भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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( ३० ) के आरम्भिक पद्यों में बाण ने अपनी कथा को 'निरन्तरश्लेषघना' और 'अतिद्वयी' अर्थात् वासवदत्ता और गुणाढ्यकृत बृहत्कथा का अतिक्रमण करने वाली कहा है। फिर बाण ने भट्टार हरिचन्द्र नामक कवि के गद्यबन्ध की चर्चा की है, जिसमें पद- बन्ध उज्ज्वल, मनोहर तथा अनुप्रास के रूप में क्रम से वर्णों की स्थिति है। उसकी शैली बाण के लिए आदर्श थी। भट्टार हरिचन्द्र के गद्यबन्ध के उपलब्ध न होने से यह ठीक पता नहीं चलता कि वे कौन थे। सम्भावना है कि राजशेखर ने जिन हरिचन्द्र का उल्लेख किया है वे ही बाण के भट्टार हरिचन्द्र हों। इस प्रकार बाण ने सातवाहन के सुभाषित- कोश गाथासप्तशती, प्रवरसेन की प्रसिद्ध रचना सेतुबन्ध और भास के यशस्वी नाटकों का सादर संस्मरण किया है। महाकवि कालिदास बाणभट्ट के अत्यन्त प्रिय कवि थे। बाण ने उनकी मधुरसार्द्र सूक्तियों में खूब आनन्द लिया था। सचमुच कालिदास के बाद बाण का ही नाम लिया जा सकता है। बाण ने कालिदास को खूब समझा है और उनकी शैली को आदर्श मान कर और भी पल्लवित रूप में निर्माण करने की अद्भुत क्षमता अर्जित की है। गुणाढ्य की बृहत्कथा और आढ्यराज नामक कवि के काव्योत्साह भी बाण के लिए आश्चर्यकारी थे। आढ्यराज की प्रशंसा में बाण कहते हैं कि जिह्वा ही भीतर की ओर खिंच जाती है और कविता करने के लिए प्रवृत्त नहीं होती। इस प्रकार बाणभट्ट जितने अंश में दोषज्ञ थे उतने ही अंश में गुणज्ञ भी। फिर भी किसी विशेष के प्रति उनकी बुरी धारणा न थी। बाण के साहित्य में ऐसे व्यक्ति का कोई भी निर्देश नहीं मिलता जिससे बाणभट्ट क्षुब्ध हों। कादम्बरी में उन्होंने थोड़े में ही अपनी काव्यनिर्माणशैली की ओर संकेत किया है। जैसा कि कहा जा चुका है श्लेष- प्रधान शब्दों की अद्भुत योजना ही बाण की शैली की विशेषता है। कादम्बरी में इस शैली की प्रांजलता का साक्षात्कार होता है। बाण के शब्दों में बाण की शैली को 'निरन्तर- श्लेषघना' कहना चाहिए। आख्यायिका और कथा महाकवि बाण आख्यायिका और कथा दोनों के लेखक हैं। हर्षचरित आख्यायिका है और कादम्बरी कथा। अमरकोश में 'आख्यायिकोपलब्धार्था' कहा है, अर्थात् आख्या- यिका वह कथा है जिसका सत्यार्थ ज्ञात हो। कथा का विषय कल्पित होता है। आगे चल कर आख्यायिका के इस लक्षण का विकास हुआ और भिन्न-भिन्न आचार्यों ने अपनी-अपनी परिभाषा की। हर्षचरित और कादम्बरी को देख कर आख्यायिका का विषय ऐतिहासिक