हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २६ ) 'घट्टा पड़ गया था। किसी कठबैद द्वारा दिए हुए सिद्धांजन से उसकी एक आँख फूट गई थी इसलिए वह दूसरी आँख में प्रतिदिन तीन बार अंजन लगाता था जिससे लकड़ी की सलाई भी घिस कर चिकनी हो गई थी। रेशम के कोये का छल्ला पैर के अँगूठे में मढ़ लेने के कारण उसकी काट से अंगूठा घायल हो गया था। पिशाच चढ़े हुए लोगों का भूत उतारने के लिए वह मंत्र पढ़कर पीली सरसों से बार-बार उन्हें मारता तो वे भी उसकी ओर लपक कर लप्पड़ मारते जिससे उसका कान दब कर चपटा हो गया था। वह दिन भर मच्छर की तरह भनभनाता हुआ सिर हिला कर कुछ गुनगुनाता रहता था। वह लाचारी ब्रह्मचारी था, अतएव जब दूर जगहों से आकर ठहरी हुई बुड्ढी तापसियों को देखता तो ताव खा-खा कर स्त्रीवशीकरण चूर्ण का उन पर प्रयोग करता था। कभी आए हुए बटोइयों को वहाँ न ठहरने देने के लिए उनसे जूझ जाता और तब वे भी बिगड़ कर उसके साथ गुत्थम-गुत्था करने लगते और उसे पटक कर उसकी पीठ चटका देते। रतौंधी के कारण वह दिन में ही आ-जा लेता। उसका पेट् निकला हुआ था और खाने की कोई थाह न थी। फागुन में जब लोगों को मस्ती चढ़ती तो वे मचियासहित किसी बूढ़ी दासी को उठा ले आते और उसके साथ ब्याह रचा कर उसकी ठठोली करते।' इस प्रकार बाण के इस बुड्ढे पुजारी को देख कर मन में रस भर आते हैं। हास्य, बीभत्स और भयानक का जीता-जागता चित्र बाण ने यहाँ देकर अपनी अद्भुत कला का प्रदर्शन-किया है। कादम्बरी का एक प्रसंग बहुत ही आश्चर्यकारी है जहाँ बाण की कथा-निर्माणक्षमता का अनुमान सहज ही होने लगता है। जब महाश्वेता के साथ चन्द्रापीड़ कादम्बरी के यहाँ भवन में जाकर ताम्बूल द्वारा उससे सम्मानित होते हैं। तत्पश्चात् उस समय कथा- क्रम शिथिल होता प्रतीत होता है। सबके सब चुपचाप यथास्थान बैठते हैं। कादम्बरी, चन्द्रापीड़, महाश्वेता एवं और सब उपस्थित सखी और परिजनों के लिए इस समय ऐसे हल्के झोंके की आवश्यकता थी कि जिससे फिर वे अपनी स्वाभाविक स्थिति प्राप्त कर सकें। बाण ने वहाँ सहसा एक सारिका और परिहास नामक शुक के झगड़े का प्रसंग लाकर कथा के प्रवाह को विलक्षण युक्ति से सम्हाल लिया है। चन्द्रापीड़ ने इस प्रसंग में नर्म-भाषित करके सबको प्रभावित कर लिया। वहाँ का वातावरण उन पर हावी न हो सका। वहाँ के लोगों और चन्द्रापीड़ में अपरिचयकृत दूरी हट गई और वे उन सबके ऊपर प्रभावशाली हो गए तथा परस्पर सबके निकट आ गए। इस प्रकार बाण की लेखनी कथा के वस्तु-विन्यास-वर्णनों के संवर्धन एवं मानस भावों के अंकन में सर्वत्र जागरूक रहती है। वर्णनों की भरमार से कथा-प्रवाह के शिथिल प्रतीत होते हुए भी उनकी सरसता एवं चित्रमयता से पाठक को किसी प्रकार का उद्वेजन नहीं हो पाता। वह कथा के अग्रिम