप्त किया। बहुत मित्रों के समझाने पर वे किसी किस प्रकार आहार आदि कार्यों में प्रवृत्त हुए। बड़े भाई राज्यवर्धन का स्मरण करके सोचने लगे—'कहीं ऐसा न हो कि तात के महाप्रलय के सदृश इस मरणवृत्तान्त को सुन कर भार्य रोते हुए वल्कल धारण कर लें। कहीं राजर्षि वह किसी आश्रम में प्रविष्ट न हो जाँय । कहीं पुरुष-सिंह वे गिरिकन्दरा में न चले जाँय । कहीं वे इस पृथिवी को अनाथ देख कर नेत्रों से निरन्तर अश्रुधारा प्रवाहित न करने लगें । कहीं श्रेष्ठ मनुष्य वे दुःख की पहली चोट से घबरा कर आत्मचिन्तन में न लग जाँय । कहीं संसार की अनित्यता से वैराग्यवान् हो कर आती हुई राज्यलक्ष्मी से विमुख न हो जाँय । कहीं दारुण दुःखरूपी अग्नि से सन्तप्त हो कर जल में डूबने न लगें। अथवा यहाँ आकर राजाओं के प्रार्थना करने पर भी सिंहासन पर बैठने से पराङ्मुख न हो जाँय । वे पिता जी के अत्यन्त पक्षपाती हैं। हमेशा उनकी श्लाघा करते हुए कहते थे—भाई हर्ष, सुवर्ण के ताल वृक्ष की भाँति लम्बा शरीर किसीका हुआ है या फिर होगा ? सूर्य की भक्तिसे विकसित होने वाला उनका मुखरूपी महाकमल और इस प्रकार वज्रस्तम्भ के समान उद्भासित होने वाले दोनों भुजदण्ड और ये मद से अलसाए बलराम के समान विलास किसी के हुए हैं अथवा होंगे ? इस प्रकार कौन दूसरा