भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 337, कुल 506 में से

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२६० हर्षचरितम् अवतरत्रिदशविमानकिङ्किणीक्वणित इव श्रूयमाणे शाखिशिखरकुलायली- यमानशकुनिकुलकूजिते, नाकपथप्रस्थितपार्थिवप्रत्युद्गतपुरुहूतातपत्र इव पूर्वस्यां दिशि दृश्यमाने चन्द्रमसि, नरेन्द्रः स्वयं समर्पितस्कन्धैर्गृहीत्वा शवशिविकां शिबिसमः सामन्तैः पौरैश्च पुरोहितपुरःसरैः सरितं सरस्वतीं नीत्वा नरपतिसमुचितायां चितायां हुताशसत्क्रियया यशःशेषतामनीयत । देवोऽपि हर्षः पुञ्जीभूतेन सकलेनेव जीवलोकेन लोकेन राजकुलसंब- द्धेनाशेषेण शोकमूकेन परिवृतोऽन्तर्वर्तिनापि शोकानलतमेन स्नेहद्रवेण बहिरिव सिच्यमानो निर्व्यवधानायां धरण्यामुपविष्ट एव तां निशीथिनीं भीमरथीभीमामखिलां सराजको जजागार । अजनि चास्य चेतसि-ताते दूरीभूते संप्रत्येतावान्खलु जीवलोकः, लोकस्य भग्नाः पन्थानः, मनो- रथानां खिलीभूतानि भूतिस्थानानि, स्थगितान्यानन्दस्य द्वाराणि, सुप्ता सत्यवादिता, लुप्ता लोकयात्रा, विलीना बाहुशालिता, प्रलीना प्रियाला- काष्ठदन्तवत्तस्य चामलं पत्रम् । कर्णिका कर्णाभरणं च । केसरशब्दः किंजएकबकुलयोः । शिबिर्नाम राजर्षिरभूत् । निशीथिनीं रात्रिम् । भीमरथी नरकनदी, कालरात्रीर्वा । अन्ये तु सप्तसप्तत्या वर्षैस्तत्संख्यैश्च मासैर्दिनैश्च तावद्भिर्गतैरेका रात्रिर्भीमरथी भवति, तामतिक्रान्तो वर्षशतजीवी नरो भवतीति प्राहुः । जीवलोकः संसारः । खिलीभूतानि शून्यानि । लोकयात्रा व्यवहारः । दो गईं । उतरते हुए देव-विमान की किंकिणियों की आवाज के समान वृक्षों के शिखर पर घोंसलों में बैठते हुए पक्षी चहचहाने लगे । स्वर्ग-मार्ग में प्रस्थान किए हुए राजा के स्वागत में सिंहासन से उठे छत्र की भाँति पूर्व दिशा में चन्द्र दिखाई देने लगा । उसी समय पुरोहितों के आगे आगे सामन्तों और पुरवासियों ने स्वयं अपने कंधे लगा कर अरथी को उठाया और सरस्वती नदी के तीर पर ले जाकर सजाई गई चिता में अग्नि- संस्कार करके राजा को यशःशेष कर दिया । देव हर्ष ने भी मानों सारे संसार के एकत्र हुए राजकुल से सम्बद्ध उन लोगों के साथ जो शोक के कारण चुपचाप थे, घिर कर, मानों भीतरी भी शोकानल से तप्त स्नेह के द्रव से बाहर सिंचे हुए, बिना बिछाए खरहने जमीन पर बैठे ही बैठे राजाओं के साथ नरक की नदी के समान भयंकर उस कालरात्रि को जगे हुए व्यतीत किया । वे मन में सोचने लगे-'तात के चले जाने पर यह विशाल जीवलोक अनाथ हो गया । लोक की मर्यादाएँ भग्न हो गईं । मनोरथों के उत्पन्न होने के स्थान नहीं रहे । आनन्द के द्वार

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