भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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( २७ ) मोड़ से परिचित होने के लिए उत्सुक होकर भी तत्काल वर्णनों के भीतर इतना डूब जाता है कि कथा की ओर से उसका ध्यान हट जाता है। इसे बाण की अपनी विशेषता समझनी चाहिए। यह पहले कहा जा चुका है कि कादम्बरी का उत्तर भाग बाणभट्ट के सुयोग्य पुत्र की रचना है। सौभाग्य की बात है कि उत्तरभाग भी बाणरचित पूर्वभाग की तरह ही बन गया है। सम्भव था बाण कुछ और विस्तृत करके लिखते। उत्तरभाग को देख कर ऐसा लगता है कि अगर भूषणभट्ट या पुलिन्द(न्ध)भट्ट ने अपना नाम बिना लिखे ही कादम्बरी की पूर्ति कर दी होती तो निश्चय ही यह किसी के लिए निर्णय करना कठिन हो जाता कि पूरी रचना एक ही कवि की है या नहीं। हाँ, इतना तो लोग अवश्य कहते कि बाण अन्त में चल कर हड़बड़ा गए और कथा को शीघ्र समाप्त कर डाला। कहीं उत्तर भाग में भी पूर्व- भाग के टक्कर की रचना हो गई है। फिर भी बाण-पुत्र यह कहते हुए तनिक भी रुकते नहीं कि मैंने पिता की वाणी के समुद्रगामी प्रवाह में अपनी वाणी की धारा मिला दी जिससे कथा समाप्ति को प्राप्त हो सके। उनका यह कथन सर्वथा सत्य है। बाण की धारा में मिल पाने से ही उनकी वाणी यह काम कर सकी, अन्यथा बाण-जैसे वर्णनशिल्पी के सामने किसी दूसरे का डट पाना कभी सम्भव न था। बाण-पुत्र में कुछ-कुछ कवित्व का जो गुण था वह उनके पिता के आशीर्वाद का ही फल था। उन्होंने कादम्बरी के सम्बन्ध में कहा है— कादम्बरीरसभरेण समस्त एव मत्तो न किञ्चिदपि चेतयते जनोऽयम् । भीतोऽस्मि यन्न रसवर्णविवर्जितेन तच्छेषमात्मवचसाऽप्यनुसन्दधानः ॥ अर्थात् कादम्बरी (एक प्रकार की मदिरा तथा कादम्बरीकथा) के उत्तम रस को पीकर सहृदय जनों का वर्ग बिलकुल छक कर अपनी सुध-बुध खो बैठा है। ऐसी स्थिति में रस और वर्ण से विहीन अपनी वाणी द्वारा कादम्बरी की पूर्ति करते हुए मुझे कुछ भय नहीं, क्योंकि बेहोशी में किसी को पता न चलेगा। बाण की दृष्टि में काव्य का स्वरूप बाण की शैली जानने से पूर्व हमें बाण के विचार में काव्य के स्वरूप को जान लेना चाहिए। बाण काव्य के स्वरूप के संबन्ध में अपनी अलग दृष्टि रखते हैं, जैसा कि हर्ष- चरित के आरम्भ में उन्होंने समझाया है। बाण को उन कवियों की कविता पसंद न थी जो राग-द्वेष से भर कर मनमाने ढंग से बकवास करते हैं। बाण के अनुसार ऐसे 'वाचाल' और 'कामकारी' लोग ही कुकवि हो जाते हैं। नई वस्तु उत्पन्न करने वाला ही सच्चे अर्थ