भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 506 में से

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पृष्ठ 36

( २६ ) नवोऽर्थो जातिरग्राम्या श्लेषोऽक्लिष्टः स्फुटो रसः। विकटाक्षरबन्धश्च कृत्स्नमेकत्र दुर्लभम् ॥ ( हर्ष० श्लोक १।८ ) अर्थात् विषय की नवीनता, सुन्दर लगने वाली स्वभावोक्ति, श्लेष ऐसा जो क्लिष्ट न हो, स्फुट रस, जिसके निर्णय के लिए सहृदय को विशेष माथा-पच्ची न करनी पड़े, विकट या भारी भरकम शब्दों की योजना । बाण का कहना है कि सब मिल कर ये पाँचों बातें किसी एक काव्य में दुर्लभ हैं, परन्तु सच्चे अर्थ में वही काव्य कहने योग्य है जिसमें इन सब का समन्वय हो । बाण ने अपने काव्यों में इनके समन्वय का हमेशा ध्यान रखा है । बाण की यह समन्वयप्रधान शैली किसी प्रकार के एकांगी दृष्टिकोण के अधीन नहीं रही, यही उसकी विशेषता है । सचमुच श्लाघनीय रचना समन्वयप्रधान दृष्टिकोण का कवि ही कर सकता है, बाण की सफलता का रहस्य भी यही है । बाण की रचना में विषय की सर्वाधिक नूतनता, सरल श्लेष-प्रधान शैली की अद्भुत योजना, वस्तुओं का अग्राम्य यथार्थ-वर्णन, समासबहुल पदविन्यास तथा कथावस्तु का ग्रथन, इन सब का विलक्षण सामंजस्य मिल जाता है । कहा गया है कि बाण मनमाने ढंग की कविता करने वाले वाचाल एवं अनुत्पादक कवियों से खूब चिढ़े हुए थे । दूसरे कवि के वर्णों को बदल कर उनके स्थान में अपने शब्द रख कर काव्य निर्माण की प्रवृत्ति रखने वाले कवि बाण के शब्दों में चोर होते हैं । वे सहज ही पकड़ जाते हैं। ऐसे कवियों की रचना किसी अंश में आदर के योग्य नहीं। बाण की दृष्टि में कविता की भूमिका अपने स्वरूप में सर्वथा मौलिक और महत्त्वपूर्ण है । कविता की सिद्धि के लिए कवि को महती साधना करनी पड़ती है । साधना-विहीन कवि किसी प्रकार भी कविता की उच्च भूमिका में नहीं पहुँच सकता । बाण ने किसी विशेष कवि का नाम लेकर इस प्रकार की कुछ भी निन्दा की बात नहीं कही है । व्यक्तिगत आक्षेप बाण को अभिमत नहीं । प्रशंसा के अवसर पर वे विशेष कवियों की चर्चा हृदय खोल कर करते हैं । इसी प्रसंग में बाण ने अनेक कवियों का आदर-पूर्वक स्मरण किया है । सर्वविद् महर्षि व्यास और आख्यायिका निर्माण करने वाले कवीश्वरों की वन्दना के पश्चात् बाण अपने पूर्ववर्ती गद्यकाव्य वासवदत्ता की प्रशंसा करते हैं । वासवदत्ता सुबन्धु- कृत होनी चाहिए । किन्तु कुछ विद्वानों को कथा के रूप में सुबन्धु की उपलब्ध श्लेष-बहुल- रचना वासवदत्ता आख्यायिका के प्रसंग में कवियों के दर्प को विचलित करने वाला बाण की निर्दिष्ट ( आख्यायिका ) वासवदत्ता से अतिरिक्त लगती है । अस्तु, वे वासवदत्ता के गुण से प्रभावित अवश्य थे, पर अन्य कवियों की तरह विगलित-दर्प न थे, क्योंकि कादम्बरी

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