भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 339

२६२ हर्षचरितम् मध्यमानक्षीरसागरोद्गारगम्भीरा भारतीत। एतानि चान्यानि च चिन्त- यत एवास्य कथमपि सा क्षयमियाय यामिनी । ततः शुचेव मुक्तकण्ठमारटत्सु कृकवाकुकुलेषु, गृहगिरितरुशिखरेभ्यः पातयत्स्वात्मानं मन्दिरमयूरेषु, परित्यक्तनिजनिवासेषु च वनाय प्रस्थि- तेषु पत्ररथेषु, सद्यस्तनूभूते ताम्यति तमसि, मन्दीभूतात्मस्नेहेष्वभाव- माभजत्सु प्रदीपेषु, स्फुरदरुणकिरणवल्कलप्रावृतवपुषि प्रव्रज्यामिव प्रति- पन्ने नभसि, प्रभातसमयेन समुत्तीर्यमाणासु पार्थिवास्थिशकलकलास्विव कलविङ्ककंधराधूसरासु तारकासु भूभृद्धासुगर्भकुम्भधारिषु विविधसरः- सरित्तीर्थाभिमुखेषु प्रस्थितेषु वनकरिकुलेषु, शावशूचिसिकथपटल- पाण्डुरे पिण्ड इवापरपयोनिधिपुलिनपरिसरे पात्यमाने शशिनि, क्रमेण च नृपचितानलधूमविसरधूसरीकृततेजसीव, नरपतिशोकपावक- दाहकिरणकलङ्ककालीकृतचेतसीव, प्रोषितसमस्तान्तःपुरपुरंधिमुखचन्द्र- वृन्दोद्वेगविद्राणवपुषीव, प्रथमास्तमितरोहिणीरणरणकविमनसीव चास्त- ततः शुचेत्यादौ । चचाल स्नानाय देवो हर्ष इति संबन्धः । शुचेवेति । गृहे गिर्यादौ योज्यम् । स्नेहः प्रेम, तैलं च । अरुणो रविसारथिः, लोहितं चारुणम् । कलविङ्को ग्रामचटकः । भूभृद्गिरिः, राजा च । धातवो लघ्वन्यस्थीनि, गैरिकाद्याश्च । कुम्भौ कपाटौ, घटश्च कुम्भः । शावे धूसरे शवसंबन्धिनि च । सिक्थं भक्तम्, मधू- हुए उनकी अमृतरस का उद्विरण करती हुई, मथे जाते हुए समुद्र के निकले उद्गार के समान गम्भीर वाणी बार-बार सुन पड़ती' इस तरह और अन्य प्रकार की चिन्ता करते करते किसी प्रकार वह रात बीत गई। तत्पश्चात् मानों शोक से मुर्ग गला फाड़कर टर्राने लगे। भवन के मयूर कृत्रिम पर्वतों के वृक्षों से अपने को गिराने लगे। हंस अपना-अपना स्थान छोड़ कर वन के लिए प्रस्थान करने लगे । तुरंत ही कृश होकर अंधकार दुखी होने लगा । अपने स्नेह (तैल या प्रेम) के कम पड़ जाने से प्रदीप बुझने लगे । अरुण की लाल किरण का वल्कल ओढ़ कर मानों आकाश ने सन्यास ले लिया। कलविंक पक्षी की कंधरा के समान धूसर वर्ण वाले तारे सम्राट के फूल के समान उतरने लगे। राजा के फूल (अस्थिशेष) से युक्त कलश को लेकर विविध सरोवरों, नदियों और तीर्थों की ओर हाथी चल पड़े। प्रेत के लिए पवित्र भात के उजले पिण्डे के समान चन्द्रमा पश्चिम समुद्र के तट के पुलिन पर लुढ़का दिया गया। क्रम से चन्द्रमा का तेज मानों राजा के चितानल के धूमसमूह के फैलने से मंद पड़ गया, या