भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 340, कुल 506 में से

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पृष्ठ 340

पञ्चम उच्छ्वासः २६३ मुपगते रजनिकरे, राजतीव देवे दिवमारूढे सवितरि, परिवृत्ते राज्य इव रजनीप्रबन्धे, प्रबुद्धराजहंसमण्डलप्रबोध्यमानः पङ्कजाकर इव चचाल स्नानाय देवो हर्षः । ततश्च नूपुररवविराममूकमन्दमन्दिरहंसेषु, शोकाकुलकतिपयकञ्चुकिमात्रावशेषेषु शुद्धान्तेषु, पतितयूथप इव वनग- जयूथे, कक्ष्यान्तरवर्तिनि पितृपरिजने, विषादिन्युपरिरुदन्निषादिनि च स्तम्भनिषण्णे, निष्पन्दमन्दे राजकुञ्जरे, मन्दुरापालकाक्रन्दव्यथिते चाजि- रभाजि राजवाजिनि, विश्रान्तजयशब्दकलकले च शून्ये च महास्थान- मण्डपे दह्यमानदृष्टिर्निर्जगाम राजकुलात् । अगाच्च सरस्वतीतीरम् । तस्यां स्नात्वा पित्रे ददावुदकम् । अपस्नातश्चानिष्पीडितमौलिरेव परि- धायोद्गमनीयदुकूलवाससी निःश्वासपरो निरातपत्रो निरुत्सारणः समुप- नीतेऽपि सप्तौ चरणाभ्यामेव नासाग्रासक्तेन रक्तामरसताम्रेण चक्षुषा च्छिष्टं च । 'राजहंसास्तु ते चञ्चुचरणैर्लोहितैः सिताः' । राजहंसा इव राजानः, हंसाश्च । ततश्चेत्यादौ । अस्मिन्सति दह्यमानदृष्टिर्निर्जगाम राजकुलादिति संबन्धः । निषादी हस्तिपकः । अपस्नातइत्यादौ । भवनमाजगामेति संबन्धः । अपस्नातो मृतस्नातः । मौलयः केशाः । 'तस्यादुद्गमनीयं यद्धौतयोर्वस्त्रयोर्युगम्' । सप्तौ हये । माना राजा के शोक की जलती हुई अग्नि के कारण उसका चित्त कलंक के रूप में काला पड़ गया, या मानों स्वर्ग में गई हुई अन्तःपुर की समस्त पुरन्त्रियों के मुखचन्द्र के उद्वेग से वह भागने लगा, या मानों पहले अस्त हुई रोहिणी की उत्कण्ठा से उदास हो गया । इस प्रकार चन्द्रमा डूब गया और सूर्य आकाश में उदित हुआ । राज्य के समान रात का समय पलट गया । तब जैसे राजहंस पहले जग कर कमल को जगाते हैं उसी प्रकार कुमार जगे हुए राजाओं द्वारा जगाए जाने पर उठे । तब अन्तःपुरमें में रमणियों के नूपुररव के समाप्त हो जाने से भवन के हंस मूक और मन्द हो गए। केवल वहाँ कुछ कंचुकी ही बच रहे। कक्ष्याओं में रहने वाले पिता के परिजन उन जंगली हाथियों की तरह लगने लगे जिनका मेठ (मुखिया) न रहा। राजा का निजी हाथी आलानस्तम्भ में टिक कर विषाद में मग्न और निस्तब्ध होकर पड़ा रहा और उसका महावत रो रहा था । अश्वपाल के आर्तनाद से व्यथित हो कर राजा का निजी अश्व आंगन में पड़ा रहा। सारा महास्थान- मंडप जयजयकार के कलकल से रहित और सूना-सूना हो रहा था। देव हर्ष इन पर दृष्टिपात करते हुए राजकुल से निकले और सरस्वती के तीर पर पहुंचे। नदी में स्नान करके पिता को जल दिया । प्रेत कार्य के लिए स्नान कर सिर का पानी बिना गारे ही उन्होंने उज्ज्वल दुकूल वस्त्र धारण किए। बार-बार दीर्घ श्वास लेते रहे। बिना छत्र के