भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पञ्चम उच्छ्वासः २८७ सत्त्ववतां चाग्रणीः सर्वातिशायाश्रितः क भवान् , क वैक्लव्यम् ? 'कुल- प्रदीपोऽसि' इति दिवसकरसदृशतेजसस्ते लघूकरणमिव । 'पुरुषसिंहो- ऽसि' इति शौर्यपटुप्रज्ञोपबृंहितपराक्रमस्य निन्देव । 'क्षितिरियं तव' इति लक्षणाख्यातचक्रवर्तिपदस्य पुनरुक्तमिव । 'गृह्यतां श्रीः' इति स्वयमेव श्रिया परिगृहीतस्य विपरीतमिव । 'अध्यास्यतामयं लोकः' इत्युभयलोक- विजिगीषोरपुष्कलमिव । 'स्वीक्रियतां कोश' ज्ञातं शशिकरनिकरनिर्मल- यशःसंचयैकाभिनिवेशिनो निरुपयोगमिव । 'आत्मीक्रियतां राजकम्' इति गुणगणात्मीकृतजगतो गतार्थमिव । 'उह्यतां राज्यभारः' इति भुवन- त्रयभारवहनोचितस्यानुचितनियोग इव । 'प्रजाः परिरक्ष्यन्ताम्' इति दीर्घदोर्दण्डार्गलितदिक्मुखस्यानुवाद इव । 'परिजनः परिपाल्यताम्' इति लोकपालोपमस्यानुषङ्गिकमिव । 'सातत्येन शस्त्राभ्यासः कार्यः' इति धनुर्गुणकिणकलङ्ककालीकृतप्रकोष्ठस्य किमादिश्यते । 'निग्राह्यतां चापल- राजान्वयिता । कुलप्रदीपोऽसीत्यादौ पूर्ववदाक्षेपाभ्यूहः । आनुषङ्गिकं प्रस्तावागतम् । सत्त्वता ही लोक का पहला आलम्बन है, फिर राजपुत्रता । सत्त्ववान् लोगों के अग्रणी और सब में बढ़े चढ़े कहाँ तुम और कहाँ यह व्याकुलता ? 'तुम कुल के दीपक हो' यह कहना सूर्य सदृश तेजस्वी तुम्हे कम करने के समान है। 'तुम पुरुषसिंह हो' यह कहना शौर्य और प्रखर बुद्धि द्वारा बढ़े हुए पराक्रम वाले तुम्हारी निन्दा के समान है। 'यह पृथिवी तुम्हारी है' यह कहना लक्षण से ही जाने गए चक्रवर्ती के पद वाले तुम्हारे लिए दुहराने के समान है। 'श्री का ग्रहण करो' यह कहना स्वयं ही श्री के द्वारा स्वीकार किए गए तुम्हारे विपरीत है। 'इस संसार में राज्य करो' यह कहना दोनों लोकों को जीतने की इच्छा रखने वाले तुम्हारे लिए पर्याप्त नहीं । 'खजाने को स्वीकार करो' यह कहना चन्द्र की किरणों के समान निर्मल यशसमूह का ही एक अभिनिवेश रखने वाले तुम्हारे लिए किसी उपयोग का नहीं। 'राजसमूह को अपनाओ' यह कहना अपने गुणों से संसार को अपनाने वाले तुम्हारे लिए कोई नई बात नहीं। 'राज्यभार का वहन करो' यह कहना तीनों भुवन के भारवहन करने योग्य तुम्हारे लिए अनुचित आज्ञा है। 'प्रजाओं की रक्षा करो' यह कहना अपने लम्बे भुजदण्ड से दिशाओं को रोक रखने वाले तुम्हारे लिए अनुवाद मात्र है। 'परिजन की रक्षा करो' यह कहना लोकपालों के सदृश तुम्हारे लिए आनुषङ्गिक है। 'नियम से शस्त्राभ्यास करना' यह कहना धनुष की डोर की रगड़ खाने से काले प्रकोष्ठ वाले तुम्हारे लिए