हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 338, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चम उच्छ्वासः २६१ पिता, प्रोषिताः पुरुषकारविहारविकाराः, समाप्ता समरशौण्डता, ध्वस्ता परगुणप्रीतिः, विश्रान्ता विश्वासभूमयः, अपदान्यपदानानि, निरुपयोगानि शास्त्राणि, निरवलम्बना विक्रमैकरसता, कथावशेषा विशेषज्ञता, ददातु जनो जलाञ्जलिमौर्जित्याय, प्रतिपद्यतां प्रव्रज्यां प्रजापालता, बध्नातु वैधव्यवेणीं वरमनुष्यता, समाश्रयतु राजश्रीराश्रमपदम्, परिधत्तां धवले वाससी वसुमती, वहतु वल्कले विलासिता, तपस्यतु तपोवनेषु तेजस्विता, प्रावृणोतु चीवरे वीरता, क्व गम्यतां पुनस्तस्य कृते कृतज्ञतया, क्व पुनः प्राप्स्यति तादृशान्महापुरुषनिर्माणपरमाणून्परमेष्ठी, शून्याः संवृत्ता दश दिशो गुणानाम् , जगज्जातमन्धकारं धर्मस्य, निष्फलमधुना जन्म शस्त्रोपजीविनाम् । तातेन विना कुतस्त्यास्तादृश्यो दिवसमसम- समररससमारब्धकलहकथाकण्टकितसुभटकपोलभित्तयो वीरगोष्ठ्यः । अपि नाम स्वप्नेऽपि दृश्येत दीर्घरक्तनयनं पुनस्तन्मुखसरोजम् , जन्मा- न्तरेऽपि पुनः परिष्वज्येत तल्लोहस्तम्भाभ्यधिकगरिमगर्भं भुजयुगलम् । लोकान्तरेऽपि पुत्रेत्यालपतः पुनः पुनः श्रूयेत सा सुधारसमुद्रिरन्ती प्रावृणोतु परिदधातु । कलहो रणः । बंद हो गए । सत्यवादिता सो गई । संसार के काम-काज लुप्त हो गए । बाहु का वीर्य विलीन हो गया । प्रिय बातचीत खत्म हो गई । दूसरे के गुणों के प्रति प्रेम ध्वस्त हो गया । विश्वास के पात्र जन नहीं रहे । अपदानों (वीरता के विलक्षण कार्य) के लिये कोई स्थान न रहा । शास्त्रों की कोई उपयोगिता न रही । पराक्रम के प्रति एकरसता निराधार हो गई । विशेषज्ञता सिर्फ कहने के लिए रह गई । अब लोग तेजस्विता को जलांजलि दे दें । प्रजापालन के कर्म संन्यास ले लें । श्रेष्ठ मनुष्यता वैधव्य की वेणी बांध ले । राजलक्ष्मी आश्रम में जाकर निवास करे । पृथिवी उज्ज्वल वस्त्रयुगल पहन ले । विलासिता वल्कल धारण कर ले । तेजस्विता तपोवन में जा कर तपस्या करे । वीरता चीवर ओढ़ ले । कृतज्ञता उनके बदले फिर कहाँ जाय ? ब्रह्मा उस प्रकार के महापुरुषों के निर्माण के लिए परमाणुओं को फिर से कहाँ पाएगा ? गुणों के लिए सारी दिशाएं शून्य हो गईं । धर्म के लिए अन्धकार बन गया । शस्त्रोपजीवी लोगों का जन्म अब निष्फल हो गया । तात के बिना वीरों की वे गोष्ठियां, जिनमें अपूर्व समर- रस के कारण कलह के सम्बन्ध की बातचीत से वीरों के कपोल पर रोमाञ्च हो उठता था, कहाँ की रह गईं ? काश, स्वप्न में भी दीर्घ और लाल नेत्रों वाला उनका मुख-कमल फिर से दीख जाता ! जन्मान्तर में भी फिर से लोहे के स्तम्भ के समान उनका भुज- युगल हमारा आलिङ्गन करता ! लोकान्तर में भी बार-बार 'पुत्र-पुत्र' पुकारते