हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चम उच्छ्वासः २८६ र्दीकृत इव निर्वात्यातपे, रोदनताम्रसकललोकलोचनरुचेव लोहितायति जगति, उष्णायमानानेकनरनिःश्वाससंतापप्लुष्ट इव च नीलायमाने दिवसे, नृपानुगमनप्रचलितयेव लक्ष्म्या मुच्यमानासु कमलिनीषु, पति- शुचेव परिवृतच्छायायां श्यामायमानायां भुवि, कुलपुत्रेष्विव परित्यक्त- कलत्रेषु कृतकरुणप्रलापेषु वनान्तानाश्रयत्सु दुःखितेषु चक्रवाकेषु, छत्र- भङ्गभीतेष्विव निगूढकोशेषु कुशेशयेषु, स्फुटितदिग्वधूहृदयरुधिरपटलप्लव इव गलिते रक्तात्पे, क्रमेण च लोकान्तरमुपगतवत्यनुरागशेषे जाते तेजसामधीशे, गगनतलवितन्यमानबहलरागपाटलायां प्रेतपताकायामिव प्रवृत्तायां संध्यायां, शवशिविकालंकारकृष्णचामरमालास्विव स्फुरन्तीषु दर्शनप्रतिकूलासु तिमिरलेखासु, असितागुरुकलकाष्ठायां केनापि चिता- यामिव रचितायां रजन्यां, दन्तामलपत्रप्रसाधितकर्णिकासु केसरमाला- कल्पितमुण्डमालिकासु, अनुमर्तुमिवोद्यतासु प्रहसितमुखीषु कुमुदलक्ष्मीषु, ह्मानं वर्धमानम् । निर्वात्य शाम्यति सति । यश्चार्द्रीकृतः सोऽवश्यं निर्वाति शीतलीभवति । छायातपप्रतिपक्षजातिः, कान्तिश्च । श्यामा रात्रिः, नायिका च । वनं तोयम्, विपिनं च । छत्रभङ्गो राजदण्डः, पत्राणां च छत्राकारताभेदः । कोशो गञ्जः, कर्णिका च । अनुरागो भक्तिः, लौहित्यं च । तेजसामधीशो राजापि । शव- शिविका मृतयानम् । चामरमाला अपि दर्शनप्रतिकूलाः । काष्ठा दिशः, दारु च । अनेक लोगों की गरम सांस के संताप से झुलस कर मानों दिन नील वर्ण का होने लगा । मानों राजा के पीछे-पीछे चल पड़ी लक्ष्मी ने कमलिनियों को छोड़ दिया । छाया से ढंकी हुई पृथिवी मानों पति के शोक में श्याम होने लगी । कुलपुत्रों की भाँति चक्रवाकों ने दुखी हो कर अपने कलत्र का त्याग कर दिया और करुण रोदन करने लगे एवं वनों में जाकर बसेरा लिया । कमलों ने मानों राजा के विनाश से डर कर अपने कोश (धनराशि या बीजकोश) को छिपा लिया । दिग्वधुओं के फटे हुए हृदय की रुधिर की धार के समान रक्तात्प विगलित होने लगा । क्रम से अनुरागशेष होकर सूर्य लोकान्त में चला गया । आकाशमण्डल में गहरा लाल वर्ण वाली संध्या प्रेतों की पताका के समान फैल गई । शव-शिविका (अरथी) में शोभा के लिए लगाए गए काले चंवरों की मालाओं के समान दर्शन के अयोग्य अन्धकार की लेखाएँ स्फुरित होने लगीं । अगुरु वृक्ष के काले काष्ठों से मानों किसी ने रजनी के रूप में चिता का निर्माण किया । कुमुदलक्ष्मियाँ निर्मल पत्र रूपी दन्तपत्र और कर्णिका (बीजकोशरुपी कर्णांलंकार) से प्रसाधन कर एवं केसर (पराग, बकुल) की मुण्डमाला पहन कर अनुमरण के लिए हँसते-हँसते तैयार १६ ह० च०