भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 335, कुल 506 में से

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पृष्ठ 335

, २८८ हर्षचरितम् जातम्' इति नूतनतरवयसि निगृहीतेन्द्रियस्य निरवकाशेव मे वाणी । ‘निरवशेषतां शत्रवो नेयाः' इति सहजस्य तेजस एवेयं चिन्ता ।” इत्येवं वदन्नेवापुनरुन्मीलनाय निमिमील राजसिंहो लोचने प्रत्यपद्यत च पूषात्मजः । अस्मिन्नेवान्तरे पूषाप्यायुषेव तेजसा व्ययुज्यत ततश्च लज्जमान इव नरपतिजीवितापहरणजनितादात्मजापराधादधोमुखः समभवत् । भूपा- लाभावशोकशिखिनेवान्तस्ताप्यमानस्ताम्रतां प्रपेदे । मन्दं मन्दमप्रियप्र- श्नार्थमिव लौकिकीं स्थितिमनुवर्तमानोऽवातरद्दिवः । दित्सुरिव जनेशाय जलाञ्जलिमपरजलनिधिसमीपमुपससर्प । सद्योदत्तजलाञ्जलिर्दुःखदहन- दग्धमिव करसहस्रमालोहितमाधत्त । एवं च महानराधिपनिधननिधीयमानविपुलवैराग्य इव शान्तवपुषि, विशति गिरिगुहागह्वरं गभस्तिमालिनि, समुपोह्यमानमहाजनाश्रुदुर्दिना- अपुनरुन्मीलनाय पुनरप्रबोधनाय । निमिमील न्यमीलयत । पूष्ण आत्मजो यमः । प्रत्यपद्यत प्राप्तः । एवं चेत्यादौ । अस्मिन्सति नरेन्द्रो हुताशनसक्रियया यशःशेषतामनीयतेति संबन्धः । गभस्तीनरश्मीन्मलते धारयतीति गभस्तिमाली सूर्यस्तस्मिन् । समुपो- आदेश क्या देना है ? 'चपलताओं पर निग्रह करना' यह बात नवीनतर इस वय में इन्द्रियों को वश में रखने वाले तुम्हारे लिए घटती नहीं । 'अपने शत्रुओं को समाप्त करना' यह सहज तेज वाले तुम्हारे लिए अफसोस की बात है ।” यह कहते-कहते ही राजा ने हमेशा के लिए आँखें बन्द कर लीं और यम पहुंच आया । इसी बीच सूर्य भी आयु की भांति अपने तेज से रहित हो गया और मानों राजा के प्राण हरने से उत्पन्न अपने पुत्र यम के अपराध के कारण मुंह नीचा करके लज्जित होने लगा । राजा के अभाव के शोकानल से मानों भीतर ही भीतर संतप्त होते हुए ताम्र वर्ण का हो गया । लोकमर्यादा के अनुसार इस अप्रिय समाचार को पूछने के लिए ( राजा की मृत्यु कैसे हुई ? ) धीरे-धीरे आकाश से उतर गया । मानों मरे हुए राजा को जलांजलि देने के लिये पश्चिम समुद्र के समीप पहुँचा, शीघ्र जलांजलि दी और मानों दुःख की अग्नि से जल जाने से लाल अपने हजारों करों ( हाथों या किरणों ) को धारण किया । इस प्रकार महाराज के कारण अत्यन्त वैराग्य करके शान्त भाव से सूर्य ने पर्वत की कन्दरा में प्रवेश किया । बड़े लोगों के अश्रु की निरन्तर वर्षा से आतप ठंडा पड़ गया । समस्त लोगों के रोने से लाल नेत्रों की कान्ति से मानों संसार लाल वर्ण का हो गया ।

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