हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उच्छ्वासः २१ समस्त भले-बुरे को देख लेते हैं। जल और अग्नि के समान धर्म और क्रोध का एक जगह रहना स्वभाव से विरुद्ध है। प्रकाश (विवेक) को छोड़ अंधकार (अज्ञान) में क्यों गिर रहे हो ? क्षमा तो सब तपस्याओं का मूल है। दूसरों की बुराइयों को ही देखने में निपुण दृष्टि के समान तुम्हारी क्रोध से अभिभूत दृष्टि अपने ही भीतर उत्पन्न राग को नहीं देख पा रही है। कहाँ महान् तप के भार को वहन करने की क्षमता और कहाँ एकमात्र दूसरों के अवगुण ग्रहण करना ! अत्यन्त क्रोधी स्वभाव का नेत्रधारी भी अन्धा है, क्योंकि क्रोध से कलुषित हो जाने पर बुद्धि कर्तव्य और अकर्तव्य का विचार नहीं कर पाती। पहले क्रोधी व्यक्ति की विद्या धुँधली हो जाती है और पीछे उसकी भौंह । पहले राग इन्द्रियों को घेरता है, पीछे (लाली रूप में) आँखों में व्याप्त हो जाता है। आरम्भ में तपस्या विगलित हो जाती है, पश्चात् स्वेदजल । पहले अयश स्फुरित होने लगता है, फिर अधर (फड़फड़ाने लगता है) । विषवृक्ष के समान तुम्हारे जटारूपी वल्कल लोक- विनाश के लिए कैसे उत्पन्न हो गए ? तुम्हारी शीलरहित चित्तवृत्ति मुनिवेष के लिए हारयष्टि के समान अनुचित है। क्षमभाव से रहित चित्त के द्वारा नट के समान कृत्रिम तपस्वी के भेष को व्यर्थ ही ढो रहे हो। (इससे) तुम्हारा भी कल्याण नहीं देख रहा हूं । इसी हल्केपन से आज भी तुम ज्ञान-समुद्र के ऊपर-ऊपर ही तैर रहे हो। ये सब महर्षि कानों के बहरे, आँखों के अंधे और मूर्ख नहीं हैं। जहाँ क्रोध जैसा महान् दोष नियमतः वर्तमान रहता है ऐसे अपने हृदय को तुम्हें नियन्त्रित करना चाहिए। फिर भी क्यों तुमने निरपराध सरस्वती को शाप से जकड़ डाला। अपनी असावधानी से हुई गलतियों से लज्जित होने का यही अवसर है, जिनसे मूर्ख निन्दनीय होता है।' यह कह कर ब्रह्मा जी ने फिर कहा—'वत्से सरस्वती ! दुखी मत हो, यह सावित्री तेरे साथ जायगी। हमारे विरह से दुखी होने पर यह तुझे बतलाएगी। पुत्र का मुखकमल देखने तक तेरे इस शाप की अवधि है।' इतना कह कर ब्रह्माजी ने सुर, असुर और मुनि के मण्डल को अपने- अपने स्थान पर विदा किया और स्वयं शीघ्र पहुंचे हुए नारद के कन्धे पर हाथ रख कर समुचित दैनिक क्रिया करने के लिए उठ खड़े हुए । सरस्वती भी शप्त होने के कारण कुछ सिर झुकाए सावित्री के साथ घर चली । कृष्ण मृगचर्म की रेखा जैसी उज्ज्वल और श्याम अपनी आँखें वह वक्ष पर डाल रही थी । मूर्तिमान् शाप के अक्षरों के समान भौंरे उसकी श्वास की सुगन्धि के साथ लग गए मानों उसे रोक रहे थे । शापजन्य शोक से उसके हाथ शिथिल पड़ गए थे । नीचे की ओर दौड़ती हुई उसके नखों की किरणें मानों उसे मर्त्यलोक में अवतीर्ण होने का मार्ग बतला रही थीं। ब्रह्मलोक में निवास करने वाले लोगों के हृदय के समान भवन के कलहंस उसके नूपुरों की आवाज से बुलाए जाने पर उसका पीछा करने लगे । अत्रान्तरे सरस्वत्यवतरणवार्तामिव कथयितुं मध्यमं लोकमवतता-