हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
( २६ ) 'घट्टा पड़ गया था। किसी कठबैद द्वारा दिए हुए सिद्धांजन से उसकी एक आँख फूट गई थी इसलिए वह दूसरी आँख में प्रतिदिन तीन बार अंजन लगाता था जिससे लकड़ी की सलाई भी घिस कर चिकनी हो गई थी। रेशम के कोये का छल्ला पैर के अँगूठे में मढ़ लेने के कारण उसकी काट से अंगूठा घायल हो गया था। पिशाच चढ़े हुए लोगों का भूत उतारने के लिए वह मंत्र पढ़कर पीली सरसों से बार-बार उन्हें मारता तो वे भी उसकी ओर लपक कर लप्पड़ मारते जिससे उसका कान दब कर चपटा हो गया था। वह दिन भर मच्छर की तरह भनभनाता हुआ सिर हिला कर कुछ गुनगुनाता रहता था। वह लाचारी ब्रह्मचारी था, अतएव जब दूर जगहों से आकर ठहरी हुई बुड्ढी तापसियों को देखता तो ताव खा-खा कर स्त्रीवशीकरण चूर्ण का उन पर प्रयोग करता था। कभी आए हुए बटोइयों को वहाँ न ठहरने देने के लिए उनसे जूझ जाता और तब वे भी बिगड़ कर उसके साथ गुत्थम-गुत्था करने लगते और उसे पटक कर उसकी पीठ चटका देते। रतौंधी के कारण वह दिन में ही आ-जा लेता। उसका पेट् निकला हुआ था और खाने की कोई थाह न थी। फागुन में जब लोगों को मस्ती चढ़ती तो वे मचियासहित किसी बूढ़ी दासी को उठा ले आते और उसके साथ ब्याह रचा कर उसकी ठठोली करते।' इस प्रकार बाण के इस बुड्ढे पुजारी को देख कर मन में रस भर आते हैं। हास्य, बीभत्स और भयानक का जीता-जागता चित्र बाण ने यहाँ देकर अपनी अद्भुत कला का प्रदर्शन-किया है। कादम्बरी का एक प्रसंग बहुत ही आश्चर्यकारी है जहाँ बाण की कथा-निर्माणक्षमता का अनुमान सहज ही होने लगता है। जब महाश्वेता के साथ चन्द्रापीड़ कादम्बरी के यहाँ भवन में जाकर ताम्बूल द्वारा उससे सम्मानित होते हैं। तत्पश्चात् उस समय कथा- क्रम शिथिल होता प्रतीत होता है। सबके सब चुपचाप यथास्थान बैठते हैं। कादम्बरी, चन्द्रापीड़, महाश्वेता एवं और सब उपस्थित सखी और परिजनों के लिए इस समय ऐसे हल्के झोंके की आवश्यकता थी कि जिससे फिर वे अपनी स्वाभाविक स्थिति प्राप्त कर सकें। बाण ने वहाँ सहसा एक सारिका और परिहास नामक शुक के झगड़े का प्रसंग लाकर कथा के प्रवाह को विलक्षण युक्ति से सम्हाल लिया है। चन्द्रापीड़ ने इस प्रसंग में नर्म-भाषित करके सबको प्रभावित कर लिया। वहाँ का वातावरण उन पर हावी न हो सका। वहाँ के लोगों और चन्द्रापीड़ में अपरिचयकृत दूरी हट गई और वे उन सबके ऊपर प्रभावशाली हो गए तथा परस्पर सबके निकट आ गए। इस प्रकार बाण की लेखनी कथा के वस्तु-विन्यास-वर्णनों के संवर्धन एवं मानस भावों के अंकन में सर्वत्र जागरूक रहती है। वर्णनों की भरमार से कथा-प्रवाह के शिथिल प्रतीत होते हुए भी उनकी सरसता एवं चित्रमयता से पाठक को किसी प्रकार का उद्वेजन नहीं हो पाता। वह कथा के अग्रिम
( २७ ) मोड़ से परिचित होने के लिए उत्सुक होकर भी तत्काल वर्णनों के भीतर इतना डूब जाता है कि कथा की ओर से उसका ध्यान हट जाता है। इसे बाण की अपनी विशेषता समझनी चाहिए। यह पहले कहा जा चुका है कि कादम्बरी का उत्तर भाग बाणभट्ट के सुयोग्य पुत्र की रचना है। सौभाग्य की बात है कि उत्तरभाग भी बाणरचित पूर्वभाग की तरह ही बन गया है। सम्भव था बाण कुछ और विस्तृत करके लिखते। उत्तरभाग को देख कर ऐसा लगता है कि अगर भूषणभट्ट या पुलिन्द(न्ध)भट्ट ने अपना नाम बिना लिखे ही कादम्बरी की पूर्ति कर दी होती तो निश्चय ही यह किसी के लिए निर्णय करना कठिन हो जाता कि पूरी रचना एक ही कवि की है या नहीं। हाँ, इतना तो लोग अवश्य कहते कि बाण अन्त में चल कर हड़बड़ा गए और कथा को शीघ्र समाप्त कर डाला। कहीं उत्तर भाग में भी पूर्व- भाग के टक्कर की रचना हो गई है। फिर भी बाण-पुत्र यह कहते हुए तनिक भी रुकते नहीं कि मैंने पिता की वाणी के समुद्रगामी प्रवाह में अपनी वाणी की धारा मिला दी जिससे कथा समाप्ति को प्राप्त हो सके। उनका यह कथन सर्वथा सत्य है। बाण की धारा में मिल पाने से ही उनकी वाणी यह काम कर सकी, अन्यथा बाण-जैसे वर्णनशिल्पी के सामने किसी दूसरे का डट पाना कभी सम्भव न था। बाण-पुत्र में कुछ-कुछ कवित्व का जो गुण था वह उनके पिता के आशीर्वाद का ही फल था। उन्होंने कादम्बरी के सम्बन्ध में कहा है— कादम्बरीरसभरेण समस्त एव मत्तो न किञ्चिदपि चेतयते जनोऽयम् । भीतोऽस्मि यन्न रसवर्णविवर्जितेन तच्छेषमात्मवचसाऽप्यनुसन्दधानः ॥ अर्थात् कादम्बरी (एक प्रकार की मदिरा तथा कादम्बरीकथा) के उत्तम रस को पीकर सहृदय जनों का वर्ग बिलकुल छक कर अपनी सुध-बुध खो बैठा है। ऐसी स्थिति में रस और वर्ण से विहीन अपनी वाणी द्वारा कादम्बरी की पूर्ति करते हुए मुझे कुछ भय नहीं, क्योंकि बेहोशी में किसी को पता न चलेगा। बाण की दृष्टि में काव्य का स्वरूप बाण की शैली जानने से पूर्व हमें बाण के विचार में काव्य के स्वरूप को जान लेना चाहिए। बाण काव्य के स्वरूप के संबन्ध में अपनी अलग दृष्टि रखते हैं, जैसा कि हर्ष- चरित के आरम्भ में उन्होंने समझाया है। बाण को उन कवियों की कविता पसंद न थी जो राग-द्वेष से भर कर मनमाने ढंग से बकवास करते हैं। बाण के अनुसार ऐसे 'वाचाल' और 'कामकारी' लोग ही कुकवि हो जाते हैं। नई वस्तु उत्पन्न करने वाला ही सच्चे अर्थ
( २८ ) में कवि कहलाने योग्य है और वही 'उत्पादक' है । बाण केवल स्वभावोक्ति ( जाति ) के पक्षपाती न थे । प्रायः उन दिनों साहित्य में कविता के नाम पर प्रचुर मात्रा में स्वभा- वोक्तिशैली का प्रचलन था । बाण की प्रतिक्रिया यह थी कि स्वभावोक्ति किसी प्रकार भी कविता नहीं हो सकती; क्योंकि उसमें नवीनता का सर्वथा अभाव रहता है । आगे चल कर अलंकारशास्त्र के आचार्यों ने वक्रोक्तिवाद को खड़ा करके बाण के निर्दिष्ट मार्ग का अनुसरण किया । स्वभावोक्ति एक अलंकारमात्र तक सीमित रह गई । वस्तु के यथार्थ रूप में कोई आकर्षण नहीं रहता, अन्यथा कविता लिखने की कोई आवश्यकता ही नहीं । कवि वस्तु के यथार्थ रूप को बदल डालता है और अपनी प्रतिभा से नई वस्तु का निर्माण करता है, यही बाण का अभिप्रेत पक्ष था । वक्रोक्ति ने श्लेषप्रधान शैली को उत्पन्न किया । श्लेषपूर्ण शैली का काव्य-निर्माण भी चल पड़ा । उसकी झलक बाण के पूर्ववर्त्ती सुबन्धु की प्रत्यक्षरश्लेषमय रचना वासवदत्ता में मिलती है । यह शैली बाण को भी पसंद थी । कादम्बरी में उन्होंने लगातार श्लेषों से भरी हुई ( निरन्तरश्लेषघना ) शैली की प्रशंसा की है । वस्तु की भावात्मक रचना में जब तक शब्दों की मरोड़ से उत्पन्न नवत्य का साक्षात्कार नहीं मिलता तब तक कवि प्रशंसा के पात्र नहीं, सम्भवतः बाण की यही दृष्टि थी । यह भी बात नहीं कि जाति या स्वभावोक्ति शैली बाण को सर्वथा अनभिमत थी, उन्होंने अग्राम्या जाति की प्रशंसा की है, अर्थात् वह स्वभावोक्ति जो केवल वस्तु के यथार्थ रूप का चित्रण न होकर सुन्दरतापूर्ण चित्रण हो, बाण को सर्वथा मान्य थी । बाण कविता में समन्वय दृष्टि के पक्षपाती थे । वे एकांगी दृष्टि को कविता के लिए उपयुक्त नहीं मानते थे । उन दिनों प्रायः पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण के कवि लोग एकांगी दृष्टि से काव्य लिखते थे, जैसा कि बाण ने स्वयं निर्देश किया है— श्लेषप्रायमुदीच्येषु प्रतीच्येष्वर्थमात्रकम् । उत्प्रेक्षा दाक्षिणात्येषु गौडेष्वक्षरडम्बरम् ॥ ( हर्ष० ) अर्थात् उत्तर के लोगों में श्लेष-प्रधान शैली में रचना करने की प्रवृत्ति है, पश्चिम के लोग अर्थमात्र पर ध्यान देते हैं, भाषा कैसी भी हो अर्थ बढ़िया होना चाहिए । दाक्षिणात्य लोग उत्प्रेक्षा करने में खूब पड़ हैं, उत्प्रेक्षाशैली उड़ान भरना या हद तक कल्पना करना है, गौड़ देश के निवासी कवियों में अक्षराडम्बर ही खूब चलता है । अक्षराडम्बर अर्थात् विकट शब्दों की योजना का आनुप्रासिक प्रवृत्ति से तात्पर्य है । इस प्रकार चारों ओर साहित्यिक समाज में एकांगी दृष्टि से काव्य-निर्माण की प्रवृत्ति चल पड़ी थी जो बाण को अभिप्रेत न थी । बाण कविता में सब शैलियों का समन्वय मानते थे । बाण की दृष्टि में बढ़िया काव्य वह है जिसमें पाँच बातों का मेल हो—
( २६ ) नवोऽर्थो जातिरग्राम्या श्लेषोऽक्लिष्टः स्फुटो रसः। विकटाक्षरबन्धश्च कृत्स्नमेकत्र दुर्लभम् ॥ ( हर्ष० श्लोक १।८ ) अर्थात् विषय की नवीनता, सुन्दर लगने वाली स्वभावोक्ति, श्लेष ऐसा जो क्लिष्ट न हो, स्फुट रस, जिसके निर्णय के लिए सहृदय को विशेष माथा-पच्ची न करनी पड़े, विकट या भारी भरकम शब्दों की योजना । बाण का कहना है कि सब मिल कर ये पाँचों बातें किसी एक काव्य में दुर्लभ हैं, परन्तु सच्चे अर्थ में वही काव्य कहने योग्य है जिसमें इन सब का समन्वय हो । बाण ने अपने काव्यों में इनके समन्वय का हमेशा ध्यान रखा है । बाण की यह समन्वयप्रधान शैली किसी प्रकार के एकांगी दृष्टिकोण के अधीन नहीं रही, यही उसकी विशेषता है । सचमुच श्लाघनीय रचना समन्वयप्रधान दृष्टिकोण का कवि ही कर सकता है, बाण की सफलता का रहस्य भी यही है । बाण की रचना में विषय की सर्वाधिक नूतनता, सरल श्लेष-प्रधान शैली की अद्भुत योजना, वस्तुओं का अग्राम्य यथार्थ-वर्णन, समासबहुल पदविन्यास तथा कथावस्तु का ग्रथन, इन सब का विलक्षण सामंजस्य मिल जाता है । कहा गया है कि बाण मनमाने ढंग की कविता करने वाले वाचाल एवं अनुत्पादक कवियों से खूब चिढ़े हुए थे । दूसरे कवि के वर्णों को बदल कर उनके स्थान में अपने शब्द रख कर काव्य निर्माण की प्रवृत्ति रखने वाले कवि बाण के शब्दों में चोर होते हैं । वे सहज ही पकड़ जाते हैं। ऐसे कवियों की रचना किसी अंश में आदर के योग्य नहीं। बाण की दृष्टि में कविता की भूमिका अपने स्वरूप में सर्वथा मौलिक और महत्त्वपूर्ण है । कविता की सिद्धि के लिए कवि को महती साधना करनी पड़ती है । साधना-विहीन कवि किसी प्रकार भी कविता की उच्च भूमिका में नहीं पहुँच सकता । बाण ने किसी विशेष कवि का नाम लेकर इस प्रकार की कुछ भी निन्दा की बात नहीं कही है । व्यक्तिगत आक्षेप बाण को अभिमत नहीं । प्रशंसा के अवसर पर वे विशेष कवियों की चर्चा हृदय खोल कर करते हैं । इसी प्रसंग में बाण ने अनेक कवियों का आदर-पूर्वक स्मरण किया है । सर्वविद् महर्षि व्यास और आख्यायिका निर्माण करने वाले कवीश्वरों की वन्दना के पश्चात् बाण अपने पूर्ववर्ती गद्यकाव्य वासवदत्ता की प्रशंसा करते हैं । वासवदत्ता सुबन्धु- कृत होनी चाहिए । किन्तु कुछ विद्वानों को कथा के रूप में सुबन्धु की उपलब्ध श्लेष-बहुल- रचना वासवदत्ता आख्यायिका के प्रसंग में कवियों के दर्प को विचलित करने वाला बाण की निर्दिष्ट ( आख्यायिका ) वासवदत्ता से अतिरिक्त लगती है । अस्तु, वे वासवदत्ता के गुण से प्रभावित अवश्य थे, पर अन्य कवियों की तरह विगलित-दर्प न थे, क्योंकि कादम्बरी
( ३० ) के आरम्भिक पद्यों में बाण ने अपनी कथा को 'निरन्तरश्लेषघना' और 'अतिद्वयी' अर्थात् वासवदत्ता और गुणाढ्यकृत बृहत्कथा का अतिक्रमण करने वाली कहा है। फिर बाण ने भट्टार हरिचन्द्र नामक कवि के गद्यबन्ध की चर्चा की है, जिसमें पद- बन्ध उज्ज्वल, मनोहर तथा अनुप्रास के रूप में क्रम से वर्णों की स्थिति है। उसकी शैली बाण के लिए आदर्श थी। भट्टार हरिचन्द्र के गद्यबन्ध के उपलब्ध न होने से यह ठीक पता नहीं चलता कि वे कौन थे। सम्भावना है कि राजशेखर ने जिन हरिचन्द्र का उल्लेख किया है वे ही बाण के भट्टार हरिचन्द्र हों। इस प्रकार बाण ने सातवाहन के सुभाषित- कोश गाथासप्तशती, प्रवरसेन की प्रसिद्ध रचना सेतुबन्ध और भास के यशस्वी नाटकों का सादर संस्मरण किया है। महाकवि कालिदास बाणभट्ट के अत्यन्त प्रिय कवि थे। बाण ने उनकी मधुरसार्द्र सूक्तियों में खूब आनन्द लिया था। सचमुच कालिदास के बाद बाण का ही नाम लिया जा सकता है। बाण ने कालिदास को खूब समझा है और उनकी शैली को आदर्श मान कर और भी पल्लवित रूप में निर्माण करने की अद्भुत क्षमता अर्जित की है। गुणाढ्य की बृहत्कथा और आढ्यराज नामक कवि के काव्योत्साह भी बाण के लिए आश्चर्यकारी थे। आढ्यराज की प्रशंसा में बाण कहते हैं कि जिह्वा ही भीतर की ओर खिंच जाती है और कविता करने के लिए प्रवृत्त नहीं होती। इस प्रकार बाणभट्ट जितने अंश में दोषज्ञ थे उतने ही अंश में गुणज्ञ भी। फिर भी किसी विशेष के प्रति उनकी बुरी धारणा न थी। बाण के साहित्य में ऐसे व्यक्ति का कोई भी निर्देश नहीं मिलता जिससे बाणभट्ट क्षुब्ध हों। कादम्बरी में उन्होंने थोड़े में ही अपनी काव्यनिर्माणशैली की ओर संकेत किया है। जैसा कि कहा जा चुका है श्लेष- प्रधान शब्दों की अद्भुत योजना ही बाण की शैली की विशेषता है। कादम्बरी में इस शैली की प्रांजलता का साक्षात्कार होता है। बाण के शब्दों में बाण की शैली को 'निरन्तर- श्लेषघना' कहना चाहिए। आख्यायिका और कथा महाकवि बाण आख्यायिका और कथा दोनों के लेखक हैं। हर्षचरित आख्यायिका है और कादम्बरी कथा। अमरकोश में 'आख्यायिकोपलब्धार्था' कहा है, अर्थात् आख्या- यिका वह कथा है जिसका सत्यार्थ ज्ञात हो। कथा का विषय कल्पित होता है। आगे चल कर आख्यायिका के इस लक्षण का विकास हुआ और भिन्न-भिन्न आचार्यों ने अपनी-अपनी परिभाषा की। हर्षचरित और कादम्बरी को देख कर आख्यायिका का विषय ऐतिहासिक
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होना और कथा का कल्पनाप्रसूत होना, ऐसा ज्ञात होता है। अग्निपुराण के अनुसार आख्यायिका वह है जिसमें लेखक के वंश की प्रशंसा कुछ विस्तार से हो, कन्याहरण, संग्राम, विप्रलम्भ आदि विपत्तियों का वर्णन हो, रीति और वृत्ति अति प्रदीप्त शैली में हों, परिच्छेदों का नाम उच्छ्वास हो, चूर्णक शैली का बाहुल्य हो तथा वक्त्र और अपवक्त्र नामक श्लोक हों (अग्नि० ३३६।१३-१४)। कथा में इसके विपरीत कुछ श्लोकों में कवि-वंश का संक्षिप्त वर्णन हो, मुख्यार्थ के अवतरण के रूप में दूसरी कथा कही जाय, जिसमें परिच्छेद न हों अथवा कहीं पर लम्बक हों (अग्नि० ३३६।१५-१७)। दण्डी ने भी काव्यादर्श में दोनों के भेद बताने का प्रयत्न किया है। आख्यायिका का वक्ता स्वयं नायक होता है, कथा का नायक या अन्य कोई; किन्तु यह नियम सर्वत्र लागू नहीं। दण्डी दोनों में किसी विशेष अन्तर के पक्षपाती न थे। नाममात्र का ही भेद है यही उनका तात्पर्य था। पर बाण ने दोनों को अलग-अलग माना है। हर्षचरित में वक्रादि छन्दों का भी प्रयोग किया है और उच्छ्वास के रूप में विभाग किया है। कथा में बाण ने इससे बिलकुल भिन्न दृष्टि अपनाई है। आगे चल कर आचार्यों ने हर्षचरित और कादम्बरी को देख कर ही आख्यायिका और कथा के लक्षण बनाये हैं। दण्डी के अनुसार नाम-भेद वाला पक्ष किसी को सम्मत नहीं। बाण ने अनेक आख्यायिकाकार कवियों की आख्यायिकाएँ देखी थीं। सम्भवतः महाभाष्य में उल्लिखित वासवदत्ता नाम की आख्यायिका से ही बाण परिचित हों। सुबन्धु की वासवदत्ता, जो कथारूप में अभी उपलब्ध है, बाण के बाद' की रचना हो। पतंजलि ने वासवदत्ता के अतिरिक्त सुमनोत्तरा और भैमरथी आख्यायिकाओं का भी उल्लेख किया है। तात्पर्य यह कि बाण का हर्षचरित संस्कृत-साहित्य की पहली आख्यायिका नहीं, पर यह अवश्य है कि उपलब्ध पहली आख्यायिका यही दृष्टिपथ में आती है।
बाण की शैली
अब हमें संक्षेप में बाण की शैली के आधार पर वर्णनों का अध्ययन कर लेना चाहिए। बाण के समय से ही चार प्रकार की गद्यशैलियाँ चल पड़ी थीं, जिनमें बाण के साहित्य में तीन मिलती हैं, जैसे—एक दीर्घ समास वाली, दूसरी अल्प समास वाली और तीसरी समास-रहित । लम्बे-लम्बे समासों वाली शैली को उत्कलिका, छोटे- छोटे समासों वाली शैली को चूर्णक और समासरहित शैली को आविद्ध कहते हैं। बाण को इन तीनों शैलियों में बड़ी सफलता प्राप्त थी। उन्हें किसी विशेष शैली पर आग्रह नहीं था, फिर भी उत्कलिका अर्थात् दीर्घ समास वाली शैली बाण के चित्रात्मक प्रसंग
३ ह० भू०
( ३२ ) के अनुकूल पड़ती थी। इसलिए बाण वर्णनों में प्रायः इसका आश्रयण करते हैं। हर्षचरित के दधीचवर्णन, ग्रीष्मवर्णन आदि प्रसंगों में विशेष रूप से यह शैली प्रयुक्त है। वर्णनों में चलचित्र के समान शब्दों के माध्यम से छोटे-छोटे चित्र प्रस्तुत करने पड़ते हैं। संस्कृत भाषा की यह महती विशेषता है कि उन लघु चित्रों को प्रस्तुत करने में कवि कई शब्दों को गूँथकर एक लड़ी बना डालता है। बाण के जिस वर्णन को लीजिए उसमें दीर्घ समासों वाली शैली मिलेगी। वर्णन के अन्त में प्रायः बाण उत्कलिका को छोड़कर समासरहित आविद्ध शैली का आश्रयण करते हैं। आविद्ध शैली में किसी चित्र को प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। वस्तु से सम्बन्धित कुछ बातों की सामान्य चर्चा के लिए यह उपयोगी है। बाण ने अपने वर्णनों में प्रायः ऐसा ही किया है। चूर्णकशैली को जिसमें छोटे-छोटे समास होते हैं, बाण खूब लिखते हैं। इसके लिए कोई खास नियम नहीं है। वर्णन करते-करते कभी-कभी शास्त्रीय उपदेश भी करने की प्रवृत्ति बाण के साहित्य में जगह-जगह मिलती है। उसमें प्रायः अल्पसमास चूर्णकशैली बाण को पसंद है। बाण की शैली का निखरा हुआ रूप हर्षचरित के चतुर्थ उच्छ्वास में जहाँ राज्यश्री के विवाह का प्रसंग है, मिलता है। हर्षचरित की अपेक्षा कादम्बरी के वर्णन चित्रमयता और प्रांजलता तथा सरसता की दृष्टि से अपूर्व बन पड़े हैं। महाश्वेता, कादम्बरी आदि के वर्णनों में बाण की अलौकिक वर्णन-क्षमता का परिचय मिलता है। बाण स्वयं कादम्बरी में गद्य की उत्कृष्ट शैली की ओर संकेत करते हुए लिखते हैं— 'उत्कृष्टकविगद्यमिव विविधवर्णश्रेणिप्रतिपाद्यमानानभिनवार्थसञ्चयम्।' अर्थात् नाना प्रकार के वर्णों द्वारा नये अर्थ-समूह का प्रतिपादन करने वाला गद्य उत्कृष्ट होता है अथवा वह उत्कृष्ट कवि द्वारा लिखा जाता है। रीति की दृष्टि से बाण में पाञ्चाली रीति का प्राचुर्य है। स्वयं भोजराज भी इसे स्वीकार करते हैं— शब्दार्थयोः समो गुम्फः पाञ्चाली रीतिरिष्यते । शिलाभट्टारिकावाचि बाणोक्तिषु च सा यदि ॥ ( सरस्वतीकण्ठाभरण ) अर्थात् शब्द और अर्थ का समान रूप से गुम्फन पाञ्चाली रीति में होता है, वह शिलाभट्टारिका और बाण दोनों की उक्तियों में पाई जाती है। विषय के अनुरूप शब्दावली का प्रयोग ही पाञ्चाली रीति का तात्पर्य है। बाण इसके सिद्धहस्त कवि हैं। इस भूमिका में बाण के जीवन और साहित्य के सम्बन्ध में कुछ उपयोगी बातों की चर्चा की गई है। आशा है बाण के विद्यार्थी इससे लाभान्वित होंगे। श्रद्धेय डा० वासुदेव शरणजी अग्रवाल ने हर्षचरित और कादम्बरी पर अलग-अलग अपना सांस्कृतिक अध्ययन
प्रस्तुत किया है। भूमिका में मैंने उनकी दृष्टि का बहुत अंश में अनुसरण करने का प्रयत्न किया है। बाण के साहित्य को जानने के लिए जो कुछ अन्य स्रोत भी मिले हैं मैंने उनका उपयोग किया है।
अनुवाद के सम्बन्ध में
हर्षचरित का अनुवाद मैंने किया यह कहने की हिम्मत मुझमें नहीं। अनुवाद आरम्भ करने के पूर्व मैंने अपने गुरुदेव डा० अग्रवाल जी से इस सम्बन्ध में पूछा था। उन्होंने सहर्ष अनुमति दी और उत्साहित किया। तत्काल स्वयं चौखम्बा विद्याभवन के अध्यक्ष महोदय से उन्होंने बातें भी कर लीं और मुझे अनुवाद तैयार करने के लिए सूचित किया। उन्होंने उत्साहित करते हुए यह कहा कि कहीं शंका हो तो पूछ लेना। मैंने अपना कार्य आरम्भ कर दिया। इसी बीच अध्यापनार्थ मुझे वैद्यनाथधाम गुरुकुल आना पड़ा। मैं ज्यों-ज्यों आगे बढ़ता गया मेरी कठिनाइयाँ भी बढ़ने लगीं। किसी किसी प्रसंग में मैंने अपने आपको सर्वथा असमर्थ पाया। अनुवाद की परिसमाप्ति की लोलुपता और गुरुदेव का असांनिध्य दोनों ने मुझे अहोरात्र उद्वेलित किया। तब मैंने ऐसे प्रसंगों में 'हर्षचरित एक सांस्कृतिक अध्ययन' की शरण ली और बड़ी सरलता से पूरे ग्रन्थ का अनुवाद तैयार कर लिया। इस अनुवाद की आधारभित्ति गुरुदेव की कृति ही है। अतः गुरुदेव के लिए मैं अपनी कृतज्ञता कैसे प्रकट करूँ ? आशा है वे मेरी विवशताजन्य धृष्टता को क्षमा कर देंगे।
चौखम्बा विद्याभवन के अध्यक्ष महोदय धन्यवाद के पात्र हैं, जिन्होंने मेरे अनुवाद को अपने यहाँ से प्रकाशित किया और आगे के कार्य के लिए भी प्रेरित किया।
वैद्यनाथधाम } गुरुकुल } जगन्नाथ पाठक
विषय-सूची प्रथम उच्छ्वास (वात्स्यायनवंशवर्णन) विषय पृष्ठ. मङ्गलाचरण १ कुकवि-निन्दा ३ काव्य का देशिक रूप-भेद ४ काव्य-स्वरूप, आख्यायिकाकार कवि ५ बासवदत्ता, हरिचन्द्र, सातवाहन, प्रवरसेन, भास, कालिदास, बृहत्कथा, आढ्यराज आदि का उल्लेख ६ हर्षचरित-आख्यायिका ९ ब्रह्माजी की गोष्ठी में विवाद १० सरस्वती-वर्णन ११ दुर्वासा का क्रोध १४ सावित्री-वर्णन १६ दुर्वासा का सरस्वती को शाप देना १८ ब्रह्माजी द्वारा दुर्वासा की भर्त्सना १८ फिर सरस्वती को सान्त्वना देना १९ सन्ध्या-रात्रि-चन्द्रोदयवर्णन २२ सावित्री का सरस्वती को सान्त्वना देना २३ ब्रह्मलोक से सरस्वती और सावित्री का प्रस्थान तथा मन्दाकिनी-वर्णन २८ शोण के तट पर सरस्वती का निवास ३० दूर से घोड़ों को देखना ३३ दधीच-वर्णन ३४ विकुक्षिवर्णन ३९ दधीच और सरस्वती का परिचय ४० दधीच का च्यवनाश्रम जाना ४५ सरस्वती का औत्सुक्य ४६ विकुक्षि का पुनः आगमन ४९ मालती-वर्णन ५१ सरस्वती-मालती की रहःसंकथा ५५
( २ ) मालती का प्रस्थान, सरस्वती की उत्कण्ठा ५८ दधीच का आगमन और सरस्वती के साथ रहना ६० पुत्रोत्पत्ति के बाद सरस्वती का गमन ६१ सारस्वत और वत्स में स्नेह ६२ वात्स्यायन वंश के ब्राह्मण ६३ बाण के पूर्वज ६५ बाण और उसके साथी ६६ घुमक्कड़ बाण का अपने गांव लौटना ६९ द्वितीय उच्छ्वास (राजदर्शन) बाण द्वारा अपने गांव के घर में घूमना ७१ ग्रीष्म-समय-वर्णन ७३ कृष्ण के दूत मेखलक का आगमन और उसके द्वारा कृष्ण का संदेश सुनाना ७३ बाण का एकान्त में विचार करके निर्णय करना ८० बाण का तैयार होकर प्रीतिकूट से निकल पड़ना ९० मल्लेकूट और वनग्रामक पार करके राजद्वार पर पहुँचना, और राजद्वार का वर्णन ९२ प्रतीहार पारियात्र का वर्णन ९९ मन्दुरा और इभधिष्ण्यागार-वर्णन १०० दर्पशात हाथी का वर्णन १०४ सम्राट् हर्ष का वर्णन ११२ बाण की हर्ष से भेंट १२८ बाण और हर्ष की तीखी बातचीत और मेल १२९ तृतीय उच्छ्वास (राजवंशवर्णन) शरत्काल-वर्णन १३५ बाण का दरबार से अपने गांव लौटना १३७ गांव के भाई-बन्धुओं से परस्पर वार्तालाप १३८ पुस्तकवाचक सुदृष्टि द्वारा वायुपुराण का पाठ १४० बाण के भाइयों की हर्षचरित सुनाने के लिए उससे प्रार्थना १४२ दूसरे दिन बाण द्वारा हर्षचरित का आरम्भ १४३ श्रीकंठजनपद-वर्णन १५३
( ३ ) स्थाण्वीश्वर-वर्णन १५७ पुष्पभूति का वर्णन १६२ भैरवाचार्य का शिष्य १६६ भैरवाचार्य का वर्णन १६९ पुष्पभूति को भैरवाचार्य का कृपाण देना १७६ भैरवाचार्य की साधना १८२ पुष्पभूति का श्रीकंठनाग को परास्त करना १८५ लक्ष्मी का प्रसन्न होकर प्रकट होना और पुष्पभूति को वर देना १८७ भैरवाचार्य का विद्याधर-योनि को प्राप्त होना १९१ चतुर्थ उच्छ्वास ( चक्रवर्तिजन्मवर्णन ) पुष्पभूति के वंश में प्रभाकरवर्धन १९७ यशोमतीवर्णन १९९ यशोमती का स्वप्न देखना २०३ यशोमती के गर्भ से राज्यवर्धन की उत्पत्ति २०७ हर्ष की उत्पत्ति २०९ पुत्रजन्मोत्सव-वर्णन २१३ राज्यश्री का जन्म २२३ हर्ष का ममेरा भाई भण्डि २२४ मालवराज पुत्र कुमारगुप्त और माधवगुप्त २२९ राज्यश्री के विवाह की चिन्ता २३४ विवाह की तैयारियां २३६ ग्रहवर्मा का बरात लेकर आना २४३ ग्रहवर्मा द्वारा वधूमुखदर्शन २४५ विवाह और वासगृह में वर-वधू का आना २४७ पञ्चम उच्छ्वास ( महाराज-मरण-वर्णन ) युद्ध के लिए राज्यवर्धन का प्रयाण २५० हर्ष का बीच में ही मृगया के लिए रुक जाना २५१ दुःस्वप्न-दर्शन ,, दीर्घाध्वग कुरंगक का आगमन २५३ पिताजी की बीमारी का समाचार सुनकर हर्ष का लौटना २५४ शोकाकुल स्कन्धावार २५५
राजकुल में प्रवेश २५८ धवलगृह में प्रभाकरवर्धन की परिचर्या २५९ रुग्णावस्था में प्रभाकरवर्धन का वर्णन २६२ प्रभाकरवर्धन का पुत्र-प्रेम २६६ रसायन का पावक-प्रवेश २७१ राजभवन में अशुभ-सूचक महोत्पात २७३ बेलाप्रतीहारी का पहुँचकर हर्ष को यशोमती के सती होने की तैयारी की सूचना देना २७५ यशोमती सतीवेश में २७८ यशोमती के अन्तिम वाक्य २८१ हर्ष को प्रभाकरवर्धन की सान्त्वना २८६ प्रभाकरवर्धन की मृत्यु २८८ राजा की और्ध्वदैहिक क्रिया २९० हर्ष की चिन्ता २९० राजा की चिन्ता में भृत्य, मित्र, सचिवों का गृह-त्याग २९४ हर्ष को राज्यवर्धन की चिन्ता २९७ षष्ठ उच्छ्वास ( राजप्रतिज्ञावर्णन ) राज्यवर्धन का लौटना ३०२ राज्यवर्धन का हर्ष को समझाना और निर्वेद की बात करना ३०६ हर्ष का चिन्ता करना ३१० मालवराज द्वारा गृहवर्मा की मृत्यु और राज्यश्री को कारावास दिए जाने का समाचार ३१४ राज्यवर्धन का क्रोध करना और युद्ध के लिए प्रस्थान करना ३१४ हर्ष का दुःस्वप्न देखना ३१९ राज्यवर्धन के वध का समाचार ३२१ राज्यवर्धन का प्रचंड क्रोध ३२२ सेनापति सिंहनाद ३२५ सिंहनाद का उपदेश ३२७ हर्ष की दिग्विजयप्रतिज्ञा ३३५ हर्ष का प्रदोषस्थान और शयनगृह में जाना ३३७ गजसेना के अध्यक्ष स्कन्दगुप्त ३३९ स्कन्दगुप्त का राजाओं के छल-कपट का वर्णन करना ३४२ अपशकुन-वर्णन ३४८
( २ ) सप्तम उच्छ्वास ( छत्रलब्धि ) दण्डयात्रालग्न का निश्चय, ब्राह्मणों को दान देना ३५० छावनी में सैनिकप्रयाण की कलकल ३५३ सैनिक-प्रयाण से जनता को कष्ट ३६५ हर्ष द्वारा सेना का निरीक्षण ३७१ हंसवेग का आगमन ३७३ छत्र की विशेषता ३७४ छत्रवर्णन ३७५ भास्करवर्मा के भेजे हुए अन्य उपहार ३७७ हंसवेग द्वारा संदेश-कथन ३८२ सरकारी नौकरों पर फबतियाँ ३८६ भण्डि का आगमन ३९३ राज्यश्री का समाचार ३९५ राज्यश्री की खोज में हर्ष का प्रयाण और विन्ध्याटवी के समीप आ जाना ३९७ विन्ध्याटवी-वर्णन ३९७ अष्टम उच्छ्वास ( विन्ध्याद्रिनिवेशन ) हर्ष का विन्ध्याटवी में प्रवेश और आटविक सामन्त शरभकेतु ४०४ शबरयुवक निर्घात का वर्णन ४०४ निर्घात की हर्ष से बातें ४०७ विभिन्न वृक्षों का वर्णन ४०९ दिवाकरमित्र का वर्णन ४१३ दिवाकरमित्र द्वारा हर्ष का सत्कार ४१७ हर्ष द्वारा आगमन-प्रयोजन का निवेदन ४२१ एक भिक्षु द्वारा राज्यश्री की दशा का वर्णन ४२२ हर्ष का राज्यश्री के समीप जाना ४३१ स्त्रियों के आलाप " हर्ष का राज्यश्री से मिलन ४३५ दिवाकरमित्र द्वारा हर्ष को एकावली की भेंट ४३९ राज्यश्री को दिवाकरमित्र का उपदेश ४४४ राज्यश्री को हर्ष द्वारा सौंपना ४४९ सूर्यास्त-चन्द्रोदय-वर्णन ४५१
॥ श्रीः ॥ हर्षचरितम् 'संकेत' संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेतम् प्रथम उच्छ्वासः 'नमस्तुङ्गशिरश्चुम्बिचन्द्रचामरचारवे । त्रैलोक्यनगरारम्भमूलस्तम्भाय शंभवे ॥ १ ॥ ✤ संकेत: ✤ श्च्योतन्मदाम्बुभरनिर्भरचण्डगण्डशुण्डाग्रशौण्डपरिमण्डितभूरिभृङ्गान् । विघ्नानिवानवरतं चलगण्डतालैरुत्सारयन्नयति जातगुणो गणेशः ॥ शङ्करनामा कश्चिच्छ्रीमत्पुण्याकरात्मजो व्यलिखत् । शिष्टोपरोधवशतः सङ्केतं हर्षचरितस्य ॥ 'सर्वकर्माणि कुर्वीत प्रणिपत्येष्टदेवताम्' इति शिष्टाचारमनुपालयन् 'अपारे काव्यसंसारे कविरेव प्रजापतिः । यथास्मै रोचते विश्वं तथेदं परिवर्तते ॥' इति काव्यलक्षणामपूर्वां सृष्टिं स्थिरां प्रवर्तयञ्छेोष कविः शिवं बहुशक्तियुतमपि नियत- शक्त्यात्मकमेव स्तौति—नमस्तुङ्गेत्यादिना। न क्वचित्प्रणतो यो मूर्धा तत्स्पर्शी चन्द्र एव सितबालतुल्यप्रभाप्रसरतया स्वेदादिविनाशाद्विशिष्टस्थानस्थितञ्च चामरम् । त्रैलोक्यमेव नानाभक्तिशोभित्वाद्नगरं तदारम्भे मूलस्तम्भः। नगरारम्भे हि मूलस्तम्भो भवति । तत्र च पट्टबन्धादिविदुल्लेखणानन्तरमुद्धते पृष्ठदेशे चन्द्रतुल्यं श्वेतं चामरं क्रियत इति स्थितिः । केचित्पुनः—त्रैलोक्यनगरस्यारम्भे मूलं मूलकारणं परमाणव- स्तेषामुपामयेण मूलकारणत्वात्स्तम्भ इव । ते हि तद्द्वारात्कार्यमारभन्ते । तस्य १. जीवानन्दपाठे प्रथमः श्लोकः— चतुर्मुखमुखाम्भोजवनहंसवधूर्म्मम । मानसे रमतां नित्यं सर्वशुक्ला सरस्वती ॥
२ हर्षचरितम् निमित्तकारणत्वादित्याहुः । 'स्वयंभूः शम्भुरादित्यः' इति नामसहस्रे दृष्टत्वाद्धरेः, 'शम्भू ब्रह्यत्रिलोचनौ' इत्यभिधानकोशदर्शनाच्च ब्रह्मणोऽपि नमस्कारोऽयमित्यन्ये वदन्ति । व्याकुर्वते च हरिपक्षे-त्रैलोक्याक्रमणकाले । यद्वा-'यस्याभिरास्यं द्यौर्मूर्धा खं नाभिश्चरणौ मही' इत्यभिप्रायेण तुङ्गमूच्छितं चुलक्षणं यच्छिरस्तच्चुम्बि- चन्द्र एव चामरं तेन चारवे । ब्रह्मपक्षे-चन्द्रः स्वर्णं तन्मयं चामरमिव चामरं केशकलापः हिरण्यकेशो हि ब्रह्मा त्रैलोक्यादीनि सर्वत्र तृप्यसीति ॥ १ ॥ ❖ हिन्दीव्याख्या ❖ उन भगवान् शिव को मैं प्रणाम करता हूँ जिनके कहीं भी न झुकने वाले उन्नत मस्तक पर विराजमान चन्द्ररूपी चँवर की शोभा है, जो त्रिभुवनरूपी नगर के निर्माण- आरम्भ में मूलस्तम्भ के समान है ॥ १ ॥ हरकण्ठग्रहानन्दमीलिताक्षीं नमाम्युमाम् । कालकूटविषस्पर्शजातमूर्च्छागमामिव ॥ २ ॥ इत्यारिना । प्रियं प्रति गाढस्नेहादि सौकुमार्यं चोपमयोच्यते । कालकूटविषेति प्रशंसाद्यर्थः सामान्यपदप्रयोगो मेरुमहीधरचूतवृक्षादिवत् । आगमः प्रारम्भः ॥ २ ॥ उमा को प्रणाम करता हूँ, जिनकी आँखें शिव के कण्ठालिङ्गन के आनन्द से मूँद गई हैं, मानों शिव के गले में स्थित कालकूट विष के स्पर्श हो जाने से उन्हें तत्काल मूर्च्छा आ गई हो ॥ २ ॥ नमः सर्वविदे तस्मै व्यासाय कविबेधसे । चक्रे पुण्यं सरस्वत्या यो वर्षमिव भारतम् ॥ ३ ॥ संप्रत्युत्कृष्टकवित्वानिमानेन तादृशमेव कविवरं स्तौति-नमः सर्वेत्यादिना । सर्वा वेदादिका विद्या गीतादिकलाश्च वेत्ति यस्तस्मै । तदुक्तम्-'नासौ शब्दो न तद्वाच्यं न सा विद्या न सा कला । जायते यन्न काव्याङ्गमहो भारो महाकवेः ॥' इति कविरेव वेधाः । उक्तं च-'अपारे काव्यसंसारे कविरेव प्रजापतिः' । कवीनां वेधाः । कविशब्दोऽत्रोपचारात्कविबुद्धिषु वर्तते । तेन कविबुद्धीनां श्रेष्ठ इत्यर्थः । तथा चाह मुनिः-'इतिहासोत्तमादस्माज्जायन्ते कविबुद्धयः' इति । यद्वा व्युत्पत्त्यु- त्पादनद्वारेण कवय एवंभूताः सन्तः क्रियन्ते । मुख्य एव कविशब्दस्यार्थः । यदुक्तम्-'इदं कविवरैः सर्वैराख्यानमुपजीव्यते' इति । पुण्यं पावनम् । यदुक्तम्- 'भारताध्ययनात्पुण्यादपि पादमधीयतः । श्रद्दधानस्य पूयन्ते सर्वपापानि देहिनः॥' इति । सरस्वती वाणी, तस्या लताया इव पुष्पादिहेतुत्वाद्वर्षं वृष्टिमिव । वर्ष वा स्थानविशेषः । यतोऽसौ तत्रास्ते । यदुक्तम्-'यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न १. पाठान्तरम्-हरकण्ठग्रहानन्द । २. स्पर्शाञ्जात ।
तत्क्वचित्' । भरतानधिकृत्य कृतो ग्रन्थो भारतस्तम् । यद्वा—भारतं वर्षमिव । 'भरतः कश्चिद्राजा तस्य निवासं भारतं वर्षं भूभागैकदेशस्तद्विव । उक्तं च—'स्या- द्भूतधां लोकधाभ्यंशे वासरे वर्षमस्त्रियाम्' इति । यद्वा—भारतवर्षान्तस्था भावा मनुष्येषु सुलभास्तद्वन्महाभारतस्था सरस्वती । एतदपि सरस्वत्याख्यया पुण्यम् ॥३॥ वेदादि समस्त विद्याओं और कलाओं को जानने वाले और कवियों के प्रजापति सर्वज्ञ महर्षि व्यास को प्रणाम है, जिन्होंने अपनी वाणी से महाभारत को उस प्रकार पवित्र किया जैसे सरस्वती नदी ने सारे भारतवर्ष को ॥ ३ ॥ प्रायः कुकवयो लोके रागाधिष्ठितदृष्टयः । / कोकिला इव जायन्ते वाचालाः कामकारिणः ॥ ४ ॥ एवं सर्वज्ञतागुणकथनेन कविप्रशंसां कृत्वा काव्यप्रशंसामाह—प्राय इत्यादिना । काव्यमेतं नाम स्वभावसुभगम् । येनेदृशा अपि कवयः प्रायः प्राचुर्येण कोकिला इव जायन्ते वग्गुवाचः संपद्यन्ते, किं पुनः संविद्विद्वा न जायेरन् । कोचत्पुनर्भूयसा कुत्सिताः कवयो जायन्त इति कुकविनिन्देवैयमिति व्याख्यातवन्तः । रागो द्वेष- पूर्वकोऽनर्थाभिनिवेशस्तेनाधिष्ठिता दृष्टिर्बुद्धिर्येषाम् । वाचाला असम्बद्धप्रलापिनः । कामेन स्वेच्छया, न त्वलंकारकृतशितनीत्या, कुर्वन्ति ये ते । कोकिलपक्षे—कुकन्ति गृह्णन्ति चेतांसीति कुकाः, ते च ते वयो मयूरप्रवराः पक्षिणः; रागो लौहित्यम् । दृष्टिश्चक्षुः । वाचा भारत्या । आला आ समन्ताज्ज्ञान्यावर्जयन्ति यतस्तादृशाः सन्तः । कामं व्यसनं कुर्वन्ति तच्छीलाः । कामोद्दीपनविभावतां यान्तीत्यर्थः । यद्वा—अवाचालाः । अकारप्रश्लेषोऽत्र ॥ ४ ॥ लोक में प्रायः देखा जाता है कि राग-द्वेष की अकुशल भावनाओं से भरे हुए पर ऊपर से राग का प्रदर्शन करने वाले कोकिल के समान अनेक कुकवि उत्पन्न हो जाते हैं, जो मनमाना बकवास करते हैं और अपनी इच्छा के अनुसार नियमों की व्यवस्था का उल्लंघन करते हैं ॥ ४ ॥ / सन्ति श्वान इवासंख्या जातिभाजो गृहे गृहे । उत्पादका न बहवः कवयः शरभा इव ॥ ५ ॥ सन्तीत्यादि । असख्या अगणनार्हाः । जातिं स्वरूपवर्णनमात्ररूपां वक्रोक्ति- शून्यां भजन्ते । 'गतोऽस्तमको भातीन्दुर्यान्ति वासाय पक्षिणः' इत्यादिवत् । श्वानोऽप्यसंख्याः । नास्ति संख्या सङ्गामो येषां ते । जातिशब्देनात्र श्वाजातिसमवेता अमेध्यभक्षणाद्यो गृहीताः । यद्वा-श्वत्वं नाम जातिस्तत्प्रतिपादनं प्रयोनान्तर- १. मृतैर्वः । २. कामचारिणः ।
४ हर्षचरितम् शून्यतामावेदयति । उत्पादका नवनिर्माणकारिणः, ऊर्ध्वपादाश्च । शरभा हि प्राणि- भेदाः । अष्टपादा एते । सजातीया इति केचित् ॥ ५ ॥ कुत्तों के समान घर-घर में केवल जन्म लेने वाले कवि असंख्य हैं, जो स्वरूप मात्र का वर्णन करते हैं। शरभों के समान उत्पादक¹ अर्थात् नव-निर्माण करने वाले कवि जगत् में बहुत नहीं हैं ॥ ५ ॥ अन्यवर्णपरावृत्त्या बन्धचिह्ननिगूहनैः । अनाख्यातः सतां मध्ये कविश्चौरो विभाव्यते ॥ ६ ॥ अन्वेति । कविश्चौरः सहृदयानां मध्येऽनाख्यातः कथितोऽपि न ज्ञायते । न आ समन्तात्ख्यातः, अपि तु किञ्चित्प्रथितो वा । अन्ये पूर्वकविनिबद्धविलक्षणा ये वर्णा अक्षराणि तेषां रचनेन बन्धचिह्नं श्रीलक्ष्मीप्रभृतिरचनालिङ्गम् । अन्ये तु भाषा- लंकारप्रभृतिबन्धचिह्नमाहुः । अथ च सतां साधूनां मध्ये चौरो लक्ष्यते । कीदृक् ? न ना अना कापुरुषः, आख्यातोऽप्रसिद्धः । केन ? अन्यः प्राक्तनच्छायाव्यतिरिक्तच्छा- सकृतः पाण्डिमादिवर्णो मुखरागविशेषस्तत्परिवर्तनेन । यद्वा-शूद्रत्वे सति द्विजा- तिवर्णाश्रयेण । स्वजात्युचितस्य स्वभावस्य त्यक्तुमशक्यत्वाद्भावप्रकटनमवश्यमेव भवति । यतो बन्धः शृङ्खलादिकृतो ग्रन्थिस्तच्चिह्नं त्वग्दूषणादि ॥ ६ ॥ सहृदय जनों के बीच अप्रसिद्ध कवि दूसरे कवि के वर्णों को बदल देने से एवं निर्माण के चिह्नों को छिपाने से चोर समझा जाता है, क्योंकि चोर भी लोगों के बीच मुख के अकस्मात् फीके पड़ जाने से और हाथों पर लगे हुए बेड़ी के दागों को छिपाने से पहचान लिया जाता है ॥ ६ ॥ श्लेषप्रायमुदीच्येषु प्रतीच्येष्वर्थमात्रकम् । उत्प्रेक्षा दाक्षिणात्येषु गौडेष्वक्षरडम्बरम् ॥ ७ ॥ श्लेषेत्यादि । मात्रकपदेन श्लेषयमकाद्यलंकारशून्यत्वं दर्शयति । अक्षरेत्यादिनार्थ- विशेषाभावं प्रसादादिगुणगुम्फनाभावं चाख्याति । एतदुक्तं भवति—क्वचित्कश्चि- द्गुणोऽपि भवति । स च भवन्नपि न सहृदयजनावर्जक इति । अमुनैवाभिप्रायेण नव इत्यादीनि प्रत्येकं विशेषणपदानि वक्ष्यति ॥ ७ ॥ उत्तरी क्षेत्र के कवियों की रचना श्लेष-प्रधान होती है । पश्चिमी क्षेत्र के कवि प्रधान रूप से अर्थाडम्बर में लगे रहते हैं । दाक्षिणात्य कवि उत्प्रेक्षा करने में निपुण होते हैं और गौड़देशीय (प्राच्य) कवियों की रचना में अक्षरमात्र का प्राचुर्य रहता है ॥ ७॥
१. उठे पैरों वाले । शरभ एक प्राणी है जिसके आठ पैर होते हैं और सब ऊपर की ओर उठे रहते हैं । १. डम्बरः ।
प्रथम उच्छ्वासः ५ नवोऽर्थो जातिरग्राम्या¹ श्लेषोऽक्लिष्टः स्फुटो रसः । विकटो²ऽक्षरबन्धश्च कृत्स्नमेकत्र दुष्करम् ॥ ८ ॥ नव इत्यादि । नव आद्यैः कविभिरनिबद्धः, चमत्कारी च । जातिः स्वभावोक्तिः । अग्राम्येति । न तु 'गतोऽस्तमर्कः' इत्यादिरूपा । सधर्मेषु तन्त्रप्रयोगः श्लेषः । अक्लिष्टः सम्यगनेकार्थप्रतिपादनक्षमः । स्फुटो दुर्बोधभङ्गथादिभिरदूषितः । रसः शृङ्गारादिः । विकट उदारतालक्षणबन्धगुणयुक्तः । यत्र सति नृत्यन्तीव पदानि प्रतिभासन्ते ॥ ८ ॥ नवीन अर्थ जिसे अबतक किसी कवि ने नहीं लिखा हो, अर्थात् चमत्कारी, अग्राम्य जाति अर्थात् स्वभावोक्ति, बिना माथापच्ची के ही समझ में आ जाने वाला श्लेष, सुबोध रस एवं आकर्षक शब्दों का संचयन-इन सब गुणों का एकत्र किसी काव्य में होना कठिन है ॥ ८ ॥ किं कवेस्तस्य काव्येन सर्ववृत्तान्तगामिनी । कथेव भारती यस्य न व्योप्नोति³ जगत्त्रयम् ॥ ६ ॥ किमित्यादि । वृत्तानि वर्णमात्रागणसमार्धसमविषमरूपाणि तदन्तगमनं तद्वि- रचनक्षमत्वम् । भारती वाणी । व्याप्नोति । अदृष्टमपि दृष्टमिव जगत्त्रयं प्रतिभानव- शाद्युत्प्रेक्षेत तथात्वेन प्रकाशयति । यद्वा-जगत्त्रयप्रथिता भवतीति स्फुट एवार्थः । भरतानधिकृत्य प्रथिता भारती कथेव । सापि सर्वे ये वृत्तान्ताः सत्पुरुषचरितान्यु- पाख्यानानि च तान्नामयति बोधयति । तथा सर्वत्र ज्ञेया भवति । तथा च- 'नारदोऽश्रावयद्देवानसितो देवलः पितॄन् । गन्धर्वयक्षरक्षांसि श्रावयामास वै शुकः ॥' इत्युक्तम् ॥ ९ ॥ उस कवि के काव्य से क्या, जिसकी वाणी सब प्रकार के वृत्तान्तों वाली महाभारत की कथा के समान तीनों जगत् में व्याप्त नहीं होती ॥ ९ ॥ उच्छ्वासान्तेऽप्यखिन्नास्ते येषां वक्त्रे सरस्वती । कथमाख्यायिकाकारा न ते वन्द्याः कवीश्वराः ॥ १० ॥ अधुना स्वगुरुतः स्वप्रभृतिभिः कृतानाख्यायिकादीन्काव्यभेदान्स्तुवन्ननौद्धत्यार्थं सर्वत्र नमस्कारमाह-उच्छ्वासान्त इति । उच्छ्वास इवोच्छ्वासो विश्रान्तिस्थानं सर्गा- दिवत्कथासन्धिरतस्यान्तेऽप्यखिन्ना उच्छ्वासान्तरकरणक्षमाः । अविच्छिन्नप्रतिभाना इति यावत् । गुरुत्वाद्वहुवचनम् । 'नान्द्यन्ते शम्भुधैर्यक्रम' इति वक्रलक्षणम् । वक्त्रे सरस्वती । वृत्तविशेषयोगिनीत्यर्थः । एतस्मिन्नाख्यायिकाकृद्भिर्भाविवस्तुसंसूचनाय वाग्विरच्यते । तथा चाह भामहः- 'वक्रं चापरवक्रं च काव्ये काव्यार्थशंसिनि' १. अग्राम्याः । २. विकटो । ३. प्रामोति दिगन्तरम् ।
६ हर्षचरितम्
इति। आख्यायिकाः कुर्वन्तीत्याख्यायिकाकाराः। यद्वा—आख्यायिकैवाकारो येषाम्। अथ 'कविं पुराणम्' इति न्यायेन कवयश्च त ईश्वरा हरिहरब्रह्माणः। उच्छ्वसन्ति भूतान्यस्मिन्नित्युच्छ्वासः कल्पस्तदन्ते संहारेऽपि तेऽखिन्नाः कल्पान्तर- जननोद्योगिनस्तेषां मुखे वागीशी। उक्तं च—'सरस्वतीवाग्बलमुत्तमोऽनिलः' इत्यादि। आख्यायिकाभिराख्यानैराकारो येषाम्। सर्वस्य हि शास्त्रागमसमधि- गम्याः, न पुनः प्रत्यक्षलक्ष्याः। ते च वन्द्याः सर्वस्य ॥ १० ॥ जो उच्छ्वास के बाद भी नहीं थकते और जिनके मुख में सरस्वती विराजमान हैं ऐसे आख्यायिकाओं के निर्माण करने वाले कवि क्यों नहीं वन्दनीय हैं ? ॥ १० ॥ कवीनामगलद्दर्पो नूनं वासवदत्तया। शक्त्येव पाण्डुपुत्राणां गतया कर्णगोचरम् ॥ ११ ॥ कवीनामिति। वासवदत्ता कथा, वासवेन शक्रेण दत्ता च। कर्णः श्रवणं, राधेयश्च। कवीनां काव्यकर्तॄणां, द्रोणादीनां च ॥ ११ ॥ निश्चय ही कवियों का अभिमान सुबन्धु की रचना 'वासवदत्ता' के कानों तक पहुँचते ही उस प्रकार चूर्ण हो गया जिस प्रकार इन्द्रद्वारा प्राप्त शक्ति नामक अस्त्र विशेष को कर्ण के पास देखते ही द्रोण आदि का गर्व बिलकुल नहीं रहा ॥ ११ ॥ पदबन्धोज्ज्वलो हारी कृतवर्णक्रमस्थितिः। भट्टारहरिचन्द्रस्य गद्यबन्धो नृपायते ॥ १२ ॥ पदेत्यादि। पदानां सुप्तिङन्तानां बन्धः प्रकृष्टा रचना। रीतिरित्यर्थः। स्वम- ण्डललावण्यमश्च। हारी हृद्यः, हारयुक्तश्च। अहारीति वा। न कस्यचिदपि यो हरति। कृता वर्णानामक्षराणां क्रमेण भामहादिप्रदर्शितनीत्या स्थितिरवस्थानं यत्र; कृत- युगवर्द्धर्णानां द्विजादीनां क्रमेण मन्वादिस्मृतिकारप्रकाशितमार्गेण स्थितिः पालनं यस्मिन्सतीति च। भट्टारेति पूजावचनम् ॥ १२ ॥ आर्य हरिश्चन्द्र द्वारा निर्मित गद्यकाव्य राजा के समान है, उसमें शब्दों की रचना निर्मल है, वह मनोहर है एवं उसमें आलंकारिकों के मतानुसार अक्षरों की एक क्रम से संघटना है ॥ १२ ॥ अविनाशिनमग्राम्यमकरोत्सातवाहनः। विशुद्धजातिभिः कोशं रत्नैरिव सुभाषितैः ॥ १३ ॥ अविनाशिनमित्यादि। अविनाशिनं प्रसिद्धम्, अनश्वरं च। अग्राम्यं वैदग्ध्ययुक्तम्, १. पुत्रस्य । २. पदबद्धोज्ज्वलो हारिकृतकण्ठक्रमस्थितिः । ३. पद्य । ४. कुविनाशिनम् ।
अग्राम्यभावं च । जातिः स्वभावोक्तिरूपोऽलङ्कारः। कोशः समुच्चयः, गञ्जश्च। सुभाषितैः सूक्तिभिः, शोभनं च भाषितं प्रभाववर्णनं येषां तैः ॥ १३ ॥ सातवाहन ने निर्दोष गुणालङ्कारयुक्त सुभाषितों का एक संग्रह तैयार किया जो विशुद्ध जाति के रत्नों के कोष के समान कभी विनष्ट नहीं होने वाला, वैदग्ध्यपूर्ण हुआ ॥ १३॥ कीर्तिः प्रवरसेनस्य प्रयाता कुमुदोज्ज्वला । सागरस्य परं पारं कपिसेनेव सेतुना ॥ १४ ॥ कीर्तिरिन्यादि । प्रवरसेनः कश्चित्कविः प्रवे प्लुते रसो येषां ते प्रवरसा वानरा- स्तेषामिनः स्वामी, प्रवरा च सेना यस्य स सुग्रीवश्च । कुमुदवत्कैरववत् । यद्वा- कुभूमिस्तस्या मुत् प्रहर्षस्तयेति, कुमुदेन वानरसेनापतिना च । सेतुः प्राकृतका- व्यग्रन्थः, सेतुश्च ॥ १४ ॥ प्रवरसेन नामक कवि की कुमुद के समान उज्ज्वलकीर्ति सेतु (बन्ध) नामक प्राकृतकाव्य के द्वारा समुद्र को पार कर गई, जैसे वानरों की सेना सेतु के द्वारा समुद्र पार पहुँच गई थी ॥ १४ ॥ सूत्रधारकृतारम्भैर्नाटकैर्बहुभूमिकैः । सपताकैर्यशो लेभे भासो देवकुलैरिव ॥ १५ ॥ सूत्रेत्यादि । सूत्रधारः पूर्वरङ्गस्य प्रवक्ता चार्चिक्यः, स्थपतिश्च । भूमिकाः पात्राणि रामाद्यनुकार्यावस्थाभूमयः, उपभोगनिमित्तान्युत्पत्तिस्थानानि । पताका अर्थप्रकृतिः । उक्तं च—‘बीजं बिन्दुः पताका च प्रकरी कार्यमेव च । अर्थप्रकृतयो ह्येताः पञ्च सर्वप्रयोगगाः ॥’ इति । ‘यद्वृत्तं तु परार्थं स्यात्प्रधानस्योपकारकम् । प्रधानवच्च कल्पेत सा पताकेति कीर्त्यते ॥’ इति वैजयन्ती च पताका ॥ १५ ॥ भास ने देवमन्दिरों के समान अपने नाटकों से लोक में ख्याति प्राप्त की जिनका आरंभ सूत्रधार करता, जिनमें पात्रों की भूमिकायें (अवस्था) और सहायक कथायें (पताका) रहतीं ॥ १५ ॥ निर्गतासु न वा कस्य कालिदासस्य सूक्तिषु । प्रीतिर्मधुरसान्द्रासु मञ्जरीष्विव जायते ॥ १६ ॥ निर्गतास्विति । निर्गता उच्चारितमात्राः । आस्तां तावदर्थावगतिः, आपात एव गीतध्वनिवत्किमपि श्रोत्रहारिण्यः । यदुक्तम्—‘अपर्यालोचितेऽप्यर्थे बन्धसौन्दर्य- संपदा । गीतवद्धृदयाह्लादं तद्विदां विदधाति यत् ॥ तत्काव्यम्’ इत्यादि । तथा निर्गताः सर्वदेशप्रतीताः, अन्यत्र—निर्गता अभिनवोद्भिन्नाः न वा कस्येत्यनेनैत- १. भूषिकैः । २. भासा । ३. निसर्गसूरवंशस्य ।