हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
वनकरिकुलकरशीकरासारसिच्यमानतनवः पल्लवशयनशायिनः संतापम- शमयन्, केचित्संनिहितानपि विषयानुत्सृज्य सेवाविमुखाः परिच्छिन्नैः पिण्डकैरटवीभुवः शून्या जगृहुः, केचित्पवनाशना धर्मधना धमद्धमनयो मुनयो बभूवुः, केचिद्गृहीतकाषायाः कापिलं मतमधिजगिरे गिरिषु, केचिदाचोटितचूडामणिषु शिरःसु शरणीकृतधूर्जटयो जटा जगटिरे । अपरे परिपाटलप्रलम्बचीवराम्बरसंवीताः स्वाम्यनुरागमुज्ज्वलं चक्रुः । अन्ये तपोवनहरिणजिह्वाञ्चलोल्लिह्यमानमूर्तयो जरां ययुः । अपरे पुनः पाणिपल्लवप्रमृष्टैराताम्रागैर्नयनपुटैः कमण्डलुभिश्च वारि वहन्तो गृहीत- व्रता मुण्डा विचेलुः । पिण्डकैः शरीरैः । धमनयो नाड्यः । अनेन कार्श्यं लक्ष्यते । अधिजगिरे अध्येष्यत । आचोटित उत्खानः। धूर्जटिः शिवः । वारि अश्रु, उदकं च । स्नान करते हुए और पत्तों पर सोते हुए अपना सन्ताप मिटाने लगे, या विन्ध्याचल के प्रदेशों में जाकर पहनने या शयनादि के लिए पल्लव अर्थात् श्वेत दुकूल वस्त्रों का प्रयोग करने लगे । कुछ सन्निहित भी विषयों को छोड़ कर भोग से पराङ्मुख हो कर अल्पाहार करते हुए शून्य अटवी स्थानों में रहने लगे, या जैन साधु हो कर चान्द्रायण आदि अनेक प्रकार के व्रतों में नपा-तुला आहार लेने लगे । कुछ वायु भक्षण करते हुए कृशशरीर धर्म- धन मुनि हो गए, या सब प्रकार का आहार त्याग कर वायुभक्षण से तपश्चर्या करते हुए शरीर को सुखाने वाले दिगम्बर जैन साधु हो गए। कुछ काषाय धारण करके गिरिकन्द- राभों में कपिल मत का अध्ययन करने लगे। कुछ ने चूड़ामणि उतार कर शिव की शरण लेकर जटाएँ रख लीं, या पाशुपत शैव सम्प्रदाय में दीक्षित हो गए। कुछ लाल रंग का लम्बा चीवर पहन कर स्वामी के प्रति अपनी भक्ति प्रकट करने लगे, या लाल लम्बा चीवर (संधाटी) पहनने वाले भिक्षु स्वामी (भगवान् बुद्ध) के प्रति अपना- अपना अनुराग प्रकट करने लगे। कुछ तपोवन में आश्रम-मृगों से चाटे जाते हुए वार्धक्य को प्राप्त हुए, या गृहस्थ जीवन के बाद वैखानस हो कर वानप्रस्थ आश्रम तपोवन में व्यतीत करने लगे। कुछ ने आंसू भरे हुए लाल नेत्रों को हाथ से पोंछ कर और कमण्डलु के जल से धोकर सिर मुड़वा लिया और विविध व्रत लेकर विचरने लगे, या पाराशरा भिक्षु हो गए।
२६६ हर्षचरितम्
देवमपि हर्षं तदवस्थं पितृशोकविह्वलीकृतम् , श्रियं शाप इति, महीं महापातकमिति, राज्यं रोग इति, भोगान्भुजङ्गा इति, निलयं निरय इति, बन्धुं बन्धनमिति, जीवितमयश इति, देहं द्रोह इति, कल्यतां कलङ्क इति, आयुरपुण्यफलमिति, आहारं विषमिति, विषममृतमिति, चन्दनं दहन इति, कामं क्रकच इति, हृदयस्फोटनमभ्युदय इति च मन्यमानम् , सर्वासु क्रियासु विमुखम् , पितृपितामहपरिग्रहागताश्चिर- न्तनाः कुलपुत्राः, वंशक्रमाहितगौरवाश्च ग्राह्यगिरो गुरवः, श्रुतिस्मृतीति- हासविशारदाश्च जरद्विजातयः, श्रुताभिजनशीलशालिनो मूर्धाभिषिक्ता- श्चामात्या राजानो, यथावदधिगतात्मतत्त्वाश्च संस्तुता मस्करिणः, सम- दुःखसुखाश्च मुनयः, संसारासारत्वकथनकुशला ब्रह्मवादिनः, शोकापनय- ननिपुणाश्च पौराणिकाः पर्यवारयन् ।
अस्वतन्त्रीकृतश्च तैर्मनसापि नालभत शोकानुप्रवणमाचरितुम् ।
देवमित्यादौ। देवमपि हर्षमेवंविधा जनाः पर्यवारयन्निति संबन्धः। कल्यता- मरोगिताम् । ग्राह्यगिर आदेयवाचः । अध्यात्ममात्मज्ञानम् । तत्त्वमितिकर्तव्यता । मस्करिणः परिव्राजकाः ।
देव हर्ष भी पिता के शोक में विह्वल चित्त से तदवस्थ पड़े थे । वे श्री को शाप, पृथिवी को महापातक, राज्य को रोग, भोग-विलास को सर्प, घर को नरक, बन्धुजन को बंधन, जीवन को अयश; देह को द्रोह, आरोग्य को कलंक, आयु को अपुण्य का फल, भोजन को विष, विष को अमृत, चन्दन को अग्नि, काम को करपत्र और हृदय के फटने को अभ्युदय मान बैठे । उन्होंने सब कार्यों से मुँह मोड़ लिया । पिता-पितामह की कुल- परम्परा के पुराने कुलपुत्रों ने श्रुति, स्मृति, इतिहास के ज्ञाता वृद्ध ब्राह्मणों ने, ज्ञान, कुल और शील से युक्त अमात्य पद के अधिकारी राजाओं ने, आत्मतत्त्व को ठीक प्रकार से अधिगत करने वाले प्रसिद्ध मस्करी साधुओं ने, सुख-दुःख को एक-सा समझने वाले मुनियों ने, संसार की असारता का उपदेश करने वाले ब्रह्मवादी शांकर वेदान्त के अनुयायियों ने और शोक को कम करने में निपुण पौराणिकों ने आकर उन्हें घेर लिया । उन लोगों के द्वारा समझाने-बुझाने से हर्ष ने शोक की वेदना को मन से भी अनुभव
पञ्चम उच्छ्वासः २६७ प्रचुरमित्रानुनीयमानश्च सनाभिभिः कथं कथमप्याहारादिकासु क्रियास्वा- भिमुख्यमभजत । भ्रातृगतहृदयश्चाचिन्तयत्—'अपि नाम तातस्य मरणं महाप्रलयसदृशमिदमुपश्रुत्य आर्यो बाष्पजलस्नातो न गृह्णीयाद्वल्कले । नाश्रयेद्वा राजर्षिराश्रमपदम् । न विशेद्वा पुरुषसिंहो गिरिगृहाम् । अश्रु- सलिलनिर्भरभरितनयननलिनयुगलो वा पश्येदनाथां पृथिवीम् । प्रथम- व्यसनविषमविह्वलः स्मरेदात्मानं वा पुरुषोत्तमः । अनित्यतया जनित- वैराग्यो वा न निराकुर्यादुपसर्पन्तीं राज्यलक्ष्मीम् । दारुणदुःखदहनप्र- ज्वलितदेहो वा प्रतिपद्येताभिषेकम् । इहागतो वा राजभिरभिधीयमानो न पराचीनतामाचरेदिति । अतिपितृपक्षपाती खल्वार्यः । सर्वदा तात- श्लाघया मामभिधत्ते—तात हर्ष ! कस्यचिदभूद्भविष्यति वा पुनः काञ्च- सनाभयः सगोत्राः । शौचानुप्रवणं शरीरबाधादि । बाष्पजलस्नातो न गृह्णी- याद्वल्कले इति प्रतीयमानता बोद्धव्या । अत्र च सर्वत्र नेत्याशङ्कायाम् । पुरुषोत्तमो हर्षः, हरिरपि । पराचीनता पराङ्मुखत्वम्, अनानुकूल्यं वा । करने का अवसर नहीं प्राप्त किया। बहुत मित्रों के समझाने पर वे किसी किस प्रकार आहार आदि कार्यों में प्रवृत्त हुए। बड़े भाई राज्यवर्धन का स्मरण करके सोचने लगे—'कहीं ऐसा न हो कि तात के महाप्रलय के सदृश इस मरणवृत्तान्त को सुन कर भार्य रोते हुए वल्कल धारण कर लें। कहीं राजर्षि वह किसी आश्रम में प्रविष्ट न हो जाँय । कहीं पुरुष-सिंह वे गिरिकन्दरा में न चले जाँय । कहीं वे इस पृथिवी को अनाथ देख कर नेत्रों से निरन्तर अश्रुधारा प्रवाहित न करने लगें । कहीं श्रेष्ठ मनुष्य वे दुःख की पहली चोट से घबरा कर आत्मचिन्तन में न लग जाँय । कहीं संसार की अनित्यता से वैराग्यवान् हो कर आती हुई राज्यलक्ष्मी से विमुख न हो जाँय । कहीं दारुण दुःखरूपी अग्नि से सन्तप्त हो कर जल में डूबने न लगें। अथवा यहाँ आकर राजाओं के प्रार्थना करने पर भी सिंहासन पर बैठने से पराङ्मुख न हो जाँय । वे पिता जी के अत्यन्त पक्षपाती हैं। हमेशा उनकी श्लाघा करते हुए कहते थे—भाई हर्ष, सुवर्ण के ताल वृक्ष की भाँति लम्बा शरीर किसीका हुआ है या फिर होगा ? सूर्य की भक्तिसे विकसित होने वाला उनका मुखरूपी महाकमल और इस प्रकार वज्रस्तम्भ के समान उद्भासित होने वाले दोनों भुजदण्ड और ये मद से अलसाए बलराम के समान विलास किसी के हुए हैं अथवा होंगे ? इस प्रकार कौन दूसरा
२६८ हर्षचरितम् नतालतरुप्रांशु कायप्रमाणमिदम् ? ईदृक्च दिवसकरप्रीत्या दिवसमुन्मु- खविकसितं मुखमहाकमलम् । एतौ च वज्रस्तम्भभास्वरौ भुजकाण्डौ । एते च हसितमदालसहलधरविभ्रमा विलासाः कोऽन्यो मानी विक्रान्तो वदान्यो वा ?' इति । एतानि चान्यानि च चिन्तयन्दर्शनोत्सुकहृदयो भ्रातुरागमनमुदीक्षमाणः कथंकथमप्यतिष्ठदिति । इति महाकविश्रीबाणभट्टकृतौ हर्षचरिते महाराजमरणवर्णनं नाम पञ्चम उच्छ्वासः । मुखकमलस्य दिवसकरप्रीतिः प्रतापित्वम् । वदान्यो दाता ॥ इति श्रीशंकरविरचिते हर्षचरितसंकेते पञ्चम उच्छ्वासः । मानी, पराक्रमी और दानशील है ?' इस तरह की और अन्य प्रकार की चिन्ता करते हुए बड़े भाई के दर्शन की उत्कण्ठा से उनके आगमन की प्रतीक्षा में किसी-किसी प्रकार ठहरे । हर्षचरित पञ्चम उच्छ्वास समाप्त ।
षष्ठ उच्छ्वासः उच्चित्योच्चित्य भुवि प्रहितनिगूढात्मदूतनीतानाम्। विजिगीषुरिव कृतान्तः शूराणां संग्रहं कुरुते ॥ १ ॥ विस्रब्धघातदोषः स्ववधाय खलस्य वीरकोपकरः। नवतरुभङ्गध्वनिरिव हरिनिद्रातरकरः करिणः ॥ २ ॥ अथ प्रथमप्रेतपिण्डभुजि भुक्ते द्विजन्मनि, गतेषूद्वेजनीयेष्वशौचदि- वसेषु, चक्षुर्दाहदायिनि दीयमाने द्विजेभ्यः शयनासनचामरातपत्रामत्रपत्र- शस्त्रादिके नृपनिकटोपकरणकलापे, नीतेषु तीर्थस्थानानि सह जनहृदयैः उच्चित्येति । कृतान्तोऽन्तकः शूराणां संग्रहं कुरुते । किं कृत्वा । उच्चित्योच्चित्य यथाप्रधानं प्रहितनिगूढाः स्वभावप्रच्छन्ना यमदूता यमकिंकरास्तैर्नीतानां विजिगीषु- र्यथान्विष्यान्विष्यामदूर्तानां शूराणां संग्रहं कुरुते । अनेनोच्छ्वासातः संगृहीतः। तथा हि कृतोऽन्तो विनाशो येन स शशाङ्कनामा गौडाधिपतिः । शूराणां राज्यवर्धनानु- चराणां प्रधानराजपुत्राणां तत्सहितानां संग्रहमकरोत् । कथम् ? उच्चित्योच्चिया- न्विष्यान्विष्य । कीदृशानाम् ? प्रहितनिगूढात्मदूतानाम । तथा हि तेन शशाङ्केन विश्वासार्थं दूतमूखेन कन्याप्रदानमुक्त्वा प्रलोभितो राज्यवर्धनः स्वगेहे सानुचरो भुञ्जान एव छद्मना व्यापादितः ॥ १ ॥ अत एव चाह-विस्रब्धेत्यादि । खलोऽत्र गौडापसदः । निद्राद्यस्तरकरः शशाङ्कः । वीरश्च हर्षः ॥ २ ॥ अथ प्रथमेत्यादौ । अस्मिन्नस्मिन्सति देवो हर्षो मौलेन महाजनेनात्मानं सकलं विजय की इच्छा रखने वाले राजा के समान यमराज पृथिवी में जगह-जगह पर भेजे हुए अपने गुप्तचर दूतों द्वारा चुन-चुन कर लाए गए शूर वीरों का संग्रह करता है॥१॥ जिस प्रकार हाथी द्वारा तोड़े गए वृक्ष के टूटने की ध्वनि सिंह को नींद से उठा देती है और वह हाथी को मार डालता है उसी प्रकार खल स्वभाव के गौड़राज द्वारा विश्वास- घात करके ( राज्यवर्धन के ) मारे जाने के अपराध ने वीर (हर्ष) को कुपित कर दिया और हर्ष ने उसे मार डाला ॥ २ ॥ प्रेतपिंड खाने वाले महाब्राह्मणों ने भोजन किया । उद्वेग से भरे हुए अशौच के दिन बीत गए । आँखों में शूल की तरह चुभती हुई राजा के निजी उपयोग की सामग्री- पलंग, पीढ़ा, चँवर, छत्र, बर्त्तन, सवारी, हथियार आदि ब्राह्मणों को समर्पित कर दी गई। जनता के हृदय के साथ राजा की अस्थियाँ तीर्थस्थानों में भेज दी गईं । चिता के स्थान
३०० हर्षचरितम् कीकसेषु, कल्पितशोकशल्ये सुधानिचयचिते चिताचैत्यचिह्ने, वनाय विसर्जिते महाजिजिति राजगजेन्द्रे, क्रमेण च मन्देष्वाक्रन्देषु, विरली- भवत्सु च विलापेषु, विश्राम्यत्यश्रुणि, शिथिलीभवत्सु श्वसितेषु, अवि- स्पष्टेषु हाकष्टाक्षरेषु, उत्सार्यमाणासु च व्यसनशय्यासु, उपदेशश्रवण- क्षमेषु श्रोत्रेषु, अनुरुधावधानयोग्येषु हृदयेषु, गणनीयेषु नृपगुणेषु, प्रदे- शवृत्तित्तामाश्रयति शोके, कृतेषु कविरुदितकेषु, जाते च स्वप्नावशेषदर्शने हृदयावशेपावस्थाने चित्रावशेषाकृतौ काव्यावशेषनाम्नि नरनाथे देवो हर्षः कदाचिदुत्सृष्टव्यापारः पुञ्जीभूतवृद्धबन्धुवर्गाग्रेसरेणावनतमूकमुखेन महा- जनेन मौलेनाकाल आत्मानं वेष्ट्यमानमद्राक्षीत् । दृष्ट्वा चाकरोन्मनसि— ‘किमन्यदार्यमागतमावेदयत्ययं शोकपराभूतो लोकाकरः’ इति । वेपमान- हृदयश्च पप्रच्छ प्रविशन्तमधिकतरप्रचारमन्यतमं पुरुषम् 'अङ्ग ! कथय । किमार्य प्राप्तः' इति । स मन्दमब्रवीत्—'देव ! यथादिशसि द्वारि' इति वेष्ट्यमानमद्राक्षीदिति संबन्धः । भोजनं भुक्तं तदस्यास्तीति । 'अर्शआदिभ्योऽच्' । अमत्राणि पात्राणि । पत्राणि वाहनानि । कीकसेष्वस्थिषु । चितायां चैत्यचिह्न- स्तदाकारं चिह्नम्, श्मशानदेवगृहं वा । कविरुदितकेषु दुःखोद्दीपनकालेषु । लोको- पर शोक के शल्य को उत्पन्न करने वाला चैत्यचिह्न स्थापित किया गया जो सुधा या गचकारी से बनाया गया था । महासमर में जीतने वाला राजा का निजी हाथी वन में छोड़ दिया गया । क्रम से आर्तनाद कम पड़ गए । विलाप की आवाज भी विरल हो गई । आँसुओं का बहना भी बंद हो गया । साँसें शिथिल पड़ गई । हाय-हाय के दर्दभरे शब्द अस्पष्ट हो गए । शोक के अवसर पर पड़े रहने के लिए जो शय्याएँ बिछाई गई थीं अब हटा दी गई । कान अब उपदेश की बात सुनने लगे । राजा के गुण गिने जाने लगे । अब शोक वस्तु-वस्तु पर ही आश्रित हो गया (अर्थात् राजा की किसी-किसी वस्तु को देख या सुन कर शोक उत्पन्न होता न कि हमेशा) । कवियों ने राजा के शोक में विलाप- पूर्ण काव्य रचे । राजा का दर्शन स्वप्न के रूप में अवशिष्ट रह गया, हृदय के रूप में वे अब बच रहे और उनका नाम काव्य के रूप में रह गया । तब किसी समय काम-धाम से विरत हो कर बैठे हर्ष ने वृद्ध बन्धुवर्ग, झुके हुए चुपचाप महाजन और मौल (वंश- परम्परागत) मन्त्रियों से घिरते हुए अपने आप को देखा । देख कर उन्होंने मन में सोचा—'शोक से पराभूत ये लोग भाई के आने के समाचार के अतिरिक्त क्या निवेदन करेंगे ?' काँपते हुए हृदय से उन्होंने भीतर प्रवेश कर दौड़ते आते हुए एक व्यक्ति से पूछा—'अङ्ग, कहो क्या आर्य पधार चुके ?' वह धीरे से बोला—'देव, हाँ, द्वार पर हैं।'
षष्ठ उच्छ्वासः ३०१ श्रुत्वा च सोदर्यस्नेहनिहितनिरतिशयमन्युमृदूकृतमनाः कथमपि न ववाम बाष्पवारिप्रवाहोत्पीडेन सह जीवितम्। अनन्तरं च द्वारपालप्रमुक्तेन प्रथमप्रविष्टेन परिजनेनेवाक्रन्देन कथ्य- मानम्, दूरद्रुतागमनमुषितबाहुल्येन विच्छिन्नच्छत्रधारेण लम्बिताम्बर- वाहिना भ्रष्टभृङ्गारग्राहिणा च्युताचमनधारिणा ताम्यत्ताम्बूलिकेन खञ्ज- त्खड्गग्राहिणा कतिपयप्रकाशदासेरकप्रायेण बहुवासरान्तरितस्नानभोजन- शयनश्यामक्षामवपुषा परिजनेन परिवृतम्, अविरलमार्गधूलिधूसरितश- रीरतया शरणीकृतमित्राशरण्या क्रमागतया वसुंधरया, हूणनिर्जयसमर- शरव्रणबद्धपट्टकैर्दीर्घधवलैः समासन्नराज्यलक्ष्मीकटाक्षपातैरिव शबलीकृ- तकायम्, अवनिपतिप्राणपरित्राणार्थमिव च शोकहुतभुजि हुतमांसैरति- च्त्तरो जनसमूहः । मन्युः शोकः । अनन्तरमित्यादौ प्रविशन्तं ज्येष्ठं भ्रातरमद्राक्षीदिति संबन्धः । परिजनेनापि प्रथमप्रविष्टेन द्वारपालप्रमुक्तेन च । आचमनं पतद्ग्रहः । प्रकाशा आतुरङ्गत्वाच्छि- श्रीयमानाः। दासेरका दासीसुताः। यह सुन कर सहोदर भाइ के स्नेह से अधिक रूप में उत्पन्न पिता जी की मृत्यु के शोक से आर्द्र मन वाले कुमार ने अश्रुधार की पीड़ा के साथ किसी प्रकार प्राण को रोक रखा। तत्पश्चात् उन्होंने अपने जेठे भाई राज्यवर्धन को देखा। द्वारपाल से छूट पाकर परिजन की भाँति पहले ही घुसे हुए आर्तनाद ने उनकी खबर दे दी। उनके चारों ओर कई दिनों से स्नान, भोजन, शयन न होने के कारण मुर्झाये हुए और कृश शरीर वाले लोग थे जिन्होंने शीघ्रता से दूर का रास्ता तय करने के लिए बहुतों का साथ छोड़ दिया था। उनके छत्रधारी पुरुष भी पीछे रह गए थे। वेग से चलने के कारण उनके कपड़े खिसक कर लम्बे हो गए थे। भृङ्गार नामक पात्र लेकर चलने वाले पुरुष भी दूर रह गए थे। आचमन का जल लेकर चलने वाले भी जाने कहाँ रह गए थे। खड्गग्राही पुरुष लँगड़ा कर चल रहे थे। कुछ ऊँट भी दिखाई दे रहे थे। हमेशा मार्ग में चलते ही रहने से उनकी देह धूल से धूसरित हो गई थी, मानों अशरण हो कर क्रम से आई हुई वसुन्धरा को उन्होंने अपनी शरण में रख लिया हो। हूणों को पछाड़ देने के समर में बाणों से लगे हुए उनके शरीर के घावों पर लम्बी सफेद पट्टियाँ बँधी थीं, मानों समीप में पहुँची हुई राज्यलक्ष्मी के दीर्घ धवल कटाक्ष पात उन पर पड़ रहे हों। राजा के प्राणों की रक्षा के लिए मानों उनके अंग-अंग अपने आपको शोक की अग्नि में स्वाहा कर रहे थे जिससे उनका दुःखभार व्यक्त हो रहा था। उनके सिर पर चूड़ामणि न थी, बाल गंदे और
३०२ हर्षचरितम् कृशैरवयवैरावेद्यमानदुःखभारम्, अपगतचूडामणिनि मलिनाकुलकुन्तले शेखरशून्ये शिरसि शुचमारूढां मूर्तिमतीमिव दधानम्, आतपगलितस्वे- दराजिना रुदतेव पितृपादपतनोत्कण्ठितेन ललाटपट्टेन लक्ष्यमाणम्, प्रथीयसा बाष्पपयःप्रवाहेणाभिमतपतिमरणमूर्च्छितामिव महीमनवरतं सिञ्चन्तम्, अनन्तसंतताश्रुप्रवाहनिपतननिश्रीकृताविव दुःखक्षामौ कपो- लावुद्वहन्तम्, अत्युष्णमुखमारुतमार्गगतेन द्रवतेव गलितताम्बूलरागेणा- धरबिम्बेनोपलक्षितम्, पवित्रिकामात्रावशेषेन्द्रनीलिकांशुश्यामायमानमचि- रश्रुतपितृमरणजन्यमहाशोकाग्निदग्धमिव श्रवणप्रदेशमुद्वहन्तम्, अस्फुटा- भिव्यक्तव्यञ्जनेनाप्यधोमुखस्तिमितनयननीलतारकमयूखमालाखचितेन शोकप्ररूढश्मश्रुश्यामलेनेव मुखशशिना लक्ष्यमाणम्, केसरिणमिव महाभूभृद्विनिपातविह्वलनिरवलम्बनम्, दिवसमिव तेजःपतिपतनपरिम्ला- नश्रियं श्यामीभूतम्, नन्दनमिव भग्नकल्पपादपं विच्छायम्, दिग्भागमिव प्रोषितदिङ्कुञ्जरशून्यम्, गिरिमिव गुरुवज्रपातदारितं प्रकम्पमानम्, क्रीत- शेखर आपीडः। अधरबिम्बेनापीतीत्थंभूतलक्षणे तृतीया। अभिव्यञ्जनं श्मश्रु। अस्तव्यस्त थे, शेखरस्रज भा न था, इस प्रकार माना मूर्तिमान् हो कर सिर पर बैठे शोक को धारण कर रहे थे। घाम की गर्मी से पसीने की बूँदें उनके ललाट पर छा गई थीं, मानों पिता के पैर पड़ने की उत्कंठा से रो रहे हों। अपने अभिमत स्वामी की मृत्यु से मानों मूर्च्छित पृथिवी को अपने बढ़े हुए बाष्प के प्रवाह से निरन्तर सींच रहे थे। उनके कपोल दुःख से इस प्रकार क्षीण हो रहे थे मानों निरन्तर बहते हुए अश्रुप्रवाह से घिचिक गए हों। उनके मुँह से अत्यन्त उष्ण श्वास के साथ द्रवित हो कर मानों उनके अधर का ताम्बूल-राग निकल रहा था। उनका कर्णदेश विशुद्ध एक मात्र बची हुई इन्द्रनीलमणि की किरण से श्यामवर्ण हो रहा था मानों कुछ क्षण पूर्व सुने हुए पिता की मृत्यु के समाचार से उत्पन्न महाशोक की अग्नि में जल गया हो। उनके मुखचन्द्र में श्मश्रु के रूप में अभी पाम्ही पड़ ही रही थी, फिर मुंह नीचा करने से उनकी आँखों की नीली किरणें नीचे की ओर फैल रही थीं, मानों शोक के कारण क्षौर कर्म न कराने से उनकी दाढ़ी बढ़ आई हो। राजा के विनाश से व्याकुल और बिना किसी आश्रय के बने वे उस सिंह के समान लग रहे थे जो पर्वत के गिरने से उद्विग्न और आश्रयरहित हो गया हो। सूर्य के अस्त होने से दिन के समान तेजस्वी राजा की मृत्यु से मुर्शान हुए अंगों से प्रतीत हो रहे थे। कल्पवृक्ष के भग्न हो जाने से नन्दनवन के समान छायारहित (कान्तिहीन) हो रहे थे। दिग्गज के चले जाने से दिग्भाग की तरह सूने-सूने लग रहे
षष्ठ उच्छ्वासः ३०३ मिव कृशिम्ना, किंकरीकृतमिव कारुण्येन, दासीकृतमिव दौर्मनस्येन, शिष्यीकृतमिव शोचितव्येन, अन्धीकृतमिवाधिना, मूकीकृतमिव मौनेन, पिष्टमिव पीडया, स्विन्नमिव संतापेन, उषितमिव चिन्तया, विलुप्तमिव विलापेन, धृतमिव वैराग्येण, प्रत्याख्यातमिव प्रतिसंख्यानेन, अवज्ञातमिव प्रज्ञया, दूरीकृतमिव दुरभिभवत्वेन, अबोध्येन वृद्धबुद्धीनाम्, असाध्येन साधुभाषितानाम्, अगम्येन गुरुगिराम्, अशक्येन शास्त्रशक्तीनाम्, अप- थेन प्रजाप्रयत्नानाम्, अगोचरेण सुहृदनुरोधानाम्, अविषयेण विषयोपभो- गानाम्, अभूमिभूतेन कालक्रमोपचयानां शोकेन कवलीकृतं ज्येष्ठं भ्रात- रमपश्यत् । आवेगोद्गतकृतस्नेहोत्कलिकाकलापोत्क्षिप्यमाणकाय इव च परवशः समुदगात् । अथ तं दूरादेव दृष्ट्वा देवो राज्यवर्धनश्चिरकालकलितं बाष्पावेगं मुमुक्षुः सुदूरप्रसारितेन संकल्पयन्निव सर्वदुःखानि दीर्घेण दोर्दण्डद्वयेन गृहीत्वा भूभृद्राजा, गिरिश्च । तेजःपतिर्नृपतिः, सूर्यश्च । श्यामः कृष्णः, श्यामा च रात्रिः । कल्पपादपो राजापि । छाया कान्तिः, आतपाभावश्च । प्रत्याख्यातं त्यक्तम् । प्रतिसंख्यानेन विवेककुशल्या बुद्ध्या । कलितं धृतम् । बन्धनं लाभम् । पर्जन्य इन्द्रः । थे। विशाल वज्रपात से फटे हुए पर्वत के समान जोर से कांप रहे थे। कृशता ने मानों उन्हें खरीद लिया था । कारुण्य ने अपना किंकर बना लिया था। दौर्मनस्य ने अपना उन्हें दास बना लिया था। शोक ने शिष्य कर रखा था। मानसिक व्यथा ने अंधा बना दिया था । मौन ने उन्हें चुप कर दिया था । पीड़ा ने पीस दिया था । संताप ने पका डाला था । चिन्ता ने पकड़ लिया था। विलाप ने विलुप्त कर दिया था । वैराग्य ने उन्हें थाम लिया था । बुद्धि ने उन्हें छोड़ दिया था । प्रज्ञा ने उनका तिरस्कार कर दिया था । अब उनमें दुरभिभव होने की बात न रही । बड़े-बूढ़े लोग भी उनके शोक को हटा न सके । सज्जनों के उपदेश भी उन पर काम न करते, गुरुओं की बातें भी न चलतीं, शास्त्रों की शक्ति भी असमर्थ थी, प्रजा के प्रयत्न भी उनका हरण न कर सके, सामयिक उपचार भी कोई असर नहीं कर सके । वह शोक मानों उन्हें खाये जा रहा था । आवेग से उत्पन्न स्नेह की उत्कंठा ने हर्ष के शरीर को मानों झकझोर दिया और वे परवश हो कर उठ खड़े हुए । कुमार हर्ष को देव राज्यवर्धन ने दूर ही से देखा और बहुत पहले से रोके हुए बाष्पावेग को छोड़ने की इच्छा से सारे दुःख का चिन्तन करके दूर तक अपनी लम्बी
३०४ हर्षचरितम्
कण्ठे मुक्तकण्ठं पुनः पतितक्षौमे क्षामे वक्षसि पुनः कण्ठे पुनः स्कन्ध- भागे पुनः कपोलोदरे निधाय तथा तथा रुरोद यथा संबन्धनानीवोत्पा- ट्यन्त हृदयानि। अश्रुस्रोतःशिरा इवामुच्यत लोचनेषु लोकेन स्मृत- नृपतिना राजवल्लभैनापि प्रतिशब्दकनिभेन निर्भरमिवारुद्यत । सुचिराच्च कथं कथमपि निर्वृष्टनयनजलः पर्जन्य इव शरदि स्वयमेवोपशशाम । उपविष्टश्च परिजनोपनीतेन तोयेन तरत्करनखमयूखपुञ्जतया महाजलप्ल- वजायमानफेनलेखमिव पुनः पुनः प्रमृष्टमपि पक्ष्माग्रसंगतबाष्पबिन्दुवृन्द- मन्दोन्मेषमुषितदर्शनं कथं कथमपि चक्षुरक्षालयत् । ताम्बूलिकोपस्था- पितेन च वाससा चन्द्रातपशकलेनेवोष्णोष्णबाष्पदग्धं वदनमुन्ममार्ज । तूष्णीमेव च चिरं स्थित्वोत्थाय स्नानभूमिमगात् । तस्यां च स्थित्वा विभूषं वित्रस्तव्र्यस्तकुन्तलं मौलिमनादरान्निष्पीड्य सावशेषमन्युस्फुरितेन जिजीविषतेव जलधौतसुभगमात्मानमपि चुचुम्बिषतेवाधरेण क्षालितस्य
'पर्जन्यो रसदभ्रेन्दौ' इत्युक्तेः । स हि मेघान्वर्षति । वित्रस्ता ऊर्ध्वं क्षिप्ताः । निर्गता इत्यन्ये । व्यस्ता विक्षिप्ताः । कुन्तलाः केशाः । उक्तं च—'चिकुरः कुन्तलो बालः कचः केशः शिरोरुहः ।' इति । 'चूडा किरीटं केशाश्च संयता मौलयस्त्रयः' इत्युक्तम् ।
भुजाएँ फैलाई और कुमार को गले से लगा कर फिर गिरे वस्त्र वाले क्षीण उनके वक्ष में, फिर कंठ में, फिर स्कन्धभाग में, फिर कपोल में लग-लग कर गला फाड़ कर उस प्रकार रोने लगे मानों हृदय की परतें उत्पाटित की जा रही हों । उस समय राजा का स्मरण करके लोगों ने शिरा के समान आँसू की धार बहाई और राजा के प्रिय लोगों ने भी राज्यवर्धन के रुदन की प्रतिध्वनि के रूप में जोर-जोर से रोना आरम्भ किया । जैसे शरत्काल में मेघ जल बरसा देता है उसी प्रकार देर तक रो-धो कर किसी किसी प्रकार वे स्वयं शान्त हो गए । आसन पर बैठ कर परिजन द्वारा लाए गए जल से नख की किरणों का फेन उत्पन्न करते हुए बार-बार साफ किए गए चक्षु को भी, जिसकी पपनियों पर आंसू के कतरे लग जाने के कारण खुलना और देखना न हो पाता था, किसी-किसी प्रकार धोया। ताम्बूलिक द्वारा दिए गए चाँद के टुकड़े की भाँति रूमाल से गरम आँसू से जला अपना मुंह पोंछा । बहुत देर तक चुप-चाप ही बैठे रहे और फिर वहाँ से उठ कर स्नानभूमि में पहुँचे । वहाँ ठहरे और अलंकारहीन, अस्तव्यस्त बाल वाले अपने सिर को अनादर से पोंछा । बचे हुए शोक से उनका अधर फड़कड़ा रहा था, मानों उसमें जान आ रही थी, पानी से धुले हुए अपने आपको ही मानों चूमना चाहता
षष्ठ उच्छ्वासः ३०५ चक्षुषः श्वेतिम्ना च शारदशशिकरविकसितविशदकुमुदवनदलावलिबलि- विक्षेपैरिव दिग्देवतार्चनकर्म कुर्वाणश्चतुःशालवितर्दिकाविनिवेशितायाम- प्रतिपादिकायां चापाश्रयविनिहितैकोपबर्हणायां पर्यङ्किकायां निपत्य जोष- मस्थात् । देवोऽपि हर्षस्तथैव स्नात्वा धरणीतलनिहितकुथाप्रसारितमूर्तिरदूर एवास्य तूष्णीमेव समवातिष्ठत । दृष्ट्वा दृष्ट्वा दूयमानमानसमग्रजन्मानं समस्फुटदिवास्य सहस्रधा हृदयम् । औरसदर्शनं हि यौवनं शोकस्य । लोकस्य तु नरपतिमरणदिवसादपि दारुणतरः स बभूव दिवसः । सर्व- स्मिन्नेव च नगरे न केनचिदपाचि न केनचिदस्नायि नाभोजि । सर्वत्र सर्वेणारोदि । केवलमनेन च क्रमेणातिचक्राम दिवसः । स च प्रत्यग्रत्व- ष्ट्टंकतक्षततनुरिव वमद्बहलरुधिररसमांसच्छेदलोहितच्छविरपरपारावारप- यसि ममज्ज मञ्जिष्ठारुणोऽरुणसारथिः । मुकुलायमानकमलिनीकोशवि- कलं चकाण चञ्चरीककुलं कमलसरसि । सविधविरहव्याधिविधुरवधूबा- अत्र तूपचारान्मौलिशब्देन शिर उच्यते । वितर्दिका वेदिका । उपबर्हणमुपधा- नम् । जोषं तूष्णीम् । कुथो वर्णकम्बलः । औरसो भ्राता । त्वष्टा विश्वकर्मा तस्य टङ्कश्छेदनशस्त्रम् तेन तनूकृता तनुर्यस्य सः । पुरा स्वभर्तृतेजोविसरोद्विग्नया सूर्यभार्ययावमानितः सूर्यस्त्वष्टारमवोचन्मम तेजस्तनु कुरु । तेनाप्यारोप्य चक्रभ्रमं टंकेनासौ तष्ट इति वार्ता । अपरः पश्चिमः । पारावारः समुद्रः । चकाण जुगुञ्ज । चञ्चरीका भ्रमराः । था । धुली हुई अपनी आँखों की सफेदी से उन्होंने शरत्काल के चन्द्रमा की किरणों से खिले हुए कुमुद के दलों की बलि भेंट करके मानों दिग्देवताओं की अर्चना की । चतुः- शाल की वितर्दिका में रखी हुई बड़े-बड़े पावे वाली, सिरहाने रखे हुए तकिये से युक्त चौकी पर चुपचाप पड़ गए । देव हर्ष भी उसी प्रकार स्नान करके जमीन पर बिछे हुए कम्बल पर फैल कर उनके कुछ ही दूर पर मौन होकर बैठे । दुःख से भरे हुए अपने बड़े भाई को देख-देख कर उनका हृदय मानों हजारों टुकड़ों में बिखर गया । भाई को देखने से शोक और भी जवान हो जाता है (बढ़ जाता है) । लोगों के लिए वह दिन राजा के मृत्युदिवस से भी अधिक दुखद हो गया । सारे नगर में न किसी ने पकाया, न किसी ने स्नान किया और न किसी ने भोजन किया । सब जगह सबने रुदन किया । केवल इसी क्रम में वह सारा दिन चला गया । मानों विश्वकर्मा की टाँकी से अभी-अभी छाँटे २० ह० च०
३०६ हर्षचरितम् ध्यमानं बबन्ध बन्धाविव विबुद्धबन्धूकभासि भास्वति सास्त्रां दृशं चक्र- वाकचक्रवालम् । संचरन्त्याः समधुकररवं कैरवाकरं कलहंसरमणीरमणीयं माणिक्यकाञ्चीकिङ्किणीजालमिवाचकाण श्रियः । प्रकटकलङ्कमुदयमानं विशङ्कटविषाणोत्कीर्णपङ्कसंकरशंकरबर्कुरशकरककुदकूटसंकाशमकाशताका- शे शशाङ्कमण्डलम् । अस्यां च वेलायामनतिक्रमणीयवचनैरुपसृत्य प्रधानसामन्तैर्विज्ञाप्य- मानः कथं कथमप्यभुक्त । प्रभातायां च शर्वर्यां सर्वेषु प्रविष्टेषु राजसु समीपस्थितं हर्षदेवमुवाच—'तात ! भूमिरसि गुरुनियोगानाम् । शैशव एवाग्राहि गुणवत्पताकेव भवता तातस्य चित्तवृत्तिः । यतो भवन्तमेवं- विधं विधेयं विधिविधानोपनतनैर्घृण्यमिदं किमपि विभणिषति मे हृदयम् । नावलम्बनीया बालभावसुलभा प्रेमविलोमा वामता। वैधेय इव मा कृथाः 'कादम्बः कलहंसः स्यात्' । आचकाण चुकूज । कैरवाकरं संचरन्त्याः श्रियः किङ्कि- णीजालमिव चुकूजेत्युत्प्रेक्षा । विशङ्कटो विशालः । बर्कुरस्तरुणः । शकरो दान्तः । भानुं प्रवृत्ता प्रभाता तस्याम् । नियोग आदेशः । विधेयमायत्तम् । विभणिषति कथयितुमिच्छति । विलोमाऽननुकूला । वामता प्रतिकूलता । वैधेयो मूर्खः । गए शरीर वाले, निकलते हुए रुधिर और मांस से लाल, मंजीठे के समान वर्ण वाले सूर्य पश्चिम के जल में डूबने लगे । कमल के सरोवर में भौंरे बंद होनी हुई कमलिनी के कोश में विकल होकर आवाज करने लगे । निकट में होने वाले विरहरूपी व्याधि से पीड़ित अपनी पत्नियों को देख कर दुखी चक्रवाक पक्षियों ने विकसित बन्धूक के समान लाल वर्ण वाले बन्धु की भाँति सूर्य में अपनी डबडबाई आँखें लगा दीं । भौरों की गुंजार और कलहंसियों की आवाज से भरा हुआ कुमुद का सरोवर ऐसा लग रहा था मानों वहाँ संचरण करती हुई लक्ष्मी की माणिक्यकांची में गुथी हुई किंकिणियाँ बज रही हों । आकाश में स्पष्ट कलंक वाला चन्द्रमण्डल कठोर सींग से उछाली हुई मिट्टी से सने हुए शिवजी के तगड़े वृषभ की पीठ पर के ककुद ( टाट ) की भाँति उदित होने लगा । इसी अवसर पर प्रधान सामन्तों ने जिनकी बात टाली नहीं जाती थी, पहुँच कर बड़ा समझाया-बुझाया तो राज्यवर्धन ने किसी किसी प्रकार भोजन किया । रात बीती तो सब राजा लोग जुट आए और तब उन्होंने समीप में बैठे हुए देव हर्ष से कहा—'तात, भारी आदेशों के तुम योग्य हो । शैशवकाल में गुणवान् जनों की पताका के समान तात की चित्तवृत्ति को तुमने प्रभावित कर लिया था। इसीलिए इस प्रकार के आयत्त रहने वाले तुम से दैव की इच्छा से प्राप्त वैराग्य वाला मेरा यह हृदय कुछ कहना चाहता है।
षष्ठ उच्छ्वासः ३०७ प्रत्यूहमीहितेऽस्मिन् । शृणु न खलु न जानासि लोकवृत्तम् । लोकत्रय- त्रातरि मांधातरि मृते किं न कृतं पुरुकुत्सेन ? भ्रूलतादिष्टाष्टादशद्वीपे दिलीपे वा रघुणा । महासुरसमरमध्थाध्यासितत्रिदशरथे दशरथे वा रामेण । गोष्पदीकृतचतुरुदन्वदन्ते दुष्यन्ते वा भरतेन । तिष्ठन्तु तावत्ते तातेनैव शतसमधिकाधिगताध्वरधूमबिसरधूसरितवासववयसि सुगृहीतनाम्नि तत्रभवति परासुतां गते पितरि किं नाकारि राज्यम् ? यं च किल शोकः समभिभवति तं कापुरुषमाचक्षते शास्त्रविदः । स्त्रियो हि विषयः शुचाम् । तथापि किं करोमि । स्वभावस्य सेयं कापुरुषता वा स्त्रैणं वा यदेवमास्पदं पितृशोकहुतभुजो जातोऽस्मि । मम हि भूभृति पर्यस्ते निरवशेषतः प्रस्स्र- वणानीव स्रुतान्यश्रूण्यस्तमिते महति तेजस्यन्धकारीभूतदशाशस्य प्रनष्टः प्रज्ञालोकः, प्रज्वलितं हृदयम् , आत्मदाहभीत इव स्वप्नेऽपि नोपसर्पति विवेकः, बलीयसा संतापेन जातुषमिव विलीनमखिलं धैर्यम , पदे पदे धूमेन मलिनीक्रियते । स्त्रैणे स्त्रीत्वे । परासुता मरणम् । मम हेत्यादिवाक्यद्वये श्लेषो व्याख्येयः । प्रस्स्रवणानि निर्झराः । जतुनो विकारो जातुषम् । 'त्रपुजतुनोः षुक्' । बालभाव में सुलभ होने वाली प्रतिकूलता का अवलम्बन न करना । मेरी इस चाह में विचारमूढ़ के समान विघ्न न उत्पन्न करना । सुनो, क्या लोकव्यवहार नहीं जानते ? त्रिभुवन की रक्षा करने वाले मान्धाता के मरने पर पुरुकुत्स ने क्या नहीं किया? या भ्रूभङ्ग के द्वारा अट्ठारह द्वीपों को आदेश देने वाले दिलीप के बाद रघु ने क्या नहीं किया ? या दैत्यों के साथ युद्ध के बीच देवरथ को स्थापित करने वाले राजा दशरथ की मृत्यु के पश्चात् राम ने क्या नहीं किया ? चारों समुद्रों के छोर को गोष्पद बनानेवाले दुष्यन्त के बाद भरत ने क्या नहीं किया ? उन लोगों की बात जाने दो, सैकड़ों यज्ञों के धूम से इन्द्र की आयु को धूसरित कर देनेवाले सुगृहीतनाम अपने पूज्य पिताजी की मृत्यु के बाद हमारे पिताजी ने क्या राज्य नहीं किया ? जिस व्यक्ति को शोक अभिभूत कर देता है उसे शास्त्रज्ञ लोग कायर कहते हैं। शोक स्त्रियों में उत्पन्न होता है । तब भी मैं क्या करूं ! मेरे स्वभाव की यह कायरता हो या मेरा स्त्रीभाव हो, मैं तात की शोकाग्नि में पड़ गया हूँ । राजा के अस्त होने पर मेरे आँसू झरने के समान झरते रहे । महान् तेज के अस्त हो जाने पर मेरे लिए दिशाओं में अंधेरा छा गया और मेरा प्रज्ञालोक जाता रहा । मेरा हृदय जल गया । मेरा विवेक अपने भी जल जाने के भय से मानों स्वप्न में भी पास नहीं आता । प्रबल संताप के कारण मेरा सारा धैर्य लाह की भांति गल गया । मेरी मति पदे-पदे विषैले बाण से हती हुई हरिणी के समान मूर्च्छित
३०८ हर्षचरितम् दिग्धरोपहतेव हरिणी मुह्यति मतिः, पुरुषद्वेषिणीव दूरत एव भ्रमति परिहरन्ती स्मृतिः, अम्बेव तातेनैव सह गता धृतिः, वार्धुषिकप्रयुक्तानीव धनानीव प्रतिदिवसं वर्धन्ते दुःखानि, शोकानलधूमसंभारसंभूताम्भोघर- भरितमिव वर्षति नयनवारिधाराविसरं शरीरम्। सर्वः पञ्चजनः पञ्चत्व- मुपगतः प्रयाति। वितथमेतद्वदति बालो लोकः। तातो हुताशनतामेव केवलामापन्नोऽपि नैवं दहति माम्। अन्तस्तदेवमिदमसांपरायिकमिव हृदयमवष्टभ्य व्युत्थितः शोको दुर्निवारो वाडव इव वारिराशिम्, पविरिव पर्वतम्, क्षय इव क्षपाकरम्, राहुरिव रविम्, दहति दारयति तनूकरोति कवलयति च माम्। कामं न शक्नोति मे हृदयं तादृशस्य सुमेरुकल्पस्य कल्पमहापुरुषस्य विनिपातमश्रुबिन्दुभिरेव केवलैरतिवाहयितुम्। राज्ये पदे शब्दे, क्रमे च। दिग्धो विप्रलिप्तः शरः। उक्तं च—‘बाणे विषाक्ते दिग्धलिसकौ’ इति। मेरुर्महीधरवद्रोपशब्दः प्रशंसार्थः। वृद्ध्या जीवति वार्धुषिकः वणिक्। वृद्वेर्वृधुषीभावः। पञ्चजनः पञ्चमहाभूतानि, मनुष्यश्च। उक्तं च—‘स्युः पुमांसः पञ्चजनाः पुरुषाः पूरुषा नराः’ इति। पञ्चत्वं मरणम्। वितथमिति। पञ्चसु पृथिव्या- दिषु लयात्पुरुषस्ताद्रूप्यं प्रतिपद्यत इत्यलीकम्। यतस्तत इत्याद्यग्रिमाञप्रतिबद्ध- कार्यदर्शनादित्यर्थः। आपत्कष्टम्। क्लेश इत्यर्थः। संपरायः सङ्ग्रामः। तस्मै यन्न भवति तदसांपरायिकम्। सभयं यः किल भीतः स कथं व्युत्थितं निवारयेत्। वाडव इत्यादयो दहतीत्यादिभिर्यथाक्रमं योज्याः। पविर्वज्रः। कल्पतेऽस्मादभीष्टार्थ हो रही है। मेरी स्मृति मुझे छोड़ कर दूर ही दूर चक्कर मार रही है मानो पुरुष से उसका द्वेष हो। अम्बा के समान मेरी धृति पिता के साथ ही चली गई। बनिया के धन के समान मेरे दुःख बढ़ते ही जा रहे हैं। शोक की अग्नि का धूमसम्भार मेघ के रूप में शरीर में भर गया है और आंखों से जलधारा बरस रही है। सारे महाभूत अपने-अपने भाग में मिलते जारहे हैं। यह बालप्रकृति के लोग मिथ्या बोलते हैं। तात केवल अग्नि में मिल कर ही मुझे नहीं जला रहे हैं। भीतर ही भीतर लड़ने में असमर्थ के समान मेरे हृदय को दबा कर उठा हुआ दुर्निवार शोक उस प्रकार जला रहा है जैसे वडवानल समुद्र को, उस प्रकार विदीर्ण कर रहा है जैसे वज्र पर्वत को, उस प्रकार कृश कर रहा है जैसे क्षय चन्द्रमा को, उस प्रकार निगल रहा है जैसे राहु सूर्य को। निश्चय ही सुमेरुसदृश उस प्रकार के युगपुरुष के विनाशजन्य शोक को मेरा हृदय केवल आँसू की बूँदों से कम नहीं कर सकता। चकोर के समान मेरी आँखें विष- तुल्य राज्य से विरक्त हो गईं। राज्यलक्ष्मी को उस प्रकार त्याग देने का मन करता है
षष्ठ उच्छ्वासः ३०६ विष इव चकोरस्य मे विरक्तं चक्षुः । बहुमृतपटावगुण्ठनां रङ्गितरङ्गां जनंगमानामिव वंशबाह्यामनार्या श्रियं त्यक्तुमभिलषति मे मनः । क्षणमपि दग्धगृहे शकुनिरिव न पारयामि स्थातुम् । सोऽहमिच्छामि मनसि वाससीव सुलग्नं स्नेहमलमिदममलैः शिखरिशिखरप्रस्रवणैः स्वच्छस्रो- तोम्बुभिः प्रक्षालयितुमाश्रमपदे । यतस्त्वमन्तरितयौवनसुखामनभिमता- मपि जरामिव पुरुराज्ञया गुरोर्गृहाण मे राज्यचिन्ताम् । त्यक्तसकलवाल- क्रीडेन हरियेव दीयतामुरो लक्ष्म्यै । परित्यक्तं मया शस्त्रम् ।' इत्यभिधाय च खङ्गग्राहिणो हस्तादादाय निजं निस्त्रिंशमुत्ससर्ज धरण्याम् । अथ तच्छ्रुत्वा निशितशिखेन शूलेनेवाहतः प्रविदीर्णहृदयो देवो इति कल्पः । चकोरः क्रकचः । तस्य विषे दृष्टे अक्षिणी विरज्येते । मृतस्य पटः । अवगुण्ठनं मस्तकाच्छादनम् । रङ्गः समाजः । जनंगमश्चण्डालः । उक्तं च— 'चण्डालप्लवमातङ्गदिवाकीर्तिजनंगमाः । निषादश्वपचान्तेवासिचण्डालपुक्कसाः ॥' इति । वंशोऽभिजननं प्रबन्धो वेणुश्च । बाह्या बहिर्भूता, वहनीया च । शकुनिर्गृह- चटिका । गृहशारिकेत्यन्ये । स्नेहः प्रेम, तैलादिश्च । यतस्त्वमिति । पुरा ययातिः शुक्रदुहितरं देवयानीमवमन्य देवयान्या दासीभूतां शर्मिष्ठामसकृन्मिथ्याकामयानेन शुक्रेण जरां यास्यसीति शप्तः, प्राप्तजरादुःखो विषयलम्पटोऽन्यपुत्रैरगृहीतां जरां पुरौ स्वपुत्रे कृताभ्युपगमे संक्रामयांबभूवेति वार्ता । जराप्यन्तरितयौवनसुखा- ऽनभिमता च । गुरोर्ययातेरपि । मामन्तरेण मां विना, मय्यसंनिहित इत्यर्थः । जैसे बहुत से मरे लोगों के रंग-बिरंगे कफन के घूंघट से सजाई हुई, लोगों का मन बहलाने वाली, बाँस के ऊपर लगी हुई टेसू को पुतली को डोम लोग फेंक देते हैं । इस जले हुए घर में पक्षी के समान मैं क्षण भर भी नहीं रह सकता । आश्रम में रह कर मैं मन के वस्त्र में लगे हुए स्नेह जैसे इस मल को पर्वतों के शिखर से प्रवाहित होते हुए निर्मल झरनों के जल से धो देना चहता हूं। जैसे पुरु ने पिता की आज्ञा से यौवनसुख से रहित और अप्रिय वार्धक्य को स्वीकार किया उसी प्रकार तुम मेरी राज्यचिन्ता ग्रहण कर लो । कृष्ण के समान सारी बालकीड़ाओं को अब छोड़ कर दाबने के लिए लक्ष्मी को अपनी जाँघ दो। मैने शस्त्र का अब परित्याग ही कर दिया ।' यह कह कर उन्होंने दाहिने हाथ से उठाकर अपनी तलवार जमीन पर रख दी । यह सुनते ही चोखे शूल से आहत हुए की तरह देवहर्ष का हृदय विदीर्ण हो गया । उनके मन में अनेक प्रकार के विचारों का तूफान उठ खड़ा हुआ—'क्या मेरी अनुपस्थिति में डाह के कारण देख न पाने वाले किसी खल ने आर्य से मेरे प्रति कुछ कह दिया, जिससे कुपित हों । या इस प्रकार मेरी परीक्षा ले रहे हैं । या तात के शोक से उत्पन्न
३१० हर्षचरितम् हर्षः समचिन्तयत्—'किं नु खलु मामन्तरेणार्यः केनचिदसहिष्णुना किंचिद्ग्राहितः कुपितः स्यात् । उतानया दिशा परीक्षितुकामो माम् । उत तातशोकजन्मा चेतसः समाक्षेपोऽयमस्य । आहोस्विदार्य एवायं न भवति, किं वार्येणान्यदेवाभिहितमन्यदेवाश्रावि मया शोकशून्येन श्रवणेन्द्रियेण । आर्यस्य चान्यद्विवक्षितमन्यदेवापतितं मुखेन । अथवा सकलवंशविनाशाय निपातनोपायोऽयं विधेः । मम वा निखिलपुण्यपरिक्ष- योपक्षेपः । कर्मणामनुकूलसमग्रग्रहचक्रवालविलसितं वा । अथवा तातविनाशनिःशङ्ककलिकालक्रीडितं येनायं यः कश्चिदिव यत्किंचनकारिणं मामपुष्यभूतिवंशसंभूतमिव, अताततनयमिव, अनात्मानुजमिव, अभक्त- मिव, अदृष्टदोषमपि श्रोत्रियमिव सुरापाने, सद्भूत्यमिव स्वामिद्रोहे, सज्जनमिव नीचोपसर्पणे, सुकलत्रमिव व्यभिचारे, अतिदुष्करे कर्मणि समादिष्टवान् । तदेतत्तावदनुरूपं यच्छौर्योन्मादमदिरोन्मत्तसमस्तसाम- न्तमण्डलसमुद्रमथनमंदरे तादृशि पितरि मृते तपोवनं वा गम्यते वल्कलानि वा गृह्यन्ते तपांसि वा सेव्यन्ते । या तु मयि राजाज्ञा सा श्रोत्रियो वेदपारगः । धन्वनि मरौ । धन्वन्यपि दग्धे राजाज्ञापि दाहकारिणी । यह इनके चित्त की व्याकुलता है । या आर्य यह नहीं हो सकते, क्या यही बात है कि आर्य ने कुछ दूसरा ही कहा और शोक के कारण शब्दग्रहण की क्षमता से रहित कर्णेन्द्रिय से रहित मैंने कुछ दूसरा ही सुना । आर्य ने कुछ दूसरी बात कहना चाहा और मुँह से कुछ दूसरी बात निकल गई । अथवा विधिने सारे वंश के विनाश के लिए ध्वंस का उपाय रचा है । या मेरे सारे पुण्यों के क्षीण हो जाने का यह प्रसंग है ? या प्रतिकूल होकर एकत्र हुए सारे ग्रहों के ये काम हैं । या तात के अब न रहने से कलिकाल निःशंक होकर क्रीड़ा कर रहा है जिससे किसी किसी के समान आर्य ने स्वेच्छा से आचरण करने वाले मुझे अत्यन्त दुष्कर कार्य करने के लिए उस प्रकार आदेश दिया है जैसे मैं पुष्यभूति के वंश में उत्पन्न ही नहीं, तात का पुत्र ही नहीं, अपना भाई ही नहीं, या सेवक ही नहीं । बिना किसी दोष के ही श्रोत्रिय के समान सुरापान में, सद्भूत्य के समान स्वामिद्रोह में, सज्जन के समान नीच के पास जाने में, कुलकलत्र के समान व्यभिचार में जैसे मुझे लगा दिया है । यह तो अच्छा ही है जो शौर्य के उन्माद की मदिरा से उन्मत्त समस्त सामन्तमण्डल का मंदर के समान मंथन करने वाले तात की मृत्यु के बाद तपोवन में रहा जाय, या वल्कल धारण किया जाय, या तपस्या की जाय ।
षष्ठ उच्छ्वासः ३११ दग्धेऽपि दाहकारिणी मय्यवप्रहग्लपिते धन्वनीवाङ्गारवृष्टिः । तदसद्दश- मिदमार्यस्य । यद्यपि च विभुरनभिमानः, द्विजातिरनेषणः, मुनिररोषणः, कपिरचपलः कविरमत्सरः, वणिगतस्करः, प्रियजानिरकुहनः, साधुर- दरिद्रः, द्रविणवानखलः, कीनाशोऽनक्षितगतः, मृगयुरहिंस्रः, पाराशरी ब्राह्मण्यः, सेवकः सुखी, कितवः कृतज्ञः, परिव्राडबुभुक्षुः, नृशंसः प्रिय- वाक्, अमात्यः सत्यवादी, राजसूनुरदुर्विनीतश्च जगति दुर्लभः, तथापि ममार्य एवाचार्यः । को हि नाम तद्विधे निपतिते राजगन्धकुञ्जरे जनयि- तरि चेदृशे विफलीकृतविशालशिलास्तम्भोरुभुजे भूपुजि भ्रातरि त्यक्त- राज्ये ज्यायसि नववयसि तपोवनं गच्छति सकललोकलोचनजलपाता- पवित्रं मृद्रोलकं वसुधाभिधानं धनमदखेलनिखिलखलमुखविकारलक्षणा- ख्यायमाननीचाचरणां श्रीसंज्ञिकां सुभटकुटुम्बकर्मकुम्भदासीं चण्डालोऽपि अनेषणो निरभिलाषः । प्रिया जाया यस्य । 'जायाया निङ्' । कुहना ईर्ष्या, शङ्का वा । कीनाशः क्षुद्रः । उक्तं च—'कृतान्ते पुंसि कीनाशः क्षुद्रकार्षिकयोस्त्रिषु' । अ- नक्षितगतः प्रियः । मृगयुर्व्याधः । पाराशरी भिक्षुः । कितवो द्यूतकृत् । गोप्यो दासः । जो राज्य करने की मुझ पर आज्ञा है वह अनावृष्टिसे सूखा पड़े हुए मरु के समान स्वयं दग्ध और विघ्नों से क्षीण मुझ पर दाह करने वाली अङ्गार की वर्षा है। तो यह कथन आर्य के सदृश न था। यद्यपि जिसमें अभिमान न हो ऐसा अधिकारी, जिसमें एषणा न हो ऐसा द्विजाति, जिसमें रोष न हो ऐसा मुनि, जिसमें चपलता न हो ऐसा कपि, जिसमें मत्सर न हो ऐसा कवि, जो बेईमानी न करे ऐसा वणिक्, जो छलिया न हो ऐसा प्रिय, जो दरिद्र न हो ऐसा सज्जन, जो खल न हो ऐसा धनी, जो द्वेष न करता हो ऐसा क्षुद्र, जो हिंसा न करता हो ऐसा शिकारी, जो ब्राह्मणद्वेषी न हो ऐसा पाराशरी भिक्षु, जो सेवक हो ऐसा सुखी, जो धूर्त हो ऐसा कृतज्ञ, जो भीख मांगता न हो ऐसा परिव्राट्, जो प्रिय बोलता हो ऐसा क्रूर, जो सत्यवादी हो ऐसा कूटनीतिज्ञ मंत्री, और जो दुर्विनीत न हो ऐसा राजपुत्र संसार में दुर्लभ है। मेरे उपदेशक आचार्य तो आर्य ही हैं। कौन ऐसा है जो उन गन्धहस्ती के समान महाराज पिता श्री के चले जाने पर और शिलास्तम्भ के समान विशाल भुज को विफल करके राज्य छोड़ कर बड़े भाई के तपोवन चले जाते समय लोगों के आँसू से अपवित्र पृथिवी नामक मिट्टी के गोले को एवं धनमद की क्रीड़ा में निखिल दुष्टजनों के मुख को विकृत कर देने से विख्यात नीच आचरण वाली लक्ष्मीसंज्ञक सुभटों के काम करने वाली कुम्भदासी (पनभरिन) की चाण्डाल होकर
कामयेत । कथमिव संभावितमत्यन्तमनुचितमिदमार्येण । किमुपलक्षित- मनवदातमिदं मयि । किं वास्य चेतसश्च्युतः सौमित्रिर्विस्मृता वा वृकोदरप्रभृतयः । अनपेक्षितभक्तजना स्वार्थैकनिष्पादननिष्ठा नासीदि- यमार्यस्येदृशी प्रभाविष्णुता । अपि चार्ये तपोवनं गते जिजीविषुः को मनसापि महीं ध्यायेत् । कुलिशशिखरखरनखरप्रचयप्रचण्डचपेटापाटित- मत्तमातङ्गोत्तमाङ्गमदच्छटाच्छुरितचारुकेसरभारभास्वरमुखे केसरिणि वनविहाराय विनिर्गते निवासं गिरिगुहां कः पाति पृष्ठतः । प्रतापसहाया हि सत्त्ववन्तः । कश्चपलां राजलक्ष्मीं प्रत्यनुरोधोऽयमार्यस्य यदियमपि न चीवरान्तरितकुचा कुशकुसुमसमित्पलाशपूलिकां वहन्ती तत्रैव तपोवने वनमृगीव नीयते जराजालिनी । किंवा ममानेन वृथा बहुधा विकल्पितेन तूष्णीमेवार्यमनुगमिष्यामि । गुरुवचनातिक्रमकृतं च किल्विषमेतत्तपोवने तप एवापास्यति ।' इत्यवधार्य मनसा प्रथमतनं गतस्तपोवनमधोमुख- स्तूष्णीमवातिष्ठत् । राजसूनुर्दुर्विनीतश्चेत्येतत्प्रस्तावेन तदुक्तम् । खेलाः सविलासाः । अनवदातं निर्म- लम् । सौमित्रिर्लक्ष्मणः । वृकोदरो भीमसेनः । प्रचयः समूहः । चपेटा करतला- घातः । वनमृग्यपि कुशादि वहति । जालिनी मायिनी । कामना करे ? कैसे इस अत्यन्त अनुचित विचार को आर्य ने स्वीकार कर लिया ? क्या उनके मन में लक्ष्मण नहीं रहे, या भीम आदि छोटे भाई विस्मृत हो गए ? अपने भक्तजनों की परवाह न करने वाली, अपने ही स्वार्थ के निष्पादन करने में निष्ठुर आर्य की यह प्रभुता पहले न थी । अगर आर्य तपोवन में चले जाते हैं तब जीने की इच्छा रखने वाला कौन मन से भी पृथिवी की चिन्ता रखे ! वज्र के समान अपने नखों के प्रचण्ड चाँटे से मतवाले हाथी के मस्तक को विदीर्ण कर देने से उत्पन्न मदधारा से भींग हुए केसर के कारण भास्वर मुख वाले सिंह के वन-विहार के लिए निकल जाने पर पीछे कौन उसके निवासस्थान कन्दरा की रक्षा करे ? महानुभाव लोग प्रताप की सहायता लेते हैं । चंचल स्वभाव वाली राजलक्ष्मी के प्रति आर्य का कैसा यह आग्रह है कि चीवर से ढंके स्तनों वाली और कुश, कुसुम, समिधा एवं पलाश की पूली ढोने वाली वन- मृगी के समान अति जर्जर इसे वहीं तपोवन में साथ नहीं ले जाते ? इस तरह के मेरे बहुत संकल्प-विकल्प से क्या मतलब ? मैं तो चुपचाप आर्य के पीछे चल दूँगा । गुरु- वचनों के पालन न करने से उत्पन्न पाप को तपोवन में तप ही दूर करेगा ।' ऐसा निश्चय करके मन से तपोवन में पहले ही पहुँचे हुए हर्ष मुँह नीचा किए चुपचाप बैठे रहे ।
षष्ठ उच्छ्वासः ३१३ अत्रान्तरे पूर्वादिष्टेनेव रुदता वस्त्रकर्मान्तिकेन समुपस्थापितेषु वल्क- लेषु, निर्दयकरतलताडनभियेव कापि गते हृदये, रटति राजस्त्रैणे, तारम- ब्रह्मह्ययमूर्ध्वदोषिण विरुदति विप्रजने, पादप्रणतिपरे फूत्कुर्वति पौरवृन्दे, विद्राति विद्रुतचेतसि चिरंतने परिजने, परिजनाव लम्बिते, गते वर्षीयसि, वेपमानवपुषि, पर्याकुलवाससि, शोकगद्गदवचसि, विगलितनयनपयसि, निवारणोद्यतमनसि, विशति बन्धुवर्गे, निराशेषु नखलिखितमणिकुट्टि- मेष्ववाङ्मुखेषु निःश्वसत्सु सामन्तेषु, सबालवृद्धासु तपोवनाय प्रस्थितासु सर्वासु प्रजासु सहसैव प्रविश्य शोकविक्लवः प्रक्षरन्नयनसलिलो राज्यश्रियः परिचारकः संवादको नाम प्रज्ञाततमो विमुक्ताक्रन्दः सदस्या- त्मानमपातयत् । अथ संभ्रान्तो भ्रात्रा सह स्वयं देवो राज्यवर्धनस्तं पर्यपृच्छत्—'भद्र ! भण भग किमस्मद्व्यसनव्यवसायवर्धनबद्धधृतिः, अवनिपतिमरणमुदित- अत्रेत्यादौ । संवादको नाम सदस्यात्मानमपातयदि ति संबन्धः । कर्मान्तिको- ऽधिकृतः । करतलताडनेति । करतलताडनं हृदये वा । स्त्रैणे स्त्रीसमूहे । 'अब्रह्मण्यम- वध्योक्तौ ।' फूत्करणमुद्दामरोदध्वनिः । विद्रातिः कुत्सितः । गते प्राप्ते । वर्षीयसि वृद्धतरे । इसी बीच पहले ही संहजे हुए वस्त्रकर्मान्तिक ( सरकारी तोशेखाने का अधिकारी ) ने रोते हुए वल्कल हाजिर किया । हृदय मानों हाथों के निर्दय ताड़न के डर से कहीं चला गया । महल की स्त्रियाँ चिल्लाने लगीं । ब्राह्मण लोग हाथ उठा कर जोर से 'हमारा त्याग न करो' इस प्रकार पुकारने लगे । नागरिक लोग पैर पर बार-बार गिर-गिर कर घिघियाने लगे । पुराने सेवक विचलित मन से दौड़ पड़े । बड़े-बूढ़े बाँधव लोगों ने भीतर प्रवेश किया, उन्हें परिजनों ने सम्हाल रखा था, उनके शरीर कांप रहे थे, वस्त्र भी इधर-उधर गिर रहा था, शोक से उनकी वाणी गद्गद थी, नेत्रों से आँसू ढल रहे थे, राज्य- वर्धन को रोकने के लिए उनके मन में व्यग्रता थी । सामन्त लोग निराश होकर मुँह नीचा किए नख से मणिकुट्टिम पर कुछ लिख रहे थे और आह भर रहे थे । लड़के से बूढ़े तक सारी प्रजा तपोवन में जाने के लिए प्रस्थान करने लगी । उसी समय सहसा शोक से व्याकुल, नेत्र से आँसू ढालता हुआ राज्यश्री का संवादक नाम का अत्यन्त परिचित परिचारक रोता-पीटता सभा में आकर गिर पड़ा । तब भाई के साथ घबड़ा कर देव राज्यवर्धन ने उससे पूछा—'हमारे दुःख के व्यापार को बढ़ाने में निश्चल धैर्यवाला, राजा की मृत्यु से प्रसन्न विधि अधीर बना देने वाला
३१४ हर्षचरितम् मतिः, अद्युतिकरमपरमधिकतरमितो दुःखातिशयं समुपनेति विधिः' इति । स कथं कथमप्यकथयत्—'देव ! पिशाचानामिव नीचात्मनां चरितानि छिद्रप्रहारीणि प्रायशो भवन्ति । यतो यस्मिन्नहन्यवनिपति- रुपरत इत्यभूद्वार्त्ता तस्मिन्नेव देवो ग्रहवर्मा दुरात्मना मालवराजेन जीव- लोकमात्मनः सुकृतेन सह त्याजितः । भर्तृदारिकापि राज्यश्रीः कालायस- निगडयुगलचुम्बितचरणा चोराङ्गनेव संयता कान्यकुब्जे कारायां निक्षिप्ता । किंवदन्ती च यथा किलाऽनायकं साधनं मत्वा जिघृक्षुः सुदुर्मतिरेतामपि भुवमाजिगमिषति । इति विज्ञापिते' प्रभुः प्रभवतीति । ततश्च तादृशमनुपेक्षणीयमसंभावितमाकस्मिकमुपरि व्यतिकरमाकर्ण्या- श्रुतपूर्वत्वात्परिभवस्य, परपरिभवासहिष्णुत्या च स्वभावस्य, दर्पबहुलत- या च नवयौवनस्य, वीरक्षेत्रसंभवाच्च जन्मनः, कृपाभूमिभूतायाश्च स्वसुः स्नेहात्स तादृशोऽपि बद्धमूलोऽप्यत्यन्तगुरुनेकपद एवास्य ननाश शोकावेगः । विवेश च सहसा केसरीव गिरिगुहागृहं गभीरहृदयं भयंकरः कोपावेगः । केशिनिषूदनशङ्काकुलकालियकुलभङ्गुरभ्रूभङ्गत रङ्गिणी श्यामायमाना यम- कारायां बन्धने । किंवदन्ती लोकवार्ता । केशिनिषूदनः कृष्णः । यमस्वसा यमुना । सापि कालियाकुला सतरङ्गा, इससे बढ़ कर भी क्या दुःखातिशय उपस्थित कर रहा है ?' उसने किसी प्रकार कहा— 'देव, नीच आत्मा वाले व्यक्ति पिशाचों की तरह छिद्र देख कर प्रहार करते हैं। इसी कारण जिस दिन 'महाराज शान्त हुए' यह समाचार फैला उसी दिन दुरात्मा मालवराज ने देव गृहवर्मा को अपने पुण्य के साथ जीवलोक से हटा दिया। भर्तृदारिका राज्यश्री को भी लोहे की बेड़ियों में जकड़ कर चोर स्त्री के समान कान्यकुब्ज के कारावास में डाल दिया है। यह खबर उड़ रही है कि सेना को नायकहीन जानकर वह दुर्बुद्धि आक्रमण करने के लिए इस ओर भी आना चाहता है। मेरे इस निवेदन में अब आप ही समर्थ हैं।' तब उस प्रकार के अपने ऊपर उपेक्षा न करने योग्य, जिसकी कोई सम्भावना न थी ऐसे आकस्मिक व्यसन को सुन कर अपना परिभव पहले पहल सुनने के कारण, दूसरे द्वारा किया गया अपना परिभव न सहन करने वाले स्वभाव के कारण, कृपा के पात्र बहन के स्नेह से राज्यवर्धन का बद्धमूल भी अत्यन्त गुरुभूत उस प्रकार का शोकावेग एक ही क्षण में नष्ट हो गया। जैसे सिंह पर्वत की कन्दरा में प्रवेश करता है उसी प्रकार उनके हृदय में भयंकर कोप का आवेग प्रविष्ट हुआ। कृष्ण के भय से व्याकुल कालियनाग