हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चम उच्छ्वासः २८५ मरणाच्च मे जीवितमेवास्मिन्समये साहसम् । अतिशीतलः पतिशोका- नलादक्षयस्नेहेन्धनादस्मादनलः । कैलासकल्पे प्रवसति जीवेश्वरे जरत्तृण- कणिकालघीयसि जीविते लोभ इति क घटते ? अपि च जीवन्तीमपि मां नरपतिमरणावधीरणमहापातकिनीं न स्पृश्यन्ति पुत्र ! पुत्रराज्य- सुखानि । दुःखदग्धानां च भूतिरमङ्गला चाप्रशस्ता च निरुपयोगा च भवति । वत्स ! विश्वस्तानां यशसा स्थातुमिच्छामि लोके न वपुषा । तदहमेव त्वां तावत्तात ! प्रसादयामि न पुनर्मनोरथप्रतिकूल्येन कदर्थ- नीयास्मि ।' इत्युक्त्वा पादयोरपतत् । स तु ससंभ्रममपनीय चरणयुगलमवनमिततनुरुभयकरविधृतवपुष- मवनितलगतशिरसमुदनमयनमातरम् । दुर्निवारतां च शुचः समवधार्य कुलयोषिदुचितां च तामेव श्रेयसीं मन्यमानः क्रियां कृतनिश्चयां च तां ज्ञात्वा तूष्णीमधोमुखोऽभवत् । अभिनन्दति हि स्नेहकातरापि कुलीनता देशकालानुरूपम् । देव्यपि यशोमती परिष्वज्य समाघ्राय च शिरसि निर्गत्य चरणाभ्यामेव चान्तः- भूतिः समृद्धिः, भस्म च । विश्वस्तानां विधवानाम् । नहीं होता एस पति के इस शोकानल से कहीं चिता की आग शीतल है । कैलास के सदृश प्राणनाथ जब प्रवास कर रहे हैं तो पुराने तृण के टुकड़े की तरह तुच्छ जीवन के लिए लोभ की बात कहाँ घटती है ? हे पुत्र ! पुत्र के राज्यसुख राजा के मरण के तिरस्कारजन्य पातक वाली जीती हुई भी मुझे स्पर्श नहीं करेंगे । जो दुःख से जल चुके हैं उनके लिए ऐश्वर्य अमंगल, अप्रशस्त और उपयोगरहित होता है । हे वत्स, मैं विधवाओं के यश से इस लोक में रहना चाहती हू, शरीर से नहीं । इसलिए मैं ही तुम्हें मनाती हूँ कि फिर मेरी इच्छा के प्रतिकूल मुझे दुःखी न करना ।' यह कह कर पैर पर गिर गई । कुमार हर्ष ने शीघ्र अपने पैर हटा लिए और झुक कर दोनों हाथों से पकड़ लिया और सिर से जमीन पर टिकी हुई माता को उठा लिया । उन्होंने निश्चय किया कि शोक का हटाना कठिन है । कुलाङ्गनाओं के लिए उचित उसी क्रिया को उन्होंने श्रेयस्कर माना । माता को दृढ़प्रतिज्ञ जानकर चुपचाप अधोमुख हो रहे । कुलीन लोग स्नेह से व्याकुल होकर भी देशकाल के अनुरूप आचार का अभिनन्दन करते हैं । देवी यशोमती ने पुत्र का आलिङ्गन कर और सिर सूंघ कर अन्तःपुर से पैदल ही निकल गई और पुरवासियों के आर्तनाद से प्रतिध्वनित दिशाओं से मानो