भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 333

२८६ हर्षचरितम् पुरातपौराक्रन्दप्रतिशब्दनिर्भराभिरुपरुध्यमानेव दिग्भिः सरस्वतीतीरं ययौ । तत्र च स्त्रीस्वभावकातरैर्दृष्टिपातैः प्रविकसितरक्तपङ्कजपुञ्जैरिवार्च- यित्वा भगवन्तं भानुमन्तमिव मूर्तिरैन्दवी चित्रभानुं प्राविशत् । इतरोऽपि मातृमरणविह्वलो बन्धुवर्गपरिवृतः पितुः पार्श्वं प्रायात् । अपश्यच्च स्वल्पा- वशेषप्राणवृत्तिं परिवर्त्यमानतारकं तारकराजमित्रास्तमभिलषन्तं जनयि- तारम् । असह्यशोकोद्रेकाभिद्रुतश्च त्याजितः स्नेहेन धैर्यम् । आश्‍लिष्यास्य सकलदुर्मदमहीपालमौलिमालालालितौ पादपद्मावन्तस्तापान्मुखचन्द्र- मिव द्रवीभवन्तं दशनज्योत्स्नाजालमिव जलतामापद्यमानं लोचनलाव- ण्यमिव विलीयमानं मुखसुधारसमिव स्यन्दमानम् , अच्छाच्छमश्रुस्रो- तसां संतानं महामेघमयविलोचन इव वर्षन्नितरवद्विमुक्तारावश्चिरं रुरोद । राजा तु तमुपरुध्यमानदृष्टिरविरतरुदितशब्दाश्रितश्रवणः प्रत्यभिज्ञाय शनैः शनैरवादीत्— “पुत्र ! नार्हस्येवं भवितुम् । भवद्विधा न ह्यमहा- सत्त्वाः । महासत्त्वता हि प्रथममवलम्बनं लोकस्य पश्चाद्राजजीविता । अमावास्यायामिन्दुर्भानुमन्तं प्रविशतीति प्रसिद्धम् । चित्रभानुमग्निम् । तारक- राजं चन्द्रम् । असह्यस्यादौ चिरं रुरोदेति संबन्धः । उद्रेक आधिक्यम् । उपरुध्यमाना उपरोधवती दृष्टिर्बुद्धिर्यस्य सः । अवलम्बनमाश्रयः । राजजीविता रोकी जाने पर भी सरस्वती के तीर पर आ गई । वहाँ स्त्रीस्वभाव के कारण अपनी कातर दृष्टियों के कमलों से अर्चना करके भगवान् अग्निदेव में उस प्रकार प्रवेश किया जैसे चन्द्रमा की कला सूर्य में प्रवेश करती है । माता के मरण से विह्वल हर्ष भी बन्धुओं के बीच घिर कर पिता के समीप पहुँचे । जिनके प्राण कुछ-कुछ बच रहे थे और जो आँखें तरेरते जा रहे थे ऐसे पिता को अस्त होना ही चाहते हुए चन्द्रमा के समान देखा । असह्य शोक के आवेग से अभिभूत हो जाने से स्नेह के कारण उनका धैर्य टूट गया । समस्त दुर्मद राजाओं की मौलिमाला से लालित पिता का चरणकमल पकड़ कर बैठ गए । ताप के कारण मानों उनका मुखचन्द्र द्रवीभूत हो रहा था, या दाँतों की ज्योत्स्ना ही जल बनती जा रही थी, या आँखों का सौन्दर्य पिघल रहा था, या मुख का अमृतरस ही टपक रहा था, इस प्रकार वे महामेघ के समान अपनी आँखों से आँसू का प्रवाह बरसाने लगे और पुका फाड़ कर देर तक रोते रहे । राजा की दृष्टि मुंद गई थी, फिर भी हमेशा कुमार के रोने की आवाज के कान में आने से जान कर वे धीरे-धीरे बोले—‘पुत्र, ऐसे न बनो । तुम महासत्त्व हो । महा-