भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 342, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 342

वनकरिकुलकरशीकरासारसिच्यमानतनवः पल्लवशयनशायिनः संतापम- शमयन्, केचित्संनिहितानपि विषयानुत्सृज्य सेवाविमुखाः परिच्छिन्नैः पिण्डकैरटवीभुवः शून्या जगृहुः, केचित्पवनाशना धर्मधना धमद्धमनयो मुनयो बभूवुः, केचिद्गृहीतकाषायाः कापिलं मतमधिजगिरे गिरिषु, केचिदाचोटितचूडामणिषु शिरःसु शरणीकृतधूर्जटयो जटा जगटिरे । अपरे परिपाटलप्रलम्बचीवराम्बरसंवीताः स्वाम्यनुरागमुज्ज्वलं चक्रुः । अन्ये तपोवनहरिणजिह्वाञ्चलोल्लिह्यमानमूर्तयो जरां ययुः । अपरे पुनः पाणिपल्लवप्रमृष्टैराताम्रागैर्नयनपुटैः कमण्डलुभिश्च वारि वहन्तो गृहीत- व्रता मुण्डा विचेलुः । पिण्डकैः शरीरैः । धमनयो नाड्यः । अनेन कार्श्यं लक्ष्यते । अधिजगिरे अध्येष्यत । आचोटित उत्खानः। धूर्जटिः शिवः । वारि अश्रु, उदकं च । स्नान करते हुए और पत्तों पर सोते हुए अपना सन्ताप मिटाने लगे, या विन्ध्याचल के प्रदेशों में जाकर पहनने या शयनादि के लिए पल्लव अर्थात् श्वेत दुकूल वस्त्रों का प्रयोग करने लगे । कुछ सन्निहित भी विषयों को छोड़ कर भोग से पराङ्मुख हो कर अल्पाहार करते हुए शून्य अटवी स्थानों में रहने लगे, या जैन साधु हो कर चान्द्रायण आदि अनेक प्रकार के व्रतों में नपा-तुला आहार लेने लगे । कुछ वायु भक्षण करते हुए कृशशरीर धर्म- धन मुनि हो गए, या सब प्रकार का आहार त्याग कर वायुभक्षण से तपश्चर्या करते हुए शरीर को सुखाने वाले दिगम्बर जैन साधु हो गए। कुछ काषाय धारण करके गिरिकन्द- राभों में कपिल मत का अध्ययन करने लगे। कुछ ने चूड़ामणि उतार कर शिव की शरण लेकर जटाएँ रख लीं, या पाशुपत शैव सम्प्रदाय में दीक्षित हो गए। कुछ लाल रंग का लम्बा चीवर पहन कर स्वामी के प्रति अपनी भक्ति प्रकट करने लगे, या लाल लम्बा चीवर (संधाटी) पहनने वाले भिक्षु स्वामी (भगवान् बुद्ध) के प्रति अपना- अपना अनुराग प्रकट करने लगे। कुछ तपोवन में आश्रम-मृगों से चाटे जाते हुए वार्धक्य को प्राप्त हुए, या गृहस्थ जीवन के बाद वैखानस हो कर वानप्रस्थ आश्रम तपोवन में व्यतीत करने लगे। कुछ ने आंसू भरे हुए लाल नेत्रों को हाथ से पोंछ कर और कमण्डलु के जल से धोकर सिर मुड़वा लिया और विविध व्रत लेकर विचरने लगे, या पाराशरा भिक्षु हो गए।