भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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२६४ हर्षचरितम् हृदयावशेषस्यापि पितुर्दाहशङ्कया शोकाग्निमिव उद्गिरन्नताम्बूलस्यापि सुचिरप्रक्षालितस्य कल्पतरुकिसलयकोमलस्येव स्वभावपाटलस्याधरस्या- धरपल्लवस्य प्रभया मांसरुधिरकवलानिव हृदयाभिघातादुद्गमन्मुष्णनिः- श्वासमोक्षैर्भवनमाजगाम । राजवल्लभास्तु भृत्याः सुहृदः सचिवाश्च तस्मिन्नेवाहनि निर्गत्य प्रियं पुत्रदारमुत्सृज्योद्वाष्पैर्बन्धुभिर्वार्यमाणा अपि बहुनृपगुणगणहृतहृदयाः केचिदात्मानं भृगुषु बबन्धुः, केचित्तत्रैव तीर्थेषु तस्थुः, केचिदनशनेरा- स्तीर्णतृणकुशा व्यथमानमानसाः शुचमसमामशमयन् , केचिच्छलभा इव वैश्वानरं शोकावेगविवशा विविशुः, केचिद्दारुणदुःखदहनदह्यमान- हृदया गृहीतवाचस्तुषारशिखरिणं शरणमुपाययुः, केचिद्विन्ध्योपत्यकासु भृगुषु प्रपातेषु । कुक्षोऽत्र संख्या । और लोगों को हटाने वाले प्रतीहारों के बिना ही वे लाए गए भी घोड़े पर सवार न हो कर पैदल ही भवन तक आए । उनकी कमल के समान लाल आँखें नासाग्र पर टिकी थीं, मानों हृदय के रूप में बचे हुए पिता के जल जाने की शंका से शोकाग्नि को बाहर निकाल रहे थे । उनका अधरपल्लव ताम्बूलरहित होने पर भी अत्यन्त स्वच्छ और कल्पवृक्ष के पल्लव के समान कोमल और स्वभावतः लाल था । उसकी प्रभा के रूप में मानों वे अपने हृदय पर पड़े हुए शोकरूपी वज्र के आघात से उष्ण श्वास लेते हुए मांस और रुधिर के ग्रास उगल रहे थे । राजा के अत्यन्त प्रिय भृत्य, मित्र और सचिव रोते हुए बन्धुओं से रोके जाने पर भी राजा के गुणों के प्रति मुग्ध हो कर अपने प्रिय पुत्र और स्त्री को छोड़ उसी दिन निकल गये । कुछ ने भृगुपतन स्थान में अपने आप को नीचे गिरा कर आत्महुति दे दी, या भृगुओं में अनुरक्त हुए । कुछ तीर्थयात्रा के लिए गए और वहीं रह गए, या कुछ विद्याध्ययन के लिए आचार्यों के पास गए और नैष्ठिक ब्रह्मचर्य का व्रत ले कर वहीं रह गए । दुखी मन वाले कुछ लोग कुश बिछा कर बैठे और आहार त्याग कर भारी शोक मिटाने लगे, या निराहार रह कर प्रायोपवेशन के द्वारा लम्बे-लम्बे उपवास करने लगे । कुछ शोक के आवेग से शलभों के समान अग्नि में प्रविष्ट हो गए, या चारों ओर अग्नि जला कर पञ्चाग्नित्यापन करने लगे । दारुण दुःख से दह्यमान हृदय वाले कुछ मौनव्रत लेकर हिमालय की शरण में चले गए, या शब्दविद्या की साधना का व्रत लेकर हिमालय में तप करने गए । कुछ विन्ध्य के समीप प्रदेशों में जंगली हाथियों की सूंड के फुहारों में