भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 56

प्रथम उच्छ्वासः १९ विष्टरमासमम् । सुनासीर इन्द्रः । गिरः स्तुतिरूपा वर्णन्ति भजन्तीति गीर्वाणा देवाः । गीरेव बाणः शरो येषामिति वा, परिवृतश्चतुर्दिकं वृतः परिवलितः । तस्य चतुर्मुखत्वात् । ब्रह्म वदन्तीति ब्रह्मोद्याः । 'वदः सुपि क्यप् च' । ब्रह्मण वेद्रेन, ब्रह्मणि परमात्मनि वा वेदितव्या ब्रह्मोद्याः । उक्तं च—'ब्रह्मोद्या सा कथा यस्या- मुच्यते ब्रह्म शाश्वतम्' इति । सामान्यविशेषभावेन 'उद्वासिकामासते' इतिवत् । ब्रह्मवदनरूपा वा कथास्तासां वक्ष्यमाणगोष्ठ्यभिप्रायेण प्राधान्यात्स्वयं करणम् । निरवद्या दोषरहिताः । तथा च वात्स्यायनः—'या गोष्ठी लोकविद्विष्टा या च स्वैर- विसर्पिणी । परहिंसात्मिका या च न तामवतरेद्बुधः ॥ लोकचित्तानुवर्तिन्या क्रीडा- मात्रैककार्यया । गोष्ठ्या सह चरन्विद्वाँल्लोकसिद्धिं नियच्छति ॥' समानविद्या- वित्तशील बुद्धिवयसामनुरूपैरालापैरकत्रासनबन्धो गोष्ठी । प्रतीचयः पूज्यः सम्य- गुदात्तादित्रैस्वर्यादिप्राधान्यादुच्चारयञ्जगुः । अपचितिः पूजा । सामानि जगुरिति साम्नां गानमेवोचितम् । विद्याविसंवादकृता इति, न तु मात्सर्यादिना । प्रादुर्भ्रूव- क्षित्यनौचित्यशङ्कया तत्कर्तृत्वपरिहारः । ऐसा सुना जाता है—बहुत पहले की बात है, भगवान् ब्रह्मा अपने ब्रह्मलोक में शासन कर रहे थे। किसी समय विकसित कमल के आसन पर विराजमान हो इन्द्रप्रमुख देवताओं के बीच घिरे हुए शाश्वत ब्रह्म के विषय में चर्चा कर रहे थे और अन्य दोष-रहित विद्यागोष्ठियों में भाग ले रहे थे । उस प्रकार अपने आसन पर बैठे हुए तीनों लोकों के पूजनीय भगवान् ब्रह्मा की सेवा में मनु, दक्ष, चाक्षुष आदि प्रजापति और सप्तर्षि आदि महर्षि संलग्न थे। उनमें कुछ ने बड़ी स्पष्टता के साथ स्तुतिप्रधान ऋचाओं का पाठ किया। कुछ ने पूजन के यजुर्वेदीय मंत्र पढे । कुछ ने प्रशंसामूलक सामों का गान किया। अन्य लोगों ने यज्ञक्रियाओं के उपयोग में आने वाले मंत्रों की व्याख्या की। वहां उन लोगों के बीच मत-मतान्तर को लेकर परस्पर विद्याविषयक विवाद उठ खड़े हुए । अथातिरोषणः प्रकृत्या महातपा मुनिरत्रस्तनयस्तारापतेर्भ्राता नाम्ना दुर्वासा द्वितीयेनोपमन्युनाम्ना मुनिना सह कलहायमानः साम गायन्क्रो- धान्धो विस्वरमकरोत् । सर्वेषु च तेषु शापभयंप्रतिपन्नमौनेषु मुनिष्व- न्यालापलीलया चांवधीरयति कमलसंभवे भगवती कुमारी किंचिदुन्मु- क्तबालभावे भूषितनवयौवने वयसि वर्तमाना, गृहीतचामरप्रचलद्भुजलता पितामहमुपवीजयन्ती, निर्भर्त्सनताडनजातरागाभ्यामिव स्वभावारुणा- १. मन्द। २. सामगायः । ३. शापभयात्प्र । ४. अवधीरयति । ५. नवे वयसि । ६. स्वभावारुणपाद ।