हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २४ ) के साथ कादम्बरी के पद-पद में भीन गए हैं। यही कारण है कि कवि की सफलता हर्ष- चरित की अपेक्षा कादम्बरी में अधिक समझी जाती है। हर्षचरित में जो सेनापति सिंहनाद का उपदेश है उसकी कोटि में कादम्बरी का शुकनासोपदेश कितना विस्तृत और पूर्ण बन गया है। ऐसा लगता है जैसे महर्षि व्यास ने महाभारत के एक अतिरिक्त प्रकरण में गीता को उपनिबद्ध कर दिया है वैसे ही महाकवि बाण ने शुकनासोपदेश के नाम से एक अतिरिक्त रचना ही कादम्बरी में उपनिबद्ध कर दी हो। कादम्बरी शताधिक वर्णनों का अद्भुत संग्रह है। डा० वासुदेवशरणजी अग्रवाल के शब्दों में कादम्बरी में बाण की वर्णन-क्षमता का मृदीकापाक हुआ है। बाण की चित्र- ग्राहिणी प्रतिभा वर्णनों में वर्णनातीत सफल हुई है। कादम्बरी में बाण ने नदी, वन, वृक्ष, सरोवर, नगर, सायं-प्रातः, चन्द्रोदय, धूलिपटल, राजकुल, इन्द्रायुध अश्व आदि के वर्णनों में बड़ी दूरदर्शिता से काम लिया है। व्यक्ति के चित्रण में, उसके सौन्दर्य की सूक्ष्मतम कलना में बाण के अतिरिक्त कौन सफल हो सकता है? यद्यपि संस्कृत-साहित्य में वर्णनकर्ता कवियों की कमी नहीं है, कालिदास का तो कहना क्या ? लेकिन बाण विस्तार-प्रधान वर्णन के पक्षपाती हैं। कालिदास जिस चित्र को थोड़े में ही अंकित कर सके हैं उसे बाण ने भव्य रूप देकर बड़ा बना दिया है। यही कारण है कि कालिदास के पश्चात् सर्वाधिक मौलिकता बाण की अपेक्षा अन्य को नहीं मिली। बाण की दृष्टि में किसी विशेष वर्णन में पक्षपात नहीं दिखाई देता। बाण जिस सूक्ष्मता से धवलदेहकान्तिप्रतिमण्डिता महाश्वेता का वर्णन करते हैं उसी सूक्ष्मता से नीलम की पुतली के समान काली-कलूटी चाण्डालकन्या का भी वर्णन करते हैं। अपेक्षाकृत बाण के वर्णन प्रातःकाल से अधिक सायंकाल के ही मिलते हैं। सम्भव है प्रातःकाल की अपेक्षा सायंकाल का दृश्य ही उनको अधिक पसंद था। नगरी उज्जयिनी के वर्णन से जाबालि के शान्त और पवित्र आश्रम का वर्णन भी कम अद्भुत नहीं। कादम्बरी के सौन्दर्य-वर्णनों में भी कम आकर्षण नहीं। मानवी सौन्दर्य का वर्णन और तद्वाची शब्दों की विकसित सामग्री भी कालिदास से कहीं अधिक बाण की इस रचना में मिल जाती है। इसके अतिरिक्त इन्द्रायुध अश्व के सजीव वर्णन से बाण को 'तुरङ्गबाण' की पदवी भी मिली है। बाण के साहित्य के प्राण वर्णन ही हैं। उन्हें अलग कर देने पर कथा कुछ भी न रह जायगी। बाण अत्यन्त परिहास-प्रिय व्यक्ति थे। कादम्बरी के चंडिका-मन्दिर के बुड्ढे पुजारी के वर्णन में उनकी परिहास-प्रियता का पता चलता है। उस पुजारी के वर्णन में बाण ने खुलकर मजाक किया है। 'देवी के चरणों पर बार-बार माथा रगड़ने से उसके माथे पर