हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६६ हर्षचरितम्
देवमपि हर्षं तदवस्थं पितृशोकविह्वलीकृतम् , श्रियं शाप इति, महीं महापातकमिति, राज्यं रोग इति, भोगान्भुजङ्गा इति, निलयं निरय इति, बन्धुं बन्धनमिति, जीवितमयश इति, देहं द्रोह इति, कल्यतां कलङ्क इति, आयुरपुण्यफलमिति, आहारं विषमिति, विषममृतमिति, चन्दनं दहन इति, कामं क्रकच इति, हृदयस्फोटनमभ्युदय इति च मन्यमानम् , सर्वासु क्रियासु विमुखम् , पितृपितामहपरिग्रहागताश्चिर- न्तनाः कुलपुत्राः, वंशक्रमाहितगौरवाश्च ग्राह्यगिरो गुरवः, श्रुतिस्मृतीति- हासविशारदाश्च जरद्विजातयः, श्रुताभिजनशीलशालिनो मूर्धाभिषिक्ता- श्चामात्या राजानो, यथावदधिगतात्मतत्त्वाश्च संस्तुता मस्करिणः, सम- दुःखसुखाश्च मुनयः, संसारासारत्वकथनकुशला ब्रह्मवादिनः, शोकापनय- ननिपुणाश्च पौराणिकाः पर्यवारयन् ।
अस्वतन्त्रीकृतश्च तैर्मनसापि नालभत शोकानुप्रवणमाचरितुम् ।
देवमित्यादौ। देवमपि हर्षमेवंविधा जनाः पर्यवारयन्निति संबन्धः। कल्यता- मरोगिताम् । ग्राह्यगिर आदेयवाचः । अध्यात्ममात्मज्ञानम् । तत्त्वमितिकर्तव्यता । मस्करिणः परिव्राजकाः ।
देव हर्ष भी पिता के शोक में विह्वल चित्त से तदवस्थ पड़े थे । वे श्री को शाप, पृथिवी को महापातक, राज्य को रोग, भोग-विलास को सर्प, घर को नरक, बन्धुजन को बंधन, जीवन को अयश; देह को द्रोह, आरोग्य को कलंक, आयु को अपुण्य का फल, भोजन को विष, विष को अमृत, चन्दन को अग्नि, काम को करपत्र और हृदय के फटने को अभ्युदय मान बैठे । उन्होंने सब कार्यों से मुँह मोड़ लिया । पिता-पितामह की कुल- परम्परा के पुराने कुलपुत्रों ने श्रुति, स्मृति, इतिहास के ज्ञाता वृद्ध ब्राह्मणों ने, ज्ञान, कुल और शील से युक्त अमात्य पद के अधिकारी राजाओं ने, आत्मतत्त्व को ठीक प्रकार से अधिगत करने वाले प्रसिद्ध मस्करी साधुओं ने, सुख-दुःख को एक-सा समझने वाले मुनियों ने, संसार की असारता का उपदेश करने वाले ब्रह्मवादी शांकर वेदान्त के अनुयायियों ने और शोक को कम करने में निपुण पौराणिकों ने आकर उन्हें घेर लिया । उन लोगों के द्वारा समझाने-बुझाने से हर्ष ने शोक की वेदना को मन से भी अनुभव